भेद कुल खुल जाए वह

भेद कुल खुल जाए वह
सूरत हमारे दिल में है।
देश को मिल जाए जो
पूँजी तुम्हारी मिल में है।

हार होंगे हृदय के
खुलकर सभी गाने नये,
हाथ में आ जाएगा,
वह राज़ जो महफ़िल में है।

तर्स है यह, देर से
आँखें गड़ी शृंगार में,
और दिखलायी पड़ेगी
जो गुराई तिल में है।

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे,
ज़ोर से आँधी चली,
हाथ मत डालो, हटाओ
पैर, बिच्छू बिल में है।

ताक़ पर है नमक-मिर्चा,
लोग बिगड़े या बने,
सीख क्या होगी परायी
जब पिसाई सिल में है।

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