हम कठपुतली हैं

पर हम नहीं जानते कि
हम कठपुतली हैं

हर आदमी एक कठपुतली है
हर औरत एक कठपुतली है।

हम जानते हैं कि
हम कठपुतली हैं
फिर भी हम कठपुतली बने रहते हैं
क्योंकि कठपुतली बने रहने में सुविधा है
किसी दूसरे के हाथों में अपनी डोर देकर हम
ख़ुश रहते हैं
क्योंकि फिर हमें अपनी डगर नहीं बनानी पड़ती

हम कठपुतली हैं
और हमारे पास आए हर आदमी को हम कठपुतली बनाना चाहते हैं
वो भी इसी में अपनी भलाई मानता है
हर आदमी
एक-दूसरे के हाथों में
अपनी डोर देकर आज़ाद है

आजादी के नारे लगाने वालों को देखो—
उनकी डोर भी उनके हाथ में नहीं है।

जो कहते हैं— कठपुतली के इस खेल में
कठपुतली नहीं बनेंगे
वे चुपके-से कठपुतली बना दिए जाते हैं।
वे ही सबसे पहले अपनी डोर किसी और को थमा देते हैं।
नामालूम तरीक़े से
कठपुतली बने हुए हम जीते रहते हैं बरस-दर-बरस
और मरते वक़्त पाते हैं कि ‘अरे! हम तो कठपुतली थे।’

कोई और कहीं से हमें चला रहा है
कोई और कहीं से हमें जो कह रहा है
वो हम कह-कर रहे हैं
ऐसे हम आज़ाद हैं।
एक कठपुतली
हज़ारों कठपुतली तैयार करती है।
कठपुतली के तो केवल हाथ-पैर ही बँधे होते हैं।
हमारे तो आँख, कान, नाक, मुँह सब बँधे हैं।

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राजेन्द्र उपाध्याय
जन्म : 20 जून, 1958, सैलाना, ज़िला रतलाम (म० प्र०) | शिक्षा : बी०ए०, एल०एल०बी०, एम०ए० (हिंदी साहित्य) | कृतियां : 'सिर्फ़ पेड़ ही नहीं कटते हैं' (कविता-संग्रह, 1983), 'ऐशट्रे' (कहानी-संग्रह, 1989), 'दिल्ली में रहकर भाड़ झोंकना' (व्यंग्य-संग्रह, 1990), 'खिड़की के टूटे हुए शीशे में' (कविता-संग्रह, 1991), ‘लोग जानते हैं' (कविता-संग्रह, 1997, पुरस्कृत), डॉ० प्रभाकर माचवे पर साहित्य अकादेमी से मोनोग्राफ, 2004, 'रचना का समय' (गद्य-संग्रह, 2005) समीक्षा आलोचना, 'मोबाइल पर ईश्वर' (कविता-संग्रह 2005), 'रूबरू' (साक्षात्कार-संग्रह, 2005), 'पानी के कई नाम हैं' (कविता-संग्रह, 2006), 'दस प्रतिनिधि कहानियों : रवीन्द्रनाथ ठाकुर' (कहानी-संग्रह, 2006) संपादन।