कहानी: ‘सातवाँ आदमी’
लेखक: हारुकी मुराकामी
जापानी से अनुवाद: क्रिस्टोफ़र एलिशन
हिन्दी अनुवाद: श्रीविलास सिंह

“वह मेरी उम्र के दसवें वर्ष के दौरान सितम्बर का एक अपराह्न था जब उस लहर ने मुझे लगभग मेरे अंत के क़रीब ला दिया था।” सातवें व्यक्ति ने शांत आवाज़ में अपनी बात शुरू की।

उस रात बोलने वाला वह आख़िरी व्यक्ति था। घड़ी की घंटे वाली सुई पहले ही दस के पार जा चुकी थी। बाहर उस काले अँधेरे में बहती हुई पछुवा हवा की आवाज़ कमरे के अंदर गोल घेरे में एकसाथ बैठे हर व्यक्ति द्वारा सुनी जा सकती थी। बाग़ में पत्तियाँ खड़खड़ायीं, खिड़कियों के पट हल्के से बज उठे और रात में दूर जाने से पूर्व हवा की आवाज़ तेज़ सीटी की भाँति गूँज गयी।

“वह एक विशेष प्रकार की लहर थी, एक दैत्याकार लहर, वैसी मैंने फिर कभी नहीं देखी।” उस व्यक्ति ने कहना जारी रखा।

“उसके द्वारा बहा लिए जाने से मैं बस बाल-बाल ही बचा था। लेकिन इसकी जगह उसने मेरा सबसे महत्त्वपूर्ण अंश अवशोषित कर लिया और उसे एक दूसरी अनजानी दुनिया में भेज दिया। उस घटना के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होने में मुझे इतना लम्बा समय लग गया। इतना बहुमूल्य समय।”

सातवाँ आदमी पचपन के आसपास का लग रहा था। लम्बा और दुबला पतला, उसके मुँह पर घनी मूँछें थी और दाहिनी आँख के पास एक छोटे लेकिन गहरे घाव का निशान था जो किसी चाक़ू के वार से लगा हुआ प्रतीत हो रहा था। उसके बाल छोटे थे और यहाँ-वहाँ सफ़ेदी की झलक लिए हुए थे। उसके चहरे पर इस तरह के भाव थे मानों ऐसे एकाएक उसे क्या कहना है इसका उसे कुछ पता ही न हो, हालाँकि ये भाव उसके चहरे पर लम्बे समय से थे और इस बारे में कुछ ऐसी बात थी जो काफ़ी जानी-पहचानी-सी थी। वह ट्वीड की जैकेट के नीचे एक उदास-सी नीली कमीज़ पहने हुए था। वह अक्सर अपनी कमीज़ के कॉलर पर हाथ फेरता था। किसी को भी उसका नाम नहीं पता था। सम्भवतः कोई उसके बारे में कुछ नहीं जानता था।

सातवाँ आदमी हल्के से खाँसा। अन्य सारे शब्द दूर ख़ामोशी में डूब गए थे। बिना कुछ कहे हर व्यक्ति उसके आगे बोलने की प्रतीक्षा करने लगा।

“मेरे मामले में, यह एक लहर थी। निश्चय ही, मैं कह नहीं सकता कि अन्य लोगों के मामले में क्या था। लेकिन मेरे मामले में तो यह बस एक लहर ही थी। मुझे कोई पूर्व चेतावनी नहीं मिली थी। एक दिन एकाएक वह बस मेरे सामने थी, अपने को एक दैत्याकार लहर के रूप में प्रस्तुत करती हुई, एक मारक शक्ति।”

“मैं ‘एस’ प्रिफ़ेक्चर (प्रांत) के समुद्र के किनारे स्थित इस क़स्बे में बड़ा हुआ था। यह कुछ इस प्रकार का महत्त्वहीन क़स्बा था कि मेरे इसका नाम लेने के बावजूद भी, आप लोगों पर सम्भवतः कोई प्रभाव नहीं पड़ा होगा। मेरे पिता वहाँ एक स्वास्थ्यकर्मी के रूप में काम करते थे, और प्रारम्भ में मेरा बचपन परेशानियों से अपेक्षाकृत रुप से मुक्त था। जहाँ तक मैं याद कर सकता हूँ, मेरा एक बहुत क़रीबी दोस्त था। उसका नाम ‘के’ था। वह हमारे घर के ठीक सामने वाले घर में रहता था और स्कूल में मुझसे एक वर्ष पीछे था। हम प्रतिदिन स्कूल एक साथ जाते थे और जब अपराह्न में घर लौटते थे तो सदैव एक साथ खेलते थे। हम भाई-भाई भी हो सकते थे। यद्यपि हम बहुत लम्बे समय से मित्र थे किन्तु हमारे बीच कभी एक बार भी कोई समस्या नहीं उत्पन्न हुई थी। वास्तव में मेरा एक असली भाई भी था किंतु चूँकि वह मुझसे छः साल छोटा था, हम में बहुत अधिक समानता नहीं थी और यदि स्पष्ट कहूँ तो, हमारे बीच बहुत प्रेम भी नहीं था। इस कारण से भी मैं अपने वास्तविक भाई की तुलना में अपने मित्र के प्रति अधिक भ्रातृत्व भाव महसूस करता था।”

“‘के’ पीला-सा, दुबला-पतला लड़का था और उसके नाक-नक़्श लड़कियों की भाँति नाज़ुक थे। उसे बोलने में भी थोड़ी कठिनाई थी और वह ठीक से बात नहीं कर पाता था। जब कोई अजनबी उससे पहली बार मिलता था, मुझे लगता था कि वह उसे मानसिक रूप से अविकसित-सा मान लेता था। और चूँकि वह शारीरिक रूप से बहुत मज़बूत नहीं था, मैं अक्सर स्कूल में और स्कूल के बाद भी जब हम खेल रहे होते, अपने को उसके रक्षक की भूमिका में पाता था। कोई भी स्पष्ट देख सकता था कि मैं काफ़ी लम्बा-चौड़ा था, और खिलाड़ियों-सा मज़बूत भी। ‘के’ के साथ रहने में मुझे जो बात सबसे अच्छी लगती थी वह थी उसकी दयालुता और उसकी आत्मा की सुंदरता। उसके मस्तिष्क में वास्तव में कोई कमी नहीं थी लेकिन बोलने में उसकी परेशानी ने उसकी पढ़ाई-लिखाई में निश्चय ही समस्या उत्पन्न की थी और कक्षा में जाना उसके लिए काफ़ी परेशानी भरा  था। उसके भीतर चित्र बनाने की अद्भुत प्रतिभा थी। और जब कभी उसने अपनी पेंसिल अथवा पेण्ट-ब्रश उठाया, उसने जीवंतता से ओतप्रोत ऐसी तस्वीरों की रचना की कि उसके शिक्षक भी स्तम्भित रह गए। वह अक्सर प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीता करता था और प्रशस्तिपत्र प्राप्त किया करता था। यदि वह बिना किसी अवरोध के बड़ा हुआ होता तो, मेरी समझ से, उसने एक कलाकार के रूप में अपने लिए बहुत नाम पैदा किया होता। वह विशेष रूप से प्राकृतिक दृश्यों के चित्र बनाना बहुत पसंद करता था और समुद्र के चित्र बनाने हेतु निरंतर समुद्रतट तक जाया करता था। मैंने अनगिनत दिन उसकी बग़ल में बैठकर उसे अपने दुबले हाथों से काग़ज़ पर पेंसिल चलाते देखते हुए बिताये थे। जिस तरह से वह शुद्ध सफ़ेद काग़ज़ पर जीवंत आकार और रंग उकेरा करता था, उसने मुझे एक क्षण में ही अत्यंत गहराई तक प्रभावित किया था। वह सच में आश्चर्यजनक था। मैं अब भी जब उसके बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि वह वास्तव में किसी विशिष्ट प्रतिभा से कम नहीं था।”

