जो उतरा फिर न उभरा, कह रहा है
ये पानी मुद्दतों से बह रहा है

मेरे अन्दर हवस के पत्थरों को
कोई दीवाना कब से सह रहा है

तकल्लुफ़ के कई पर्दे थे फिर भी
मेरा तेरा सुख़न बे-तह रहा है

किसी के एतिमाद-ए-जान-ओ-दिल का
महल दर्जा-ब-दर्जा ढह रहा है

घरौंदे पर बदन के फूलना क्या
किराए पर तू इसमें रह रहा है

कभी चुप तो कभी महव-ए-फ़ुग़ाँ दिल
ग़रज़ इक गोमगो में ये रहा है!

शकील बदायूँनी की ग़ज़ल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया'

Recommended Book:

Previous articleकविताएँ: दिसम्बर 2020
Next articleमन बहुत सोचता है
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
(30 सितम्बर 1935 - 25 दिसम्बर 2020) सुपरिचित उर्दू शायर व आलोचक।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here