भेद कुल खुल जाए वह
सूरत हमारे दिल में है।
देश को मिल जाए जो
पूँजी तुम्हारी मिल में है।

हार होंगे हृदय के
खुलकर सभी गाने नये,
हाथ में आ जाएगा,
वह राज़ जो महफ़िल में है।

तर्स है यह, देर से
आँखें गड़ी शृंगार में,
और दिखलायी पड़ेगी
जो गुराई तिल में है।

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे,
ज़ोर से आँधी चली,
हाथ मत डालो, हटाओ
पैर, बिच्छू बिल में है।

ताक़ पर है नमक-मिर्चा,
लोग बिगड़े या बने,
सीख क्या होगी परायी
जब पिसाई सिल में है।

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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' (21 फरवरी, 1899 - 15 अक्टूबर, 1961) हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।

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