“एक साल सितम्बर में, मैं जिस इलाक़े में रहता था वह एक भयानक तूफ़ान से घिर गया। रेडियो पर आ रही रिपोर्टों के अनुसार यह विगत दस वर्षों में आये किसी भी तूफ़ान से बड़ा तूफ़ान होने वाला था। विद्यालय जल्दी-जल्दी बंद कर दिए गए और क़स्बे की सभी दुकाने बंद कर दी गयीं और उनके शटर गिरा दिए गए। मेरे पिता और भाई औज़ारों का बक्सा निकाल लाये और घर के चारों ओर आंधी से बचाव के लिए विशेष रक्षक दरवाज़े लगाने लगे जब कि मेरी माँ किचन में जाकर आपातकाल के लिए कुछ भोजन बनाने लगीं। बोतलों में पानी भर दिया गया और हम सब ने अपने पिट्ठू ज़रूरी सामानों से भर लिए, ऐसे अवसर के लिए जब हमें एकाएक घर ख़ाली करके किसी और जगह जाना पड़े। उन प्रौढ़ों के लिए जो लगभग हर वर्ष तूफ़ान की विभीषिका का सामना करते थे, यह बस जीवन का शोरयुक्त ख़तरनाक तथ्य मात्र था, किन्तु हम बच्चों के लिए, जो कि उस स्थिति की कठिन सच्चाइयों से अनभिज्ञ थे, यह किसी अत्यधिक गतिशील उत्तेजनापूर्ण उत्सव से कम नहीं था।”

“दोपहर के ठीक बाद ही आसमान का रंग नाटकीय रूप से परिवर्तित होने लगा। उसमें कुछ अप्राकृतिक-सी चमक मिली हुई प्रतीत हो रही थी। हवा चिंघाड़ने लगी, सूखी हुई रेत की तरह विचित्र-सी शुष्क ध्वनि करती हुई। और मैं आसमान देखने हेतु बरामदे में चला गया जब तक कि वर्षा घर की दीवारों पर भयानक रूप से वार नहीं करने लगी। घर के अँधेरे में, तूफ़ान के लिए लगाए गए दरवाज़ों से घिरा पूरा परिवार एक कमरे में सिमट गया और रेडियो पर समाचार सुनने लगा। वर्षा की मात्रा उतनी अधिक नहीं थी लेकिन हवा के वेग से बहुत ख़तरा था। बहुत से मकानों की छतें उड़ गयी थीं और बहुत से जहाज़ पलट गए थे। हवा में उड़ती भारी चीज़ों से कई लोगों की जानें चली गयी थीं। उद्घोषक बार-बार चेतावनी दे रही थी कि किसी भी परिस्थिति में घर के बाहर न जाएँ। थोड़ी-थोड़ी देर पर हमें धड़ाम की आवाज़ सुनायी पड़ रही थी, जब कोई भारी चीज़ तूफ़ान वाले दरवाज़ों से टकराती थी। पिता जी ने बताया था कि वे सम्भवतः किसी दूसरे के घर के छत की टाइल्स थीं। हमने माँ द्वारा बनायी हुईं ‘ओनिगिरी’ (चावल से बना एक खाद्य) और कुछ तले हुए अण्डों का लंच किया और रेडियो पर समाचार सुनते रहे, तूफ़ान के हमें छोड़कर कहीं और जाने की प्रतीक्षा करते हुए।”

“किन्तु तूफ़ान नहीं गया। समाचारों के अनुसार जब तूफ़ान ‘एस’ प्रीफ़ेक्चर के पूर्वी भाग में पहुँचा, इसकी गति कम हो गयी और वह उत्तर पूरब की ओर किसी तेज़ी से टहलते हुए व्यक्ति की गति से बढ़ गया। हवा ज़रा भी कमज़ोर नहीं हुई और इस प्रकार की कठोर और कर्कश आवाज़ कर रही थी मानों वह पृथ्वी के तल को ही फाड़कर कहीं उड़ा ले जाने का प्रयत्न कर रही थी।”

“वह दुर्घर्ष हवा सम्भवतः अपने शुरू होने के एक घंटे बाद तक चलती रही। लेकिन फिर मैंने देखा कि चारों ओर एकदम शांति छा गयी थी। आप एक भी आवाज़ नहीं सुन सकते थे, किसी चिड़िया की दूर से आती आवाज़ भी नहीं। पिता जी ने एक दरवाज़ा थोड़ा-सा खोला और दरार में से, बाहर क्या हो रहा है, यह देखने के लिए झाँकने लगे। हवा बंद हो चुकी थी और वर्षा हल्की होती जा रही थी। घने भूरे बादल धीरे-धीरे दूर सरकते जा रहे थे। यहाँ-वहाँ नीला आसमान बादलों के मध्य में से झाँकने लगा था। बग़ीचे के पेड़ों से बारिश का पानी टपक रहा था और पत्तियों की नोक पर पानी की बूँदें अटकी हुई थीं।”

“अभी इस समय हम तूफ़ान के मध्य में हैं”, मेरे पिता ने मुझसे कहा, “थोड़ी देर के लिए, हो सकता है पंद्रह या बीस मिनट के लिए, हमें तूफ़ान से मोहलत मिलेगी। उसके बाद यह फिर तेज़ हो जाएगा, पहले ही की भाँति भयानक।”

“मैंने पिता जी से पूछा कि क्या मेरा बाहर जाना ठीक रहेगा।”

“थोड़ी दूर तक टहलना ठीक रहेगा”, पिता जी ने कहा, “जब तक कि तुम बहुत दूर न जाओ। लेकिन जैसे ही हवा ज़रा-सा भी तेज़ होने लगे तुम जल्दी से तुरंत घर वापस आ जाना।”

“मैं बाहर गया और चारों ओर देखने लगा। मैं विश्वास नहीं कर सकता था कि अभी कुछ ही मिनट पूर्व हर वस्तु भयंकर हवा द्वारा नष्ट-भ्रष्ट की जा रही थी। मैंने ऊपर आसमान की ओर देखा। मैं सोच रहा था कि तूफ़ान की विशाल आँख ऊपर वहाँ हम सब के ऊपर तैरती हुई, हमारी ओर अपशकुनी तरीक़े से देख रही थी। किन्तु वह मेरी बचकानी कल्पना मात्र थी। हम सभी वायु दबाव के विशाल भँवर के केंद्र में मात्र एक अस्थायी शांति के मध्य में थे।”

“जब बड़े लोग घरों के बाहर निकलकर हो चुके नुक़सान का जायज़ा ले रहे थे, मैंने समुद्रतट तक टहल आने का निर्णय लिया। पड़ोस में स्थित बहुत से वृक्षों के अंग हवा द्वारा नोचे जाकर सड़क पर पड़े थे। उनमें से कुछ तो चीड़ की इतनी मोटी शाखाएँ थीं जिन्हें वयस्क लोग भी अकेले न उठा पाते। छतों की टूटी हुई खपरैलें चारों तरफ़ ज़मीन पर बिखरी हुई थीं। एक चट्टान एक कार के सामने के शीशे पर गिरी थी और उसमें बड़ा-सा छेद कर दिया था। वहाँ कहीं से उड़कर आया हुआ एक डॉगहाउस भी पड़ा हुआ था। सारा परिदृश्य यूँ लग रहा था मानों आसमान से किसी महाकाय हाथ ने आकर चुपचाप धरती के तल पर पोछा-सा लगा दिया हो। जब मैं सड़क पर टहल रहा था, ‘के’ ने मुझे ढूँढ लिया और अपने घर से बाहर आ गया। तुम कहाँ जा रहे हो? ‘के’ ने पूछा। जब मैंने बताया कि मैं समुद्रतट की ओर एक चक्कर लगाने जा रहा हूँ, ‘के’ बिना एक भी शब्द कहे मेरे पीछे हो लिया। एक छोटा सफ़ेद कुत्ता था जो ‘के’ के घर रहता था, वह भी हम दोनों के पीछे हो लिया। ‘यदि हवा ज़रा भी तेज़ हुई तो तुरंत घर वापस लौटना होगा’, मैंने ‘के’ से कहा और जवाब में उसने ख़ामोशी से सिर हिलाया।”

