हालात तब नहीं थे
इतने बुरे
जब जंगल से
एकाध भेड़िया
भटककर राह
दाख़िल हो जाता था
इंसानी बस्तियों की सीमाओं में,
उसे तो खदेड़ देता था इंसान
एकजुट होकर
तहज़ीब की सीमाओं से बाहर
बर्बर जंगल की ओर

मुश्किल तो अब है
जब हर पल
और भी ज़्यादा
भेड़िया होता हुआ इंसान
इंसान होने के
सारे अधिकार खोने के बावजूद
अब भी बना हुआ है
सभ्य बस्तियों की
सीमाओं के भीतर!

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