कहा करती थी माँ
था एक हमारा भी बड़ा-सा खेत
जहाँ लहराती थी हमारी खुशियाँ
उगते थे हमारे स्वप्न
होती थी आमद सुख की
था खेत के बीच में एक कुआँ
जो सींचता था हमारे स्वप्नों को
था एक आम का पेड़
जो रोज दुलारता था हमें
लगता था आम पर रोज़ पंछियों का मेला
जिनके कलरव के आगे फीके थे तानसेन के सुर
थे दो सफ़ेद बैल
जो करते थे बाबा में ऊर्जा का संचार
पर अब
ना बाबा है
ना खेत है
ना बैल है
ना ही है कोई सुख और स्वप्न
बाबा का नशा ले गया सबको
और
बाबा का गम
माँ को।

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अक्षत शर्मा 'व्यास'
कविता लिखने समझने कि कला तो मुझ में नहीं है मै तो बस प्रयास करता हूं उन भावो के अभिव्यक्ति कि जो मन में है ।

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