“समुद्र मेरे घर से 200 मीटर से अधिक दूर नहीं था। वहाँ एक तटबंध भी था जो उस समय की मेरी ऊँचाई जितना ही ऊँचा था, कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर हम समुद्र के किनारे पहुँच गए। हम लगभग प्रतिदिन ही समुद्रतट पर खेलने आते थे और समुद्रतट के इस हिस्से को हम अपनी हथेलियों के पृष्ठ भाग की भाँति पहचानते थे। किन्तु तूफ़ान की अवधि में चीज़ें सामान्य की तुलना में भिन्न महसूस हो रही थीं। आसमान का रंग, समुद्र का रंग, लहरों का तट से टकराना, नमक की गंध, दृश्य का विस्तार, उस समुद्रतट की सीमा की हर चीज़ परिवर्तित हो चुकी थी। हम तटबंध पर कुछ क्षणों तक बैठे रहे और शब्दहीन बस समुद्र को निहारते रहे। तब जब हम एक तूफ़ान के मध्य में थे, लहरें भयानक रूप से स्थिर थीं। जब लहरें टकराती थीं, वे सामान्य से अधिक दूर तक वापस लौटती थीं। सफ़ेद रेत वाला समुद्रतट हमारे देखते-देखते चौड़ा होता जा रहा था। उतरते ज्वार के समय भी लहरें कभी इतना पीछे तक वापस नहीं जाती थीं। यह एक विशाल कमरे की भाँति लग रहा था जो सारा फ़र्नीचर हटा दिए जाने के पश्चात् असहनीय रूप से रिक्त दिखने लगा हो। बहकर आए हुए जहाज़ों के टुकड़े सामान्य रूप से एक पंक्ति से किनारे पर पड़े हुए थे।”

“मैं दीवार से नीचे उतर गया और आसमान पर नज़र गड़ाए हुए दूर तक फैले हुए समुद्रतट पर टहलने लगा। मैं वहाँ इकठ्ठा कबाड़ को ध्यान से देखने लगा। प्लास्टिक के खिलौने और चप्पलें और लकड़ी के टुकड़े जो कभी फ़र्नीचर के हिस्से रहे होंगे और कपड़े और बोतलें और लकड़ी के बक्से जिन पर विदेशी भाषाओं में लिखावटें थी और अन्य अज्ञात चीज़ें जहाँ तक निगाह जाती थी वहाँ तक बिखरी हुई थीं। लगता था विशाल लहरें उन्हें कहीं बहुत दूर के स्थानों से बहा ले आयी थीं। ‘के’ का कुत्ता पूँछ हिलाते हुए हमारे पास खड़ा था और हर उस चीज़ को सूँघ रहा था जिसे हम उठाते थे।”

“हम वहाँ अधिक से अधिक पाँच मिनट रहे होंगे कि एकाएक मैंने देखा कि लहरें समुद्रतट की ओर आने लगी थीं। बिना किसी आवाज़ के, बिना किसी संकेत के समुद्र की स्वेत जिह्वा बिलकुल हमारे पैरों तक चली आयी थी। कोई तरीक़ा नहीं था जिससे मैंने उनका पूर्वानुमान लगाया होता। समुद्र के किनारे पला-बढ़ा होने के कारण मैं अच्छी तरह जानता था कि वे क्या आतंक बरपा कर सकने में सक्षम थीं। मैं जानता था कि कई अवसरों पर वे कल्पनातीत क्रूरता करने में सक्षम थीं। इसलिए सारी सावधानी बरतते हुए हम जहाँ टहल रहे थे वहाँ से दूर एक सुरक्षित से लग रहे स्थान की ओर चले गए। लेकिन मुझे पता चले इसके पूर्व ही लहरें जहाँ मैं खड़ा था, उसके आठ इंच पास तक चली आयीं और फिर बिना आवाज़ किये वापस चली गयीं। और फिर वे वापस नहीं आयीं। उन लहरों के सम्बन्ध में कुछ भी डरावना नहीं था। वे ख़ामोशी से समुद्रतट की धुलाई कर रही थीं। किन्तु उनमें कुछ था जो रहस्यात्मक और भयानक रूप से अपशकुनी था, किसी सरीसृप की खाल की भाँति, साँप जैसी अनुभूति। तत्काल ही मेरी रीढ़ में ठण्डक-सी दौड़ गयी। यह बिना किसी स्पष्ट कारण के पैदा हुआ भय था। किन्तु यह जो भी रहा हो एक वास्तविक और सच्चा भय था। मुझे अपनी सहज बुद्धि से यह भान हुआ कि यह कोई जीवित चीज़ थी। कोई ग़लती नहीं हो सकती थी। वे लहरें ज़िन्दा थीं। वे लहरे मुझे पकड़ लेतीं और अपनी इच्छानुसार मुझसे खेलतीं। और मैंने कल्पना की कि एक विशाल मांसाहारी मुझ पर झुक गया था और अपने तीखे दाँतों से मुझे उधेड़ रहा था। हवा कहीं दूर मैदानों में घात लगाए हुए थी। अब हमें वहाँ से निकल जाना चाहिए। मैंने ख़ुद से सोचा।

“मैं ‘के’ की ओर मुड़ा और बोला ‘हे, आओ वापस चलें’। वह मेरी ओर पीठ किये मुझसे लगभग दस गज़ दूर खड़ा था और किसी चीज़ को ध्यान से देख रहा था, मानों यह उसका प्रतिबिम्ब हो। मैंने काफ़ी तेज़ आवाज़ में उसे पुकारा था पर ऐसा लगा मानों ‘के’ ने मुझे सुना ही न हो। अथवा वह उस चीज़ को, जिसे उसने ढूँढा था, देखने में इतना अधिक मग्न था कि मेरी आवाज़ उसके कानों तक न पहुँच पायी। जैसे वह किसी स्वप्न में हो, बाह्य संसार को भूलकर। अथवा मेरी आवाज़ सम्भवतः उतनी तेज़ नहीं थी जितना मैंने सोचा था। मुझे स्पष्ट रूप से स्मरण है कि उसकी ध्वनि मेरी आवाज़ जैसी नहीं थी। उसकी ध्वनि एकदम किसी अन्य व्यक्ति की आवाज़ की सी थी।”

“तभी मैंने एक दहाड़ सुनी। यह धरती को कम्पित करने जितनी तीव्र लग रही थी। नहीं, लेकिन इस दहाड़ के पूर्व एक और आवाज़ थी जो सुनी जा सकती थी। यह ढेर सारे जल के किस छिद्र में से होकर गुज़रने की विचित्र आवाज़ थी। इस दूसरी आवाज़ के कुछ समय तक जारी रहने के पश्चात्, एक लगभग अकल्पनीय-सी दहाड़ की आवाज़ आयी, दूर कहीं किसी विकट भूकम्प की सी आवाज़। किन्तु अब भी ‘के’ ने मेरी ओर नहीं देखा। वह अब भी बिना विचलित हुए अपने पैरों के पास किसी चीज़ को देखता हुआ खड़ा रहा। उसकी सम्पूर्ण चेतना उसी चीज़ पर एकाग्र थी। ‘के’ ने सम्भवतः वह दहाड़ भी नहीं सुनी थी। मैं नहीं जान सका कि उसने वह भीषण आवाज़ कैसे नहीं सुनी जो धरती तक को कँपा देने में सक्षम थी। हो सकता है यह ऐसी आवाज़ रही हो जो केवल मैं सुन सकता था। यह सुनने में विचित्र लग सकता है लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि क्या वह आवाज़ केवल मेरे कानों तक पहुँचने के लिए बनी थी? यही नहीं, उसकी बग़ल में खड़े हुए कुत्ते ने भी वह आवाज़ नहीं सुनी। जबकि सब बातों के बाद, कुत्तों की सुनने की क्षमता विशेष रूप से तीव्र होती है।”

