Short Story: ‘Araby’
Writer: James Joyce

अनुवाद: उपमा ऋचा

लेखक परिचय: आयरलैण्ड के रचनाकार जेम्स जॉयस (1882-1941) ने सिर्फ़ कहानियाँ ही नहीं लिखीं, उपन्यास भी लिखे और साहित्य को ‘यूलिसिस’ सा महाग्रन्थ दिया। 1914 में प्रकाशित यह कहानी जेम्स जॉयस की बेहतरीन कहानियों में शुमार है।

मंगन की बहन से गली-भर के लड़के दोस्ती करना चाहते थे और कहानी का नायक भी… ऐसा हो भी सकता था अगर अरबी बाज़ार के कंगन उन कलाइयों में पिरो दिए जाते, लेकिन…

नॉर्थ रिचमंड स्ट्रीट अमूमन शांत रहती थी, सिवाय उस एक घंटे के जब क्रिश्चियन ब्रदर्स स्कूल की छुट्टी होती। इस अंधी गली के आख़िरी छोर पर एक दो मंज़िला मकान अकेला खड़ा हुआ था। अपने पड़ौसियों से अलग-थलग… गली के दूसरे मकान अपने अभिजात्य के प्रति जागरुक थे और अपने रंगहीन चेहरों से एक-दूसरे को ताकते रहते थे।

हमारे घर के पिछले ड्राइंग रूम में कभी एक किराएदार की मौत हुई थी, जो पादरी था। लम्बे समय से बंद होने के कारण सारे कमरों में एक घुटी हुई सी हवा डोलती थी। रसोई घर के पीछे बना कचरा घर बेकार काग़ज़ात से अटा पड़ा था। इन काग़ज़ात में मुझे कुछ मुड़ी-तुड़ी किताबें मिलीं। घर के पीछे के घने बाग़ के बीच में एक सेब का पेड़ था और कुछ उलझी हुई झाड़ियाँ थीं। सर्दियों में हम रात का खाना दिन छिपने से पहले ही खा लिया करते थे। खाने के बाद जब हम गली में निकलते तो घरों पर उदासी छायी होती। हमारे ऊपर पल-पल रंग बदलता बनफ़्शा आसमान होता और नीचे सड़क की बत्तियाँ, जो अपने धूमिल उजालों को उठाए रहतीं। ठंडी हवा हम पर हमला करती, पर हम तब तक खेलते रहते जब तक हमारे शरीर सुर्ख़ न हो जाएँ। हमारी आवाज़ें ख़ामोश सड़क में गूँजती रहतीं। हमारे खेल अंधेरी गलियों से होकर हमें घरों के पीछे ले जाते। कॉटेज के पीछे भागते हुए हम पिछले दरवाज़ों से होकर अस्तबल की गंध से भरे एक घने बग़ीचे में पहुँच जाते, जहाँ गाड़ीवान घोड़े को सहला रहा होता या उसके बाल सँवार रहा होता। जिससे घोड़े की साज़ पर लगे बक्कल टकरा जाते और फ़िज़ा में एक संगीत गूँजने लगता।

जब हम लौटते, तो रसोईघरों की खिड़कियाँ गली को रोशनी से भर चुकी होतीं। इसी वक़्त मंगन की बहन उसे बुलाने के लिए दरवाज़े तक आती और हम उसे सावधानी से ताकने लगते। अधखुले दरवाज़े से छनकर आती रोशनी में उसका वजूद बड़े मानीख़ेज़ ढंग से नुमाया हो रहा होता। उसके हिलने से उसका लिबास सिहर जाता और उसके बालों की मुलायम लटें इधर-उधर बिखर जातीं। हर सुबह मैं फ़र्श पर लेटा उसके दरवाज़े की ओर देखता रहता। हाँ मगर एहतियातन पर्दे को इतना खींच लेता कि मैं दिखायी न दूँ। जब वह दरवाज़े पर आती, तो मेरा दिल उछल पड़ता। मैं हॉल में दौड़ जाता और किताबें उठाकर उसके पीछे चलने लगता। साथ चलते हुए उसकी साँवली काया हमेशा मेरी आँखों की ज़द में रहती थी और जब हम उस बिंदु पर पहुँचते जहाँ से हमारे रास्ते अलग होते थे, मैं चाल तेज़ करके आगे बढ़ जाता ताकि उसके ओझल होने की कसक आँखों में जमा न हो।

सुबह दर सुबह यही होता रहा। मैंने कुछ शब्दों को छोड़कर, उससे कभी कोई बात नहीं की थी। फिर भी उसका नाम पागलपन बनकर मेरे ख़ून में दौड़ता था।

उसकी छवि उन जगहों पर भी मेरे साथ रहती, जो प्रेम के लिहाज़ से सबसे ख़राब समझी जाती हैं।

