नहीं बनवाई कभी
पेड़ों ने जन्मकुंडली अपनी
ना पत्तों ने दिखलाईं
भाग्य रेखाएँ किसी को
धूल भरी स्याह आँधियाँ
पोर-पोर उजाड़ जातीं उन्हें
फिर भी धीरे-धीरे
हरे हो उठते पेड़
फिर-फिर गूँज उठतीं
फूलों-फलों की
सुरभित किलकारियाँ दूर तक
इतिहास में आज तक
किसी भी ज्योतिषाचार्य के सामने
कभी नहीं फैलीं
स्वयं पर आश्वस्त
श्रम करती हथेलियाँ।

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प्रेमशंकर रघुवंशी
जन्म 8 जनवरी 1936 को बैंगनिया, सिवनी मालवा तहसील, हरदा, होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उनकी कुछ प्रमुख कृतियां-आकार लेती यात्राएं, पहाड़ों के बीच, देखो सांप : तक्षक नाग, तुम पूरी पृथ्वी हो कविता, पकी फसल के बीच, नर्मदा की लहरों से, मांजती धुलती पतीली (सभी कविता-संग्रह), अंजुरी भर घाम, मुक्ति के शंख,सतपुड़ा के शिखरों से (गीत-संग्रह) हैं।

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