“मैंने सोचा, मुझे उसके पास जाकर उसे खींचकर दूर ले जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में अन्य कोई रास्ता नहीं था। मैं जानता था कि वह लहर आ रही थी और ‘के’ यह नहीं जानता था। मेरे पाँव, जो यह जानते थे कि क्या घटित होने वाला था, मेरी इच्छा के विरुद्ध दूसरी ओर चल दिए, बिलकुल विपरीत दिशा में। मैं तटबंध की ओर अकेले ही भागा। मेरा अनुमान है कि यह अत्यधिक भय था जिसने मुझे ऐसा करने के लिए मजबूर किया। इसने मुझसे मेरी आवाज़ छीन ली लेकिन मेरे पैरों को काफ़ी तेज़ी से भाग जाने लायक़ बना दिया था। मैं नरम बालू वाले समुद्रतट पर गिरता-पड़ता भागा और दूर पहुँचकर मुड़ा और ‘के’ के लिए चिल्लाया।”

“‘देखो, एक लहर आ रही है’, मैं तेज़ आवाज़ में चिल्लाया। तब मैंने महसूस किया कि गड़गड़ाहट जैसी आवाज़ रुक चुकी थी। ‘के’ ने आख़िरकार मेरा चिल्लाना सुना और अपना सिर उठाया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ठीक उसी क्षण, एक दैत्याकार लहर उठी, डसने को तैयार नाग के फन की भाँति, और तट से टकरायी। मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में उस तरह की कोई चीज़ नहीं देखी थी। यह किसी तिमंज़िला ईमारत से भी ऊँची थी। इसने मुश्किल ही ज़रा-सी भी आवाज़ की हो (अथवा कम से कम मेरी स्मृति में इसकी कोई आवाज़ नहीं संचित है, मेरी स्मृति में यह बिना आवाज़ के आयी) और इतनी ऊँची उठी कि ”के’ के पीछे का सारा आकाश ही ढँक गया। उसने एक क्षण को मेरी ओर कुछ न समझ पाने के भाव से देखा। किन्तु उसी समय ऐसा लगा कि उसे कुछ भान हो गया है और वह वापस मुड़ा। वह बच निकलने का प्रयत्न कर रहा था। किन्तु बचाव का कोई रास्ता नहीं था। अगले ही क्षण, लहर उसे निगल चुकी थी। यह पूरी गति से दौड़ रहे असंवेदनशील रेल-इंजन के साथ टक्कर जैसा था।”

“गड़गड़ाहट की आवाज़ ऊँची होने लगी और लहर अत्यंत ज़ोर से समुद्रतट को रौंदती हुई टूट गयी, और मानों कोई विस्फोट हुआ हो, उसके अंश टूटकर हवा में उड़ते हुए मुझ पर बरसने को तटबंध तक आ गए। किन्तु चूँकि मैं दीवार के पीछे छिपा हुआ था, वे मेरे पास से गुज़र गए। बस बौछारों का जो विस्तार उसके ऊपर तक आ सका, वह मेरे कपड़े भिगो गया। फिर मैं तेज़ी से तटबंध पर चढ़ा और मैंने ख़ाली हो चुके समुद्रतट की ओर देखा। लहर अपनी निर्मम गर्जना के साथ पूरी गति से समुद्र में वापस पलट रही थी। ऐसा दिख रहा था मानों किसी ने भूमि के सुदूर किनारे पर एक अत्यंत विशाल कालीन बिछा दिया हो। मैं जितना ज़ोर लगाकर देख सकता था देखता रहा किन्तु ‘के’ का कहीं कोई चिह्न नहीं था। एक साँस में ही लहर समुद्र में इतनी दूर चली गयी थी कि लगा मानों महासागर ही सूख रहा है और समुद्रतल दिखलायी पड़ने लगेगा। मैं अकेला समुद्री दीवार पर खड़ा काँप रहा था।”

“ख़ामोशी लौट आयी, यह एक आशाविहीन ख़ामोशी थी मानों संसार से सारी आवाज़ें अत्यंत हिंसक तरीक़े से नोच ली गयी हों। ‘के’ को निगले हुए ही लहर बहुत दूर चली गयी। मैं अनुमान लगाना शुरू नहीं कर सका कि मुझे आगे क्या करना चाहिए। मैंने सोचा मुझे नीचे समुद्रतट तक जाना चाहिए, हो सकता है, संयोगवश ‘के’ कहीं पास ही रेत में ढँका पड़ा हो…। फिर मैंने अपना इरादा बदल दिया और मैं तटबंध के ऊपर से कहीं नहीं गया। मैंने अनुभव से सीखा था कि इस प्रकार की विशालकाय लहरें एक साथ दो से तीन बार आ सकती हैं।”

“मैं स्मरण नहीं कर सकता कि कितना समय बीता होगा। मैं सोचता हूँ सम्भवतः बहुत लम्बा समय नहीं बीता रहा होगा। दस या बीस सेकेंड्स, अथवा ऐसा ही कुछ। किसी भी रूप में, उस अभेद्य अंतराल के पश्चात्, जैसा कि मैंने अपेक्षा की थी, तट से टकराने को लहर फिर से लौटी। पहले की ही भाँति गड़गड़ाहट की ध्वनि ने धरती को पुनः बुरी तरह हिला दिया, शोर समाप्त हुआ, और अंत में लहर ने नाग की भाँति अपना फन उठाया। सब कुछ बिलकुल पहली बार की ही भाँति। उसने आकाश को आच्छादित कर लिया और मुझे सामने से किसी नाशवान क्लिफ़ के अंतिम छोर की भाँति घेर लिया। किन्तु इस बार भागने को कोई जगह न थी। जादू से बंधे हुए की भाँति मैं अपनी ओर बढ़ते अपने अंत को देखता हुआ तटबंध पर काष्ठवत् खड़ा रहा। मेरे भीतर यह भावना-सी भर गयी थी कि ‘के’ के पहले ही चले जाने के पश्चात्, अब भागने का कोई प्रयोजन नहीं था। अथवा पुनः, ज़बरदस्त भय के सम्मुख, मैं सिवाय निष्क्रिय खड़े रहने के और कुछ कर न सका। मुझे अब यह स्पष्ट रूप से स्मरण नहीं है कि वह क्या था।”

“दूसरी लहर बिलकुल पहली लहर जैसी ही विशाल थी। नहीं, यह उससे भी बड़ी थी। ईंटों की गिरती हुई विशाल दीवार की भाँति, पहले यह धीरे-धीरे विरूपित हुई, फिर ऊपर से ध्वस्त हो गयी। यह बहुत ही विशाल थी और किसी वास्तविक लहर जैसी बिलकुल नहीं दिख रही थी। यह किसी बिलकुल अलग ही चीज़ जैसी लग रही थी जिसने लहर का आकार ग्रहण कर लिया हो। किसी भिन्न दुनिया से आयी हुई लहर के आकार की कोई पूर्णरूपेण भिन्न वस्तु। मैंने अपने निश्चय को और मज़बूत किया और उस क्षण तक प्रतीक्षा की जब तक अँधेरे ने मुझे आच्छादित न कर लिया। मैंने अपनी आँखें तक बंद नहीं कीं। मुझे अपनी धड़कनों की आवाज़ सुनायी पड़ने की स्मृति है। यद्यपि जब लहर एकदम मेरे सामने थी मेरी धड़कनें रुक गयी थीं और हवा में तैरने लगी थीं, जैसे उन्होंने एकाएक अपनी शक्ति खो दी हो। ऐसा मात्र एक क्षण के लिए हुआ किन्तु उसी क्षण लहर वहाँ लटकी रही, टूटने के मध्य में, और रुक गयी। और लहर के शिखर के झाग में, उस बुरी, पारदर्शी जिह्वा के मध्य में, मैंने ‘के’ के आकार को स्पष्ट रूप से पहचान लिया था।”

