जब बारात देखकर अमृता की सखियाँ अन्दर आयीं, तो वे बहत शान्त थीं। अमृता ने उत्सुक आँखों से उन्हें देखा, पर किसी ने उसके भावी पति के बारे में कुछ नहीं कहा। आशंका से अमृता का हृदय धड़क उठा। पर वह कुछ नहीं बोली। सिर झुकाए बैठी रही। अन्य स्त्रियाँ भी बारात देखकर अन्दर आ रही थीं। एक ने लम्बी आह भरकर कहा, “अपना-अपना भाग्य है। कैसी चाँद-सी बेटी है, और कैसा वर…”

उसकी नज़र जब सिमटी-सिकुड़ी अमृता पर पड़ी, तो वह अचकचाकर चुप हो गई।

अमृता अपनी गोरी कलाई में पड़े चमकते गहनों और गुड़ियों को देख रही थी। अनायास ही आँखें भर आयीं और आँसू चू पड़े।

आकुल हो सुषमा ने कहा, “यह क्या, पगली? रोती क्यों है? सभी कुछ तो मिला है तुझे।”

ज़रा-सी देर को जब अन्य सखियाँ हट गईं, तो अधीर हो अमृता ने भरे कण्ठ से पूछा, “सुषमा, सच बता…”

सुषमा की आँखों से एक आँसू टपक पड़ा।

“केवल रूप से क्या होता है, अमृता? और सब बातों में वह बहुत अच्छे हैं”, सुषमा ने उसे ढाढ़स बंधाते हए कहा।

और सच ही और सब बातों में मुकुल बहुत अच्छा था। धनी जज का अकेला बेटा, सुशिक्षित, अच्छी नौकरी। पर अमृता को इन सबसे क्या करना! उसके दिल में तो इस बात ने गहरा घाव कर दिया था कि उसका पति अत्यधिक कुरूप है।

झीना घूँघट उठाकर जिसने भी वधू का मुख देखा, उसने मुकुल का भाग्य सराहा। अपनी प्रशंसा का हर शब्द अमृता के दिल पर घूसों-सा लगा। उसका मन होता कि घूँघट फाड़कर फेंक दे. स्त्रियों का मुँह नोच ले और दीवार से सिर टकरा-टकराकर मर जाए। पर वह वैसी ही शान्त, सिर झुकाए बैठी रही। बड़ी-बड़ी काली आँखों में आँसू उमड़ते रहे और सिसकियाँ अपने में दबाए वह चुप बैठी रही।

मुकुल को उन्हीं सब बातों की साध थी, जो हर एक युवक को होती है। और शायद भाग्य से उसे ऐसी पत्नी भी मिल गई थी, जो देखने में अनन्य सुन्दरी थी। पर मुकुल ने एक बार भी यह सोचने की कोशिश नहीं की कि उस उर्वशी-सी अमृता के भी न जाने क्या-क्या अरमान होंगे। उसकी समझ में स्त्रियों को केवल यही चीज़ें चाहिए- रुपया, अच्छे-अच्छे कपड़े, गहने, नौकर-चाकर और मोटर। और वह यह सब चीज़ें अमृता को दे सकता था।

जब कई दिन बीतने पर भी जगमग-जगमग करते आभूषणों के बीच भी अमृता का मुख कुम्लहाया ही रहा, तो मुकुल से न रहा गया। स्वर में विष भरकर बोला, “क्या किसी पुराने प्रेमी से बिछुड़ जाने का ग़म है?”

यह एक ऐसी चोट थी कि अमृता तड़प उठी। उसकी आँखों से चिनगारियाँ- सी झड़ीं। बोली, “कोई भी आँखवाला समझ सकता है कि मुझे किस बात का ग़म है।”

मुकुल एक क्षण को अवाक रह गया। फिर कहा, “ओह! तो क्यों नहीं अपने माता-पिता से कह दिया कि तुम्हें कामदेव चाहिए।”

आँसुओं से भीगे स्वर में अमृता ने कहा, “वही लोग तो मेरे लिए दुश्मन हो गए।”

“तब फिर मुझे क्यों दोष देती हो? मुझे तुम्हारी जैसी हज़ारों मिल सकती थीं।”

अमृता ने कुछ नहीं कहा। चुपचाप सिसकती रही।

“मैं तुम्हारी जैसी हज़ारों को ख़रीद सकता हूँ। तुम्हें अगर अपने रूप का घमण्ड है, तो मैं भी तुम्हें दिखा दूँगा।”

सिसककर, डूबे स्वर में अमृता ने कहा, “आपको अपनी दौलत का घमण्ड है, तो मैं भी आपको दिखा दूँगी।”

मुकुल बाहर निकल आया। क्रोध से उसने दरवाज़ा धड़ाम से बन्द किया। ज़रा ग़ुरूर तो देखो! अभी पाँच दिन हुए हैं शादी को, बराबर से ज़बान चलाती है!

