जो उतरा फिर न उभरा, कह रहा है
ये पानी मुद्दतों से बह रहा है

मेरे अन्दर हवस के पत्थरों को
कोई दीवाना कब से सह रहा है

तकल्लुफ़ के कई पर्दे थे फिर भी
मेरा तेरा सुख़न बे-तह रहा है

किसी के एतिमाद-ए-जान-ओ-दिल का
महल दर्जा-ब-दर्जा ढह रहा है

घरौंदे पर बदन के फूलना क्या
किराए पर तू इसमें रह रहा है

कभी चुप तो कभी महव-ए-फ़ुग़ाँ दिल
ग़रज़ इक गोमगो में ये रहा है!

शकील बदायूँनी की ग़ज़ल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया'

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