“सम्भवतः आप सब इस तरह की बात में विश्वास नहीं कर सकते। ऐसा सम्भवतः अवश्यम्भावी है। स्पष्ट कहूँ तो मैं स्वयं भी अब तक समझ नहीं पाया कि कैसे इस प्रकार की कोई चीज़ घटित हो सकती थी। निश्चय ही इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है। किन्तु न तो यह कोई स्वप्न था न ही कोई भ्रम था। यह बिलकुल इसी प्रकार, बिना ज़रा से भी जोड़-घटाने के, घटित हुआ था। जैसे किसी पारदर्शी कैप्सूल में बंद हो, ‘के’ करवट के बल लहर की चोटी पर तैर रहा था। और यही सब कुछ नहीं था। ‘के’ मेरे ऊपर हँस रहा था। वहीं, ठीक मेरी आँखों के आगे, इतने पास कि मैं उसे पास पहुँचकर छू सकता था। मैं अपने सबसे अच्छे दोस्त की शक्ल पहचान सकता था, जो मात्र कुछ क्षणों पूर्व ही लहर द्वारा निगल लिया गया था। कोई ग़लती नहीं हो रही थी। उसने मुझ पर हँसना शुरू कर दिया था। और यह कोई साधारण हँसी भी नहीं थी। उसकी मुस्कराहट एक कान से दूसरे कान तक फैली हुई थी। फिर उसके चेहरे के भाव ठण्डे और कठोर हो गए और उसने अपनी दृष्टि मुझ पर स्थिर कर दी। उसने अपना दाहिना हाथ मेरी ओर बढ़ाया। मानों वह मेरा हाथ पकड़ना चाहता था और मुझे उस दुनिया में खींच ले जाना चाहता था। यद्यपि उसका हाथ मुझे पकड़ पाने में असफल रहा। फिर ‘के’ ने अपना मुँह और ज़्यादा खोला और एक बार फिर हँसा।”

“मेरा अनुमान है कि उसके बाद मेरी चेतना जाती रही। अगली बात जो मुझे स्मरण है, वह यह कि मैं अपने पिता के अस्पताल के बिस्तर पर था। जब मैंने अपनी आँखें खोलीं, एक नर्स मेरे पिता जी को बुलाने चली गयी और वे तत्काल भागते हुए आये। उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी और मेरी धड़कने गिनने लगे। मेरी पुतलियों का परिक्षण किया और मेरा ज्वर जाँचने हेतु मेरे माथे पर हाथ रखा। मैंने अपना हाथ हिलाना चाहा लेकिन मेरे लिए उसे उठा पाना असम्भव था। मुझे ऐसा बुख़ार था जैसे मेरी पूरी देह आग में जल रही हो। मैं मतिभ्रमित-सा था और कुछ भी विचार कर पाने में अक्षम था। ऐसा महसूस हुआ जैसे मुझे तेज़ बुख़ार काफ़ी समय से था।

‘तुम सीधे तीन दिन से सो रहे हो’, मेरे पिता ने कहा। ‘एक पड़ोसी, जो थोड़ी दूरी से सारी बात देख रहा था, ने जब मुझे गिरते हुए देखा तब मुझे उठाया और घर ले आया था। ‘के’ को लहर बहा ले गयी और हम अब भी नहीं जानते कि वह कहाँ है’, मेरे पिता ने कहा। मैं जानता था कि कुछ था जो मैं अपने पिता से कहना चाह रहा था। कुछ था जो मैं अपने पिता से कहना चाहता था। किन्तु मेरी जीभ सूजी हुई और सुन्न थी। मेरे मुँह से मेरे शब्द नहीं निकल सके। मुझे महसूस हुआ कि किसी बिलकुल भिन्न प्रकार के प्राणी ने मेरे मुँह में घर बना लिया है। मेरे पिता ने मुझसे मेरा नाम पूछा। मैंने अपना नाम याद करने का प्रयत्न किया किन्तु इसके पूर्व कि वह मेरे मस्तिष्क में आता, मेरी चेतना पुनः लुप्त हो गयी और मैं अँधेरे में वापस गिर पड़ा।”

“मैं एक हफ़्ते तक बिस्तर पर पड़ा रहा और मेरे हाथ में आई-वी ट्यूब लगी रही। मुझे अनेक बार उल्टियाँ हुईं और भयानक दुःस्वप्न आये। उस पूरे समय मेरे पिता इस बात को लेकर चिंतित रहे कि कहीं तीव्र मानसिक आघात और उच्च ज्वर से मेरे मस्तिष्क को स्थायी क्षति न पहुँचे। मेरी स्थिति इतनी गम्भीर थी कि यदि ऐसा हो जाता तो कोई असामान्य बात न होती। किन्तु किसी प्रकार मेरी देह धीरे-धीरे पुरानी अवस्था में आने लगी। अनेक हफ़्तों के अंतराल में मैं क्रमिक रूप से अपने पुराने जीवन में लौटने लगा। मैं सामान्य भोजन करने लगा और वापस विद्यालय जाने लगा। किन्तु निश्चय ही हर चीज़ वैसी नहीं रह गयी थी जैसी वह पहले थी।”

“‘के’ का शव कभी नहीं प्राप्त हुआ। वह कुत्ता भी जिसे लहर ने ‘के’ के साथ ही निगल लिया था, फिर कभी नहीं देखा गया। सामान्यतः जो लोग समुद्रतट के उस हिस्से में डूबते थे, वे ज्वार के समय बहकर पूरब की ओर स्थित छोटी-सी अंतर्धारा के किनारे तक चले आते थे और कुछ दिनों पश्चात् तट की ओर बह आते थे। लेकिन ‘के’ की देह का क्या हुआ, यह कभी पता नहीं चला। हो सकता है कि उस लहर के अपरिमित आकार ने उस तूफ़ान के दौरान उसकी देह को समुद्र में इतनी दूर पहुँचा दिया हो कि वह कभी वापस तट तक न आ सकी हो। वह सम्भवतः महासागर की गहराई में कहीं डूब गया और मछलियों का भोजन बन गया। ‘के’ के शव की तलाश स्थानीय मछुआरों के सहयोग से काफ़ी लम्बे समय तक जारी रही किन्तु किसी बिंदु पर कमज़ोर पड़ गयी और अंत में रुक गयी। चूँकि सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ शव ही नहीं था, इसलिए उसकी कोई अंत्येष्टि नहीं हुई। तब से, ‘के’ के माता-पिता समुद्रतट पर प्रतिदिन इधर से उधर निरुद्देश्य टहलते हुए अथवा घर में बंद होकर मन्त्रों का जाप करते हुए दुःख से लगभग आधे पागल से हो गए थे।”