अमृता फूट-फूटकर रो रही थी। शक्ल-सूरत तो ऐसी है कि जी चाहता है कि आँखें फोड़ ले। ऊपर से यह मिज़ाज! अगर ज़रा देखने में गनीमत होते, तो शायद ज़मीन पर पैर नहीं रखते। सोचते होंगे कि अमृता रुपए पर बिक जाएगी। अभी समझा नहीं है कि अमृता किस मिट्टी की बनी है।

फिर अमृता कुछ दिन और रही, मगर मुकुल उससे नहीं बोला। सोचता था कि पतिव्रता स्त्री की भाँति वह आकर पैरों पड़ेगी, क्षमा माँगेगी, मगर वह नहीं आयी। अमृता सोचती थी, “मैं क्यों जाऊँ? बात शुरू तो उन्होंने ही की है। यह तो नहीं कि अपने आचरण से अपनी करूपता को ढाँकने का प्रयत्न करें, ऊपर से धौंस जमाते हैं!

एक दिन अमृता चली आयी। मुकुल तब भी नहीं बोला, और भारी दिल लिए इधर-उधर घूमता रहा।

सुषमा ने उन आँखों में सघन वेदना देखी। “बड़ी पागल है तू, अमृता। क्या बचपना कर बैठी! तूने ऐसी बात कही ही क्यों?”

“बस, मुझे ही दोष दो। यह तो नहीं कि मुझसे ज़रा-सी सहानुभूति दिखाओ। क्या मेरे अरमान, मेरी चाहे कुछ भी नहीं?”

“औरत की चाहें, अरमान कुछ महत्त्व नहीं रखते। यह दुनिया पुरुषों की है। फिर आख़िर रूप-रंग में रखा ही क्या है!”

“हाँ, ठीक है। तो तू कर लेन उनसे शादी! वो तो सिर के बल तैयार हो जाएँगे। उन्होंने कहा ही था कि उन्हें रुपए के बल पर हज़ारों मिल जाएँगी।”

सुषमा ने गम्भीरता से कहा, “तेरा तो सिर फिर गया है। एक दिन रोएगी अपनी क़िस्मत को।”

“एक दिन क्या, अभी ही रो रही हूँ।”

और जब मुकुल के यहाँ से बुलाने का पत्र आया, तो अमृता ने जाने से साफ़ इन्कार कर दिया। माँ ख़ूब ही नाराज होकर बोलीं, “अजीब लड़की है! हम लोगों की नाक कटवाने पर तुली है।”

अमृता ने कुछ उत्तर नहीं दिया।

“तो फिर क्या जवाब दिया जाए?”

“लिखवा दो कि हमारी लड़की आपके घर में जीते-जी क़दम नहीं रखेगी।”

दुःखी हो माँ बोलीं, “अरी, छोटे मुँह बड़ी बात न बोल। आख़िर क्यों नहीं जाएगी?”

“नहीं जाऊँगी-मेरा मन।”

“वाह रे तेरा मन!”

अब अमृता उबल पड़ी, “देखो माँ, एक तो तुम सबने मेरी ज़िन्दगी तबाह कर दी, ऊपर से…”

माँ की आँखें भर आयीं।

“हम लोगों ने तो तेरा भला ही चाहा था। शक्ल-सूरत से क्या होता है, इज़्ज़त तो रुपए की ही होती है।”

“तो इसका मतलब है कि चाहे जिससे भी शादी कर दो? मेरे भी हाथ-पैर हैं, कमा खा लूँगी। उनका रुपया मुझे नहीं चाहिए।”

माँ ने सिर पर हाथ मारकर कहा, “हाय रे, भगवान! यह दिन दिखाने से पहले उठा क्यों न लिया? पान-फूल की तरह तुझे पाला-पोसा…”

अमृता झुँझला पड़ी, “देखो, माँ, मुझे तंग न करो। मैंने कह दिया कि मुझे नहीं जाना है।”

मुकुल ने कौर मुँह में दिया ही था कि बहन ने कहा, “सुनो, भैया, भाभी नहीं आएँगी।”

“क्या?” चौंककर मुकुल ने पूछा।

“हाँ, उनके यहाँ से ख़त आया है। लिखा है कि वह बीमार हैं।”

मुकुल का दिल न जाने कैसा-कैसा-सा हआ। अमृता बीमार है। वह बिना खाए ही उठ आया। आकर सिगरेट सुलगायी और खोया-सा दूर देखने लगा। अमृता कितनी सुन्दर है! आँखें कितनी नशीली हैं। होंठ कितने भरे हए! बातचीत और उठने-बैठने में कितना आकर्षण! और… और उसकी वह प्रगाढ़ वेदना, वह दर्प और तेज़ी!