शनिवार की शाम को मेरी चाची बाज़ार सामान ख़रीदने जाती थीं और थैले उठाने के लिए मुझे उनके साथ जाना पड़ता था। हम पियक्कड़ों और भिखारिनों से भरी चमचमाती सड़कों पर चलते। मज़दूरों की गलियों, दुकानों पर काम करने वाले लड़कों के तीखे फ़िक़रों और नाकसुरे सड़कछाप गवैयों के बीच से होकर गुज़रते। गवैये ओडोनो रॉसा के गीत गा रहे होते या देश की दुश्वारियों के गीत… यह शोर मेरे मन के एक कोने को ही छू पाता था। मैं सोचता रहता था कि मैं बुराइयों की इस भीड़ में से अपने प्रेम को सुरक्षित निकालकर ले जा रहा हूँ। उसका नाम मेरे होठों पर उन अनजान दुआओं और प्रार्थनाओं के बीच भी छलक आता था, जिन्हें मैं ख़ुद समझ नहीं पाता था। मेरी आँखें अक्सर आँसुओं से भरी होतीं। (मैं नहीं बता सकता कि क्यों) कभी-कभी एक सैलाब-सा उमड़कर मेरे दिल में जमा हो जाता। मैं अपने भविष्य के बारे में कम सोचता था। मैं नहीं जानता था कि कभी उससे बात करूँगा या नहीं और अगर मैंने उससे बात की, तो मैं उसे अपने भ्रमित भावों के बारे में कैसे बताऊँगा? लेकिन मेरा शरीर एक सितार के जैसा हो चला था, जो उसके शब्दों और इशारों से बज उठता था जैसे उंगलियों से सितार के तार…

एक शाम मैं पीछे वाले ड्राइंगरूम में गया, जिसमें पादरी की मौत हुई थी। यह बरसात की अंधेरी शाम थी और घर में कोई आवाज़ न थी। टूटी हुई खिड़की में से मैं बारिश का धरती पर टकराना सुन रहा था। बूँदों की नोक मिट्टी में खेल रही थीं। कुछ दूर कोई लैम्प या खिड़की चमक रही थी। मैं शुक्रगुज़ार था कि मैं बहुत कम देख सकता था। मेरी इंद्रियाँ ख़ुद को छिपाए रखना चाहती थीं। मुझे लग रहा था कि वे फिसल पड़ेंगी। मैंने अपनी हथेलियों को दबाया, और न जाने कितनी बार बुदबुदाया, प्यार, प्यार और प्यार…

आख़िर वो दिन आया जब उसने ख़ुद मुझसे बात की। उस वक़्त मैं रेलिंग पर अकेला था। उसने मुझसे पूछा कि मैं अरबी बाज़ार जा सकता हूँ क्या? मेरी समझ में नहीं आया कि हाँ कहूँ या ना।

“तुम ख़ुद क्यों नहीं चली जातीं?” मैंने यूँ ही पूछ लिया।

उसने अपना चाँदी का कंगन उतारते हुए कहा, “मैं नहीं जा सकती क्योंकि इस हफ़्ते मेरे कॉन्वेंट में रिट्रीट है।”

रेलिंग की एक कील थामे हुए उसने अपना सिर मेरी ओर झुकाया। हमारे दरवाज़े से आती रोशनी उसकी गोरी गर्दन पर पड़ रही थी, जिससे उसकी बिखरी लटें और रेलिंग पर रखा हाथ जगमगा उठा था। यह रोशनी उसकी पोशाक पर फैल रही थी। वह इतनी सहज मुद्रा में खड़ी थी कि उसके पेटीकोट की सफ़ेद झालर भी चमक रही थी।

उसने कहा, “आपके लिए जाना आसान होगा।”

मैंने कहा,  “अगर मैं जाऊँगा तो तुम्हारे लिए ज़रूर कुछ लाऊँगा।”

उस शाम के बाद अनगिनत बेवक़ूफ़ियाँ सोते-जागते मेरे ख़यालों को घेरे रहतीं! मैं जब भी पढ़ने बैठता, रात को अपने कमरे में या दिन में कक्षा में, तो उसकी छवि मेरे और मेरी किताब के पन्नों के बीच आ जाती। ‘अरबी…’ इस शब्द के तमाम अक्षर मुझे सन्नाटों में आवाज़ देते, जिसमें मेरी आत्मा डूबती जाती और मेरे ऊपर एक पूर्वी जादू हावी होने लगता।

शनिवार की रात को मैंने बाज़ार जाने की इजाज़त माँगी। मेरी चाची ने हैरानी से पूछा कि कहीं इसमें कोई राज़ तो छिपा नहीं? कक्षा में भी मुझे तमाम सवालों के जवाब देने पड़े। मैंने अपने गुरु जी के चेहरे को कोमल से कठोर होते देखा। उन्हें भी लगा कि मैं आलस फैला रहा हूँ। मैं अपने भटकते विचारों को एक साथ आवाज़ नहीं दे सकता था। मुझमें जीवन के गम्भीर काम के लिए कोई धैर्य नहीं था, जो अब मेरे और मेरी इच्छा के बीच खड़ा था और मुझे बच्चों के खेल जैसा लग रहा था। भद्दे और एकरस खेल जैसा…

शनिवार की सुबह मैंने अपने चाचा को याद दिलाया कि मैं शाम को बाज़ार जाना चाहता हूँ। अल्मारी में अपनी टोपी के लिए ब्रश खोजते हुए उन्होंने जवाब दिया, “हाँ बच्चे, मुझे पता है।”

क्योंकि वह हॉल में थे, मैं सामने वाले दरवाज़े की ओर नहीं जा सकता था, लिहाज़ा खिड़की पर खड़ा रहा। मैं घर से ख़राब मन से निकला और धीरे-धीरे स्कूल की तरफ़ चल दिया। हवा बड़ी निर्मम और रूखी थी और पहले से ही डरे मन में शंका जगा रही थी। जब मैं रात का खाना खाने घर आया, चाचा घर पर नहीं थे। जाने में अभी बहुत वक़्त था। मैं थोड़ी देर घड़ी को घूरता रहा और जब उसकी टिकटिक मुझे परेशान करने लगी, मैं कमरे से बाहर निकल आया। सीढ़ी चढ़कर मैं छत पर पहुँचा। ख़ाली, ठंडे, अंधेरे और उदास कमरों ने मुझे मुक्त कर दिया और मैं इस कमरे से उस कमरे तक गाते हुए डोलने लगा। सामने की खिड़की से मैंने देखा कि नीचे सड़क पर मेरे साथी खेल रहे हैं। उनकी चिल्लाहटें बहुत धीमी और अस्पष्ट होकर मुझ तक आ रही थीं। ठंडे शीशे पर सिर झुकाकर मैं उस अंधेरे घर को देख रहा था, जहाँ वो रहती थी। मैं वहाँ घंटे भर खड़ा रहा। मुझे अपनी कल्पना में बसी साँवली छवि—घुमावदार गर्दन पर लहराते हुए बाल, रेलिंग पर रखे हाथ और पोशाक की झालर—के अलावा कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। जब मैं नीचे आया तो देखा कि बूढ़ी और बातूनी मिसेज़ मर्सर अलाव के पास बैठी थीं। चाय-टेबल पर मुझे उनकी बातों को सहन करना पड़ा। खाना एक घंटे से भी ज़्यादा देर तक चला, लेकिन चाचा अभी तक नहीं आए थे। आख़िर मिसेज़ मर्सर जाने के लिए उठ खड़ी हुईं क्योंकि आठ बजे के बाद उन्हें बाहर रहना पसंद नहीं था और रात की हवा उनकी सेहत के लिए ख़राब थी। उनके जाने के बाद मैं कमरे में चहलक़दमी करने लगा।

चाची ने कहा, “मुझे डर लग रहा है। भगवान के लिए तुम बाज़ार मत जाओ।”

नौ बजे मैंने हॉल के दरवाज़े पर चाचा की आहट सुनी। मैंने उन्हें ख़ुद से बात करते सुना और अल्मारी को हिलने की आवाज़ को भी, जिस पर वे अपने ओवरकोट का वज़न डाल रहे थे। जब खाना खा रहे थे, मैंने उनसे बाज़ार में जाने के लिए पैसे माँगे जो कि वे भूल गए थे।

उन्होंने कहा, “लोग बिस्तर पर अपनी पहली नींद ले रहे हैं और तुम…”

मैं बिल्कुल भी नहीं मुस्कराया।

चाची ने हुलसकर कहा, “पैसे क्यों दे नहीं देते उसे? पहले ही बेचारे को काफ़ी देर हो गई है।”

चाचा बोले, “हां भई… अगर बच्चे खेलेंगे नहीं, बस काम में लगे रहेंगे तो बिगड़ नहीं जाएँगे।” और मुझसे दूसरी बार पूछा कि मैं कहाँ जा रहा हूँ।

मैंने भी उन्हें दूसरी बार बताया, “मुझे अरबी जाना है।”

जब मैं रसोईघर से निकला उस वक़्त वे चाची को कोई कविता सुना रहे थे।

बकिंघम स्ट्रीट से स्टेशन की ओर जाते हुए मैं अपने हाथ में पैसों को कसकर दबाए रहा। सड़क पर ख़रीदारों की भीड़ और रोशनी मुझे मेरी यात्रा का उद्देश्य याद करा रही थी। मैंने एक सुनसान ट्रेन की तीसरी श्रेणी में अपनी सीट ली। एक असहनीय विलम्ब के बाद ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन से चली और उजड़े घरों व चमकती नदी के ऊपर आगे बढ़ी। वेस्टलैंड रो स्टेशन पर लोगों की एक भीड़ दरवाज़े में घुसपैठ मचा रही थी, लेकिन गेटकीपर यह कहकर उन्हें वापस लौटा रहा था कि यह ट्रेन ख़ासतौर पर बाज़ार के लिए है। मैं डिब्बे में अकेला रह गया। कुछ ही देर बाद मेरे सामने एक बड़ी-सी इमारत थी जिस पर एक जादुई नाम चमक रहा था— ‘अरबी बाज़ार’।

मुझे डर था कि बाज़ार बंद न हो जाए, इसीलिए हड़बड़ाहट में थके हुए से आदमी के हाथ में बतौर प्रवेश शुल्क एक शिलिंग थमा दिया। अगले ही पल मैं एक बड़े हॉल में था, जिसका बड़ा हिस्सा अंधेरे में डूबा हुआ था। लगभग सभी स्टाल बंद थे और चर्च जैसी शांति फैली हुई थी। मैं घबराहट में बाज़ार के बीचोंबीच चला आया। इक्का-दुक्का लोग उन स्टालों पर जमा थे, जो अभी तक खुले हुए थे। मैं सिक्कों की आवाज़ें सुन रहा था। मुझे बहुत मुश्किल से याद आया कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। मैं एक स्टाल पर गया, वहाँ चीनी मिट्टी के बरतन, फूलदान और टी-सेट देखे। स्टॉल पर एक युवती, दो युवकों के साथ हँस-हँसकर बात कर रही थी।

उसने मुझसे पूछा, “कुछ ख़रीदना है क्या?”

उसका स्वर उत्साहजनक नहीं था। उसने जैसे किसी काम की तरह मुझसे पूछ लिया था। मैंने बड़ी हरसत से मर्तबानों की ओर देखा, जो पहरेदारों की तरह अंधेरे में कुड़कुड़ाए हुए खड़े थे और कहा, “नहीं, धन्यवाद।”

युवती वापस अपने दोस्तों की ओर मुड़ गई। एक या दो बार उसने पलटकर मुझे देखा। मैं उसकी दुकान के आगे बेमक़सद खड़ा था, लेकिन यह दिखाते हुए कि मुझे उसके समान में दिलचस्पी है। फिर मैं धीरे-धीरे बाज़ार के बीच में चला आया। मेरी जेब में रखे छह रुपयों में से दो रुपए खिसक चुके थे। तभी गैलरी के एक छोर से आती एक आवाज़ सुनायी दी कि बत्तियाँ बंद होने वाली हैं।

बाज़ार पूरी तरह से अंधेरे में डूब गया। उस अंधेरे में चीज़ों को घूरते हुए मैंने ख़ुद को ऐसे प्राणी के रूप में पाया जो पता नहीं किस भाव से संचालित होकर यहाँ चला आया था। सब तरफ़ अंधेरा था, केवल मेरी आँखें दुःख और ग़ुस्से से जल रही थीं।

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उपमा 'ऋचा'
पिछले एक दशक से लेखन क्षेत्र में सक्रिय। वागर्थ, द वायर, फेमिना, कादंबिनी, अहा ज़िंदगी, सखी, इंडिया वाटर पोर्टल, साहित्यिकी आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता, कहानी और आलेखों का प्रकाशन। पुस्तकें- इन्दिरा गांधी की जीवनी, ‘एक थी इंदिरा’ का लेखन. ‘भारत का इतिहास ‘ (मूल माइकल एडवर्ड/ हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया), ‘मत्वेया कोझेम्याकिन की ज़िंदगी’ (मूल मैक्सिम गोर्की/ द लाइफ़ ऑफ़ मत्वेया कोझेम्याकिन) ‘स्वीकार’ (मूल मैक्सिम गोर्की/ 'कन्फेशन') का अनुवाद. अन्ना बर्न्स की मैन बुकर प्राइज़ से सम्मानित कृति ‘मिल्कमैन’ के हिन्दी अनुवाद ‘ग्वाला’ में सह-अनुवादक. मैक्सिम गोर्की की संस्मरणात्मक रचना 'लिट्रेरी पोर्ट्रेट', जॉन विल्सन की कृति ‘इंडिया कॉकर्ड’, राबर्ट सर्विस की जीवनी ‘लेनिन’ और एफ़. एस. ग्राउज़ की एतिहासिक महत्व की किताब ‘मथुरा : ए डिस्ट्रिक्ट मेमायर’ का अनुवाद प्रकाशनाधीन. ‘अतएव’ नामक ब्लॉग एवं ‘अथ’ नामक यूट्यूब चैनल का संचालन... सम्प्रति- स्वतंत्र पत्रकार एवम् अनुवादक