“इतना कठिन आघात सहने के पश्चात् भी ‘के’ के माता-पिता ने एक बार भी कभी मुझे उसे समुद्रतट पर ले जाने हेतु दोष नहीं दिया। वे अच्छी तरह जानते थे कि उस क्षण के पूर्व तक मैं उसे अपने ख़ुद के भाई की भाँति प्यार करता था और उसे बहुत बहुमूल्य मानता था। मेरे माता-पिता भी मेरी उपस्थिति में उस विषय पर चर्चा से बचते थे। किन्तु मैं यह जानता था। यदि मैं इसके सम्बन्ध में थोड़ा भी सोचता, मैं जानता था कि मैं ‘के’ को बचा सकता था। मुझे पूरा विश्वास है कि वह जहाँ खड़ा था, मैं वहाँ तक जा सकता था और किसी ऐसी जगह ले जा सकता था जहाँ वह लहर, जो उसे बहा ले गयी, उस तक पहुँच पाने में सक्षम न होती। यह निश्चय ही काफ़ी ख़तरनाक होता किन्तु जब भी मैं अपनी इस घटना की स्मृतियों और समय की मात्रा के विवरण में जाता हूँ, मैं सोचता हूँ मैं उसे बचा लेता। किन्तु, जैसा कि मैंने पहले कहा, मैं अपरिमित भय से त्रस्त हो गया था, और अपने को बचने हेतु ‘के’ को छोड़ दिया। चूँकि ‘के’ के माता-पिता ने मुझे दोष नहीं दिया और अन्य हर व्यक्ति इस घटना के सम्बन्ध में बात करने से ऐसे कतराता था, मानों यह कोई छूत की बीमारी हो, मुझे बहुत पीड़ा झेलनी पड़ी। एक लम्बे समय तक, मैं उस मनोवैज्ञानिक झटके से उबर पाने में अक्षम रहा। मैं स्कूल नहीं गया। मैं ठीक से खाना नहीं खाता था, मैं बस अपनी पीठ के बल लेटा हुआ छत को देखा करता था।”

“चाहे जितनी ही मैंने कोशिश की, लहर के शिखर पर के झाग में झुके ‘के’ को और उसके चहरे पर की प्रसन्न मुस्कान को मैं नहीं भूल सका। न ही मैं उसके हाथों की एक-एक उँगलियों को भुला सका जो मेरी ओर सहायता हेतु बुलाती-सी बढ़ रही थीं। जब मैं सोने जाता, वह चेहरा, वे ऑंखें मेरे स्वप्नों में भी दिखतीं मानों वह मेरे लिए अधीरता से प्रतीक्षारत हों। इन स्वप्नों में ‘के’ झाग के अपने कैप्सूल से बाहर कूद पड़ता, मुझे कलाई से पकड़ता और मुझे लहर के भीतर खींच ले जाता।”

“और मुझे एक दूसरे तरह के भी स्वप्न आते। इन स्वप्नों में मैं समुद्र में तैर रहा होता। यह गर्मियों का ख़ूबसूरत अपराह्न होता, और मैं शांत जल में समुद्र में दूर तक तैरता चला जाता। सूरज मेरी पीठ पर जल रहा होता, और जल मेरी देह के चारों ओर कोमलता से लिपटा होता। लेकिन तभी पानी में से कोई चीज़ मेरा दायाँ पाँव पकड़ लेती। मैं अपने टखने के चारों ओर बर्फ़ जैसी ठण्डी पकड़ अनुभव करता। यह पकड़ बहुत मज़बूत होती और मैं उसे झटक नहीं पाता। और बिलकुल उसी की भाँति मैं गहराई में नीचे खींच लिया जाता। मैं वहाँ ‘के’ का चेहरा देखता। उसी बार की भाँति, वह सीधे मेरी ओर देख रहा था, उसका चेहरा उस विशाल मुस्कराहट से लगभग दो हिस्सों में बँट-सा गया था। मैंने चीख़ने की कोशिश की, किन्तु कोई आवाज़ नहीं निकली। मैं पानी पीने लगा। मेरे फेफड़े पानी से भर गए।”

“मैं अँधेरे में जाग गया, चीख़ता हुआ, पसीने से भीगा, उखड़ी साँसों के साथ।”

“साल के अंत में मैंने अपने माता-पिता से मुझे उस क़स्बे को छोड़कर तत्काल कहीं और रहने भेज देने के लिए विनती की। मैं उसी समुद्रतट पर नहीं रह सकता था जहाँ ‘के’ विशाल लहर द्वारा बहा ले जाया गया था और मुझे लगभग हर रात, जैसा कि आप जानते हैं, दुःस्वप्न आते थे। उस जगह से पर्याप्त दूर कोई स्थान। यदि मैं ऐसा न कर सका होता तो मैं आख़िर में सम्भवतः पागल हो जाता। जब उन्होंने मेरा अनुरोध सुना, तो मेरे पिता ने मुझे दूसरी जगह भेजने हेतु व्यवस्था कर दी। जनवरी में मैं नागानो प्रिफ़ेक्चर चला आया और वहाँ एक पब्लिक एलिमेंट्री स्कूल में पढ़ने जाने लगा। मेरे पिता का पारिवारिक घर पास ही था और मुझे वहाँ रहने की अनुमति मिल गयी। मैंने वहीं से जूनियर हाईस्कूल, फिर हाईस्कूल पास किया। जब छुट्टियाँ आतीं, मैं कभी वापस अपने घर नहीं जाता था। अक्सर मेरे माता-पिता ही मुझे देखने आया करते थे।”

“और आज भी मैं नागानो में ही रह रहा हूँ। मैं नागानो शहर के एक तकनीकी कॉलेज से स्नातक हूँ। एक प्रिसिशन मशीनरी कम्पनी में मुझे काम मिल गया था और उसी के कारण हम आज यहाँ हैं। मेरा जीवन और करियर एकदम साधारण आदमी जैसे हैं। जैसा कि आप देख सकते हैं, मुझमें कुछ भी विशिष्ट रूप से औरों से भिन्न नहीं है। मैं बहुत सामाजिक व्यक्ति नहीं हूँ, किन्तु मुझे पर्वतारोहण में आनंद आता है। उसके कारण मेरे कई क़रीबी मित्र हैं। जैसे ही मैं क़स्बे से चला आया, मुझे दुःस्वप्न आने कम होने लगे, लगभग पहले जैसे। लेकिन वे पूरी तरह से मेरे जीवन से गए भी नहीं। वे समय-समय पर वापस आते रहते हैं, बिल वसूली करने वाले की तरह दरवाज़े पर दस्तक देते हुए। ज्यों ही मैं भूलना प्रारम्भ करता हूँ, वे वहाँ होते हैं। सपने हमेशा ही एकदम एक जैसे होते हैं, सूक्ष्म से सूक्ष्म विवरण तक भी। जब भी ऐसा होता है, मैं चीख़ता हुआ जाग जाता हूँ। मेरी चादरें पसीने से भीगी हुई होती हैं।”

“सम्भवतः इसी कारण मैंने कभी विवाह नहीं किया। मैं, जो कोई भी मेरी बग़ल में सोया हो, उसे निरंतर दो या तीन बजे रात को अपनी चीख़ों से जगाए रखना नहीं चाहता था। कई महिलाएँ थीं जिन्हें मैं काफ़ी पसंद करता था। लेकिन उनमें से किसी के साथ भी मैंने रात नहीं बितायी। भय मेरी अस्थि-मज्जा में भरा हुआ था और यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे किसी के साथ बाँट पाना सम्भव होता।”

“इस बिंदु पर मैं चालीस साल से ऊपर का हूँ और मैं कभी अपने गृह-नगर वापस नहीं गया और न ही मैं उस समुद्रतट के आसपास गया। यह केवल उसी समुद्रतट की बात नहीं थी बल्कि किसी समुद्र के निकट जाने की मैं हिम्मत नहीं जुटा पाता। मुझे भय था कि यदि मैं कहीं वास्तव में समुद्र के पास गया तो मेरी सपनों की बातें सचमुच मेरे साथ घटित हो जाएँगी। एक समय, मैं तैरने को किसी अन्य बात के मुक़ाबले अधिक पसंद करता था किन्तु उस समय के बाद मैं किसी तरणताल में भी तैरने में सक्षम नहीं हो पाया। मैं किसी गहरी नदी अथवा ज्वार के पास नहीं जा सकता था। मैं समुद्री जहाज़ों पर चढ़ने से बचता रहा। मैं किसी हवाई जहाज़ से भी समुद्र पार की यात्रा पर नहीं गया। मैं अपने मस्तिष्क से किसी अज्ञात जगह पर डूब जाने की छवि को नहीं कुरेद पाया। मेरे सपनों में ‘के’ के ठण्डे हाथों की भाँति मैं अपनी चेतना से उस अँधेरे पूर्वाभास को नहीं झटक पाया।”

