इंसाफ़ का तराज़ू जो हाथ में उठाए
जुर्मों को ठीक तोले
ऐसा न हो कि कल का इतिहासकार बोले
मुजरिम से भी ज़ियादा
मुंसिफ़ ने ज़ुल्म ढाया

कीं पेश उसके आगे ग़म की गवाहियाँ भी
रक्खीं नज़र के आगे दिल की तबाहियाँ भी
उसको यक़ीं न आया
इंसाफ़ कर न पाया
और अपने उस अमल से
बदकार मुजरिमों के नापाक हौसलों को
कुछ और भी बढ़ाया

इंसाफ़ का तराज़ू जो हाथ में उठाए
ये बात याद रक्खे
सब मुंसिफ़ों से ऊपर
एक और भी है मुंसिफ़
वो दो जहाँ का मालिक
सब हाल जानता है
नेकी के और बदी के
अहवाल जानता है

दुनिया के फ़ैसलों से
मायूस जाने वाला
ऐसा न हो कि उसके दरबार में पुकारे
ऐसा न हो कि उसके इंसाफ़ का तराज़ू
एक बार फिर से तोले
मुजरिम के ज़ुल्म को भी
मुंसिफ़ की भूल को भी
और अपना फ़ैसला दे
वो फ़ैसला कि जिससे
ये रूह काँप उट्ठे!

साहिर लुधियानवी की नज़्म 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है'

Book by Sahir Ludhianvi: