आवारा कुत्ते

विशाल अंधारे की कविता ‘आवारा कुत्ते’ | ‘Awara Kutte’, a poem by Vishal Andhare

कुत्ते
आवारा कुत्ते
गली चौराहों पर देते हैं दिखायी
रात में आसरे में छिपे
किसी गिरी दीवार के।
बंद घरों के आसपास
भौंकते रहते हैं रातभर
ईमानदारी की पगड़ी सम्भाले
करते हैं सुरक्षा मुहल्लों की

इन्हें मिली होती हैं
इन मुहल्लों से बासी रोटियाँ
और ख़राब हुए सालन
और इतवार के दिन
बिना माँस बची बकरियों की हड्डियाँ
इनके नसीब में नहीं होते
बिस्कुट, दूध, या गोश्त के टुकड़े
गले के पट्टे वालों कुत्तों की तरह
नहीं होती महंगी गाड़ियाँ
ना इन्हें घुमाने ले जातीं
मोटी चमड़ी वाली औरतें

फिर भी ये जागकर बिताते हैं रात
और भौंकते हैं ग़ुलाम बनाती
मानव सभ्यता पर
और रोष दिखाते हैं
अपनी सभी पीड़ाओं का
अपने विलाप सुर से शायद
गा देते है अपना स्वातंत्र्यगीत
मध्यरात्रि के बाद अपने एकांत में

गल्ली के बच्चे इनपर करते हैं
छिप-छिप कर हमले
कभी-कभी इसमें टूट जाती है
इनकी हड्डियाँ
फिर भी ये मुहल्ले छोड़कर नहीं जाते, जैसे आदिवासी नहीं छोड़ते
अपनी जमीन, अपना जंगल

आवारा कुत्ते
कभी बस से कुचले जाते हैं
दिनभर पथराव सहते हैं
नुकीले दाँतों से तोड़ते हैं कड़क रोटियों को
आजकल अपनी सभ्यता का बाँध तोड़े
ये काटने लगे है
मनुष्य के बच्चों को
और जता रहे है रोष अपना

जंगलों के नियमों को
बताने का यही रास्ता
बचा हो शायद उनके पास
या वो याद करा दे रहे हैं-
वो भी चाहते है आज़ादी
शहर की ख़ौफ़नाक भीड़ से
इतनी तकलीफ़ में जी रहे हैं
फिर भी मरना चाहते हैं
एक आज़ाद मौत

गले के पट्टों से बँधे कुत्तों की तरह नहीं मरना चाहते हैं ये
बँधी हुई मौत
बँधी हुई ज़िन्दगी की तरह

आवारा कुत्तों को
ढूँढ-ढूँढकर ख़त्म कर रही है
शहरी सभ्यता
और कुछ गिरोह बना रहे हैं
इन्हें होटलों की मटन प्लेट

उनकी ईमानदारी से भरी
इतिहास की सभ्यता पर
मानव की भूखी और लालची
भूगोली सभ्यता का गोल
भारी पड़ रह है शायद…

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