मुकुल ने सिगरेट पैरों से कुचल दी। एक ख़याल काले बादल की तरह आया और छा गया। वह आना नहीं चाहती – मुकुल ने सोचा क्योंकि मैं इतना बदसूरत हैं। मैं काला हूँ, भद्दा है। पर इसमें मेरा क्या दोष? मैंने तो सदा ही सुन्दर पत्नी चाही थी, और मुझे मिली भी। मैं अमृता को सब कुछ दे सकता हूँ। उसे रानी की तरह रख सकता हूँ। अकेला बेटा हूँ, ग्यारह सौ पाता हूँ। और फिर ऐसा ही था, तो क्यों नहीं उसने मुझे शादी से पहले देख लिया? अगर उसे अपने रूप पर मान है, तो मैं भी अपने हठ का पक्का हूँ। झुकेगी, तो अमृता- वह नारी है, पत्नी है। मैं पति हूँ।

पर मुकुल अमृता को नहीं जानता था। बार-बार मुकुल के पिता ने बुलाया, पर अमृता नहीं आयी। हारकर वे लोग चुप हो रहे। मुकुल बार-बार उसे पत्र लिखने की सोचता, मगर न जाने क्या उसे रोक देता। शायद अपने पुरुष होने का आत्माभिमान।

दिन बीतते गए। अमृता को लगा कि वह खोखली हो गई है। एक निरर्थकता की भावना उसके मन-प्राणों पर छा गई थी। ऐसा लगता कि वह पथ भूल गई है, अब कभी मंज़िल तक न पहुँच पाएगी। कभी अपने विवाह की बात सोचती, तो वह दुःस्वप्न-सा लगता। वह सोचती कि काश यह सपना टूट जाए और वह अपने को वही बेफ़िक्र अमृता पाए- अमृता, जिसे अपने समान ही सुन्दर पति पाने का अरमान था। पर क्योंकि वह सपना नहीं था, इसलिए नहीं टूटा। वह सत्य था, कटु और कठोर सत्य।

अगर कोई सखी नेत्रों में उत्सुकता और स्वर में विदर्प भरकर पूछती. “अरे अमृता, ससुराल कब जाओगी?” तो वह स्वर को यथा साध्य सहज बनाकर कहती, “पहले पढ़ाई तो ख़तम कर लें।”

धीरे-धीरे ख़बर मुकुल के घरवालों तक पहुँच गई कि पढ़ाई का केवल बहाना है, अमृता आना नहीं चाहती है। समाचार की पुष्टि करती हुई मुकुल की दूर के रिश्ते की बुआ बोलीं: “ऐ भाभी, तुम न जाने क्यों उस पर फिसल गई? आजकल की पढ़ी लिखी लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। ख़ैर, अब भी क्या बिगड़ा है! मुकुल को हज़ारों मिल जाएँगी। अरे, दूर क्यों जाती हो, मेरी ही देवरानी की चाची की बहन है। देखने में ऐसी कि अप्सरा। कामकाज में होशियार। नाचे वह, गाए वह…”

मुकुल की माँ की आँखें भर आयीं, “मुझे क्या पता था? देखने में तो ऐसा भोला मुँह है उसका। और देखो न, मुकुल अलग पीला पड़ता जा रहा है।”

“तब फिर क्या है! मैं कहूँगी अपनी देवरानी से।”

माँ ने जल्दी से कहा, “नहीं, नहीं, ऐसी बात थोड़े ही है। पढ़ लेगी, तो वह आएगी ही।”

मगर बाद में उन्होंने जितना इस बात पर सोचा, उतनी ही उपयुक्त लगी। उन्होंने निश्चय किया कि अब अगर अमता नहीं आयी, तो जाड़ों में मुकुल की दूसरी शादी कर देंगे। तब तक पहली शादी को काफ़ी दिन हो जाएँगे।

और जब उस आखिरी ख़त का भी जवाब आ गया कि अमृता को पढ़ना बहुत है, इसलिए वह न आ सकेगी, तब साहस कर उन्होंने प्रसंग छेड़ा: “एक लड़की है। सुना है कि अच्छी है।”

मुकुल ने तीव्र दृष्टि से माँ को देखा, “तो?”