“पिछले वर्ष की बसंत में मैं ‘के’ के हमसे छीन लिए जाने की जगह पर पहली बार फिर से गया था।”

“पिता का पिछले वर्ष देहावसान हो गया था और भाई ने पारिवारिक मकान बेच दिया था ताकि विक्रय धन आपस में बाँटा जा सके। जब वह स्टोर वाले कमरे को व्यवस्थित कर रहा था, उसे मेरी बचपन की चीज़ों से भरा एक गत्ते का बॉक्स मिला जिसे उसने मेरे पास भेज दिया। ज़्यादातर चीज़ें बेकार का कबाड़ थीं किन्तु काफ़ी नीचे दबे तस्वीरों के बण्डल, जो ‘के’ ने मेरे लिए पेण्ट की थीं, ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। मैं सोचता हूँ उन्हें ‘के’ के माता-पिता ने मुझे ‘के’ की स्मृति स्वरूप दिया था। भय इतना अधिक था कि मेरी साँस उखड़ गयी। मुझे अनुभव हुआ मानों ‘के’ की आत्मा मेरे समक्ष उन तस्वीरों में पुनर्जीवित हो गयी हो। मैंने उन्हें फिर उनके पतले वेष्ठन में तत्काल नष्ट करने की मंशा से लपेट दिया और बॉक्स में वापस रख दिया। जो भी कारण रहा हो, लेकिन मैं ‘के’ की बनायीं तस्वीरों को दूर फेंक पाने में सक्षम न हो सका। कई दिनों बाद, बिलकुल अपनी धैर्य की सीमा पर पहुँचकर मैंने ‘के’ की जल रंगों से बनायीं तस्वीरों पर से काग़ज़ के आवरण को फाड़ा और उसे पूरी दृढ़ता से हाथ में लिया।”

“लगभग वे सभी भूदृश्यावलियाँ थी, परिचित समुद्र और समुद्रतट, जंगल और दुकानें, सभी ‘के’ के विशिष्ट रंगों में बने हुए। वे एक सीमा तक बदरंग नहीं हुई थीं और वे निशान जो मैंने वर्षों पूर्व देखे थे अब भी वहाँ मौजूद थे और ऐसे लग रहे थे जैसे अभी ताज़े हों। जैसे ही मैंने तस्वीर को अपने हाथ में लिया, इसके पूर्व कि मुझे उसे वास्तव में देख पाने का अवसर मिलता, मैं उत्कण्ठा और पछतावे से उद्वेलित हो गया। वे तस्वीरें बहुत अधिक कुशलता के साथ बनायी गयी थीं, और कलाकृति के रूप में उससे बहुत श्रेष्ठ थीं जैसा होने के सम्बन्ध में मुझे स्मरण था। वास्तव में उन तस्वीरों में मैं ‘के’ की आत्मा की गहन उपस्थिति महसूस कर सकता था मानों जैसे वह मेरी ही हो। मैं यह समझ पाने में पूरी तरह सक्षम रहा कि ‘के’ अपने आसपास की दुनिया को कैसे देखता था। जैसे ही मैंने उन तस्वीरों की ओर देखा, वे चीज़ें जो मैंने ‘के’ के साथ-साथ की थीं, और जगहें जहाँ हम साथ-साथ गए थे, मेरी स्मृति में एक के बाद एक तेज़ी से आप्लावित होने लगीं। हाँ यही हुआ। मानों वे मेरी व्यक्तिगत पूर्वानुभूतियाँ रही हों। अब मैं दुनिया को भिन्न तरीक़े से और एकदम स्पष्ट देख सकता था, बिलकुल वैसे ही जैसा तब था, जब हम दोनों अगल-बग़ल खड़े हुए होते थे।”

“हर दिन जब मैं काम से घर लौटता, मैं उन तस्वीरों में से एक को हाथ में लेता और उसे देखता रहता। मैं उन्हें अनंतकाल तक देखता रह सकता था। उनमें मेरी युवावस्था की ख़ूबसूरत छवियाँ थीं जिन्हें मैंने लम्बे समय पूर्व ही अपने मस्तिष्क से निकाल बाहर किया था। जब मैं ‘के’ की तस्वीरों को देखता, मुझे अनुभूति होती कि वे मेरी देह के केंद्र की ओर रिस रही हैं।”

“फिर, लगभग एक सप्ताह बीतने के पश्चात्, मैं एक नये विचार से हक्का-बक्का रह गया। क्या मेरी पहले की सोच सम्भवतः पूरी तरह ग़लत नहीं थी? जब ‘के’ उस लहर के झाग में पड़ा हुआ था, क्या वह वास्तव में मुझसे घृणा कर रहा था और नाराज़ था? अथवा नहीं, शायद वह मुझे कहीं अन्यत्र स्थानांतरित करने का प्रयत्न कर रहा था। उसके चहरे पर की वह विद्रूप मुस्कान, मात्र एक सामान्य मुस्कराहट भी तो हो सकती थी? क्या वह उस क्षण तक बेहोश नहीं हो गया होगा? अथवा क्या वह मुझे, हमारे अंतिम रूप से बिछड़ने के पूर्व, आख़िरी बार अपनी स्नेहिल मुस्कान नहीं प्रेषित करना चाह रहा हो सकता था? क्या तीव्र घृणा का वह रंग जो मैंने उसके चहरे पर देखा था, मेरे स्वयं के गहन भय का प्रक्षेपण नहीं हो हो सकता था?…। जैसे-जैसे मैंने ‘के’ के उन पुराने जलरंगों वाले चित्रों का परिक्षण किया, इस दिशा में मेरे विचार निरंतर मज़बूत होते गए। मैं चाहे जैसे भी उन तस्वीरों की ओर देखता, और कुछ नहीं बस ‘के’ की स्वच्छ और प्रशांत चेतना ही उन तस्वीरों में से उद्घाटित होती।”

“उसके पश्चात् मैं वहाँ लम्बे समय तक बस बैठा रहा। मैं खड़ा हो पाने में पूरी तरह अक्षम था। दिन गुज़र गया और गोधूलि के अंधकार ने धीरे-धीरे कक्ष को आच्छादित कर लिया। अंत में एक गहन मौन की रात्रि छा गयी। रात्रि, जो न समाप्त होती-सी प्रतीत हो रही थी, तब तक जारी रही जब अंततः अंधकार का संतुलन इसका बोझ नहीं झेल पाया और धीरे-धीरे दिन निकलने लगा। नये सूर्य के प्रकाश ने आसमान को हल्के गुलाबी रंग में रंग दिया था, पक्षी जाग गए थे और उनकी चहचहाने की आवाज़ें आने लगी थीं।”

“तब मुझे भान हुआ कि मुझे उस क़स्बे में फिर जाना चाहिए। और तुरंत ही जाना चाहिए।”

“मैंने ज़रूरी चीज़ें एक सूटकेस में पैक कीं और अपने कार्यालय को फ़ोन कर दिया कि कुछ अत्यावश्यक काम आ पड़ा है। और मैंने अपने गृहनगर के लिए ट्रेन पकड़ ली।”