“तो क्या? अमृता तो अब आएगी नहीं। बड़े मिज़ाज हैं उसके। क्या पता था कि ऐसी होगी? उसे भी पता चल जाएगा कि हमारे लड़के के…”

मुकुल के दिल में टीस-सी उठी, “माँ, तुम भी क्या बेकार बातें करती हो!” और उसके कहने के ढंग में न जाने क्या था कि फिर किसी को कुछ कहने का साहस न हुआ।

जब अमृता के यहाँ सबने सुना कि वे लोग दूसरी शादी करना चाहते हैं, तो सन्न रह गए। अमृता के हठ का यह परिणाम होगा यह उन्होंने नहीं सोचा था। सबने उसे डाँटा, समझाया, फुसलाया, पर वह अपनी बात पर अटल रही। वह मुकुल के घर नहीं जाएगी, नहीं जाएगी। कर ले वह दूसरी शादी। और अगर घरवालों के लिए वह भार हो गई है, तो वह जल्दी ही कहीं नौकरी कर लेगी।

परिणाम यह हुआ कि पिता ने उससे बोलना छोड़ दिया, भाई झिड़कने लगे, भाभियाँ पग-पग पर अपमानित करने लगीं। अमृता का मुख पीला पड़ गया। दुबले-सूखे मुँह पर आँखें और भी बड़ी लगने लगीं, मगर एक आग उसके दिल में धधकती रही। हाँ, ग़लती उसकी अवश्य थी कि उसने शादी से पहले मुकुल को नहीं देखा, मगर वह कहती भी कैसे कि वह उसे देखना चाहती है? भाई ने कह दिया था कि साधारण है। और फिर मुकुल का यह गर्व, यह मान! एक पत्र भी नहीं डाला, पूरे दो साल हो गए। अगर मुकुल झुकता, तो वह उसे स्वीकार कर लेती। पर स्वयं झुकना उसे सह्य नहीं था।

इस दृढ़ निश्चय ने उसे एक आभा-सी दे दी। परीक्षा के बाद उसने नौकरी कर ली और सबसे दूर पूना चली गई।

मुकुल को एक क्षीण-सी आशा थी। अमृता के पूना चले जाने से वह भी टूट गई। उसे विश्वास हो गया कि अमृता ने उससे नाता तोड़ लिया है, शायद सदा के लिए।

एक दिन अमृता को एक निमंत्रण-पत्र मिला- मुकुल के विवाह का। किसी ने ससुराल से उसके साथ यह क्रूर परिहास किया था, जिससे अमृता भी जान जाए।
एक आह अनजाने में ही उसके होंठों तक आ गई। फिर अमृता ने वह पत्र फाड़ डाला और सूने नेत्रों से उन टुकड़ों को देखती रही। मंगल घट पर रखा हुआ नारियल, फूलमालाओं से लिपटे दो हाथ, किसी और नारी का भविष्य मुकुल के साथ बँध रहा था।

एक दिन जब पड़ोस के बच्चों का शोर असह्य हो गया, तो अमृता ने मुँह हाथों में छिपा लिया। वह आँसुओं से भीगा था। वह रोज़ देखती थी कि उस घर की पत्नी प्रसन्न मुख से पति के साथ उसे बाहर तक पहुँचाने जाती है। फिर बच्चों का मुख चूमकर स्कूल भेजती है, और दो बच्चों के मधुर कलरव से घर गूँजता रहता है। अगर कभी अमृता से मिलने आती है, तो नन्हा शिशु उसके कमरे में तूफ़ान मचा देता है। मेज़पोश खींचकर फेंक देता है, स्याही की दावात लुढ़का देता है, फूलदान में से फूल निकालकर सारे कमरे में बिखरा देता है, और माँ के डाँटने पर शरारत से हँस देता है।

अमृता को यह सब बहुत भला लगता। पर साथ ही एक अव्यक्त विषाद से दिल भारी हो उठता। यह सूनापन, यह अकेली ज़िन्दगी! मुकुल के पत्नी है। बच्चे भी होंगे ही। आठ साल हो गए, पूरे आठ साल। मुकुल पुरुष है। वह अपनी दुनिया बार-बार