“क़स्बा मेरी स्मृतियों वाला समुद्र के किनारे का शांत क़स्बा नहीं रह गया था। साठ के दशक की तीव्र औद्योगिक प्रगति के परिणामस्वरूप अब वहाँ एक औद्योगिक शहर उभर आया था और उसके कारण परिदृश्य काफ़ी कुछ बदल गया था। स्टेशन के आसपास का इलाक़ा, जहाँ पहले मात्र कुछ एक दुकानें थीं, अब व्यापारिक संस्थानों से भर गया था। एकमात्र सिनेमा-हॉल अब एक सुपर-मार्किट में परिवर्तित हो गया था। मेरा अपना घर भी अब वहाँ नहीं था। इसे कुछ समय पूर्व ही गिरा दिया गया था और अब वहाँ मात्र ख़ाली ज़मीन शेष थी। बग़ीचे के सारे वृक्ष काट डाले गए थे और वहाँ ज़मीन पर घास उग आयी थी। कहना न होगा कि वह घर भी जहाँ कभी ‘के’ रहा करता था, अदृश्य हो चुका था। ज़मीन को मासिक पार्किंग के लिए समतल किया जा चुका था और वहाँ क़तारबद्ध कारें खड़ी थीं। इन किन्हीं चीज़ों से मेरे अंदर नॉस्टैल्जिया जैसा कुछ नहीं हुआ। इस बात को बहुत समय हो चुका था जब यह क़स्बा मेरा अपना था।”

“मैं समुद्रतट की ओर चला गया और सीढ़ियाँ चढ़कर समुद्री तटबंध के ऊपर आ गया। तट के सामने, बिना किसी बाधा के, चारों ओर समुद्र का विस्तार था। यह एक विशाल महासागर था। बहुत दूर मुझे क्षितिज की अटूट रेखा दिखायी पड़ रही थी। समुद्रतट का दृश्य बिलकुल वैसा ही था जैसा यह बहुत समय पहले हुआ करता था। समुद्रतट पहले की भाँति ही विस्तृत था। लहरें तट से पहले की भाँति ही टकरा रही थीं और लहरों के सामने लोग पहले की भाँति ही टहल रहे थे। शुरुआती साँझ की मद्धिम रोशनी इलाक़े को आच्छादित किये हुए थी, जैसे किसी बात पर अत्यंत सावधानीपूर्वक विचार कर रहा हो, सूरज धीरे-धीरे पश्चिम में डूब रहा था। मैं अपना बैग अपने पास रखे वहाँ समुद्रतट पर बैठा रहा और चुपचाप सूर्यास्त होते देखता रहा। यह सचमुच ही बहुत शांत और सुखद दृश्य था। उस दृश्य से इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता था कि इसी जगह कभी कोई भीषण तूफ़ान आया था जहाँ एक लहर ने मेरे सबसे अच्छे मित्र को निगल लिया था। सम्भवतः वहाँ मुश्किल से ही कोई ऐसा शेष होगा जिसे यह याद हो कि ऐसा कुछ यहाँ चालीस साल पूर्व घटित हुआ था। मुझे आश्चर्य होने लगा कि क्या यह मेरा कोई निजी भूत था जिसे मैं अपने मस्तिष्क में जगाये हुए था।”

“एकाएक मैंने नोटिस किया कि मेरे भीतर का गहन अंधकार तिरोहित हो गया था। जैसे एकाएक यह आया था वैसे ही यह बिना कोई चिह्न छोड़े चला गया था। मैं धीरे से समुद्रतट से उठा, मैं लहरों के किनारे तक गया, और बिना अपनी पैंट मोड़े उनके बीच चला गया। लहरें मेरे पाँव से टकराती रहीं, जो अभी भी जूतों से ढँके थे। लहरें किनारे से वैसे ही टकरा रही थीं जैसे तब जब मैं बच्चा था और मानों वे शांति के लिए समझौता करना चाहती हों, मेरे पैरों को भिगोती हुईं, मेरे जूतों और कपड़ों को भिगोती हुईं। लहरें अहर्निश आतीं और वापस लौटती रहीं। गुज़रने वालों ने मेरी ओर देखा, लेकिन मैंने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। आख़िर इतने लम्बे समय पश्चात् मैं यहाँ वापस आ गया था।”

“मैंने आसमान की ओर देखा। छोटे-छोटे भूरे बादल, महीन धुनी हुई रुई की भाँति, तैर रहे थे। हवा के बिलकुल न चलने के कारण बादल एक ही जगह पर रुके हुए लग रहे थे। मैं वास्तव में इसे व्याख्यायित नहीं कर सकता लेकिन मुझे महसूस हो रहा था कि वे बादल वहाँ केवल मेरे लिए तैर रहे थे। मेरे विचार उस समय की ओर मुड़ गए जब मैं बच्चा था और मैं तूफ़ान के केंद्र को देखने गया था। उस समय भी मैंने आसमान की ओर ऐसे ही देखा था। समय की धुरी से मेरे भीतर उसके ज़ोर की रगड़ के साथ रुकने की आवाज़ आयी। अतीत और वर्तमान आपस में ज़ोर से टकराये, मानों मेरा पुराना ख़ाली घर गिराया जा रहा हो, और समय के भँवर में वे आपस में मिश्रित हो गए। सभी मधुर आवाज़ें बंद हो गईं और प्रकाश डगमगाने लगा। मैंने अपना संतुलन खो दिया और आती हुई लहर के मध्य गिर पड़ा। मेरे हृदय ने मेरे गले में तेज़ शोर किया। एक सनसनाहट की अनुभूति मेरे हाथ-पाँव में फैलने लगी। मैं वैसे ही देर तक वहाँ पड़ा रहा जिस जगह मैं गिरा था। मैं खड़ा हो पाने में अक्षम था। लेकिन मैं डरा हुआ भी बिलकुल नहीं था। डरने को कुछ नहीं था। वह सब अब अतीत हो चुका था।”

“उस समय के बाद से मुझे कभी दुःस्वप्न नहीं आये। मैं कभी भी रात्रि के मध्य में चीख़ता हुआ नहीं जागा। मैंने इच्छा की कि काश मैं अब अपना जीवन फिर से नये सिरे से प्रारम्भ कर पाता और उसे फिर से ठीक से जी पाता। किन्तु नहीं, मेरा अनुमान है कि अब उसके लिए बहुत देर हो चुकी है। इस बिंदु से, अब शायद मेरे पास उतना अधिक समय नहीं शेष है। लेकिन इतना समय खो देने के बाद भी, मैं ख़ुश था कि अंत से पूर्व मेरी मुक्ति हो गयी और मैं ठीक हो गया। यही ठीक है। यह भी सम्भव था कि बिना मुक्ति के ही मेरा जीवन भयानक शून्य में चीख़ते हुए समाप्त हो जाता।”

सातवाँ आदमी एक क्षण के लिए मौन हो गया और उसने अपने चारों ओर बैठे लोगों की ओर देखा। किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। कमरे में साँस लेने की हल्की-सी आवाज़ के अतिरिक्त कोई ध्वनि नहीं थी। किसी में कोई हरकत नहीं। हवा एकदम बंद हो चुकी थी, और बाहर भी कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। जैसे शब्द तलाश रहा हो, वह आदमी फिर से अपनी कमीज़ की कॉलर सहलाने लगा।

“इस बात को मैं इस तरह से देखता हूँ, हम मनुष्यों के लिए सचमुच का भय कोई आतंक का नहीं है”, उस आदमी ने कुछ क्षण बाद कहा, “आतंक वहाँ निश्चित रूप से विद्यमान है…। यह अपने को अनेक रूपाकारों में प्रगट करता है और समय-समय पर यह मनुष्य के रूप में हमारे अस्तित्व को ही पराजित कर देता है। किन्तु सबसे भयानक बात हमारा भय की ओर पीठ फेर लेना है, इसके प्रति ऑंखें बंद कर लेना है। ऐसा करके हम अपने को अपने अस्तित्व के सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक हिस्से से विच्छेदित कर लेते हैं। मेरे मामले में—वह एक लहर थी।”

'अप्रैल की एक ख़ूबसूरत सुबह बिल्कुल सही लड़की को देखने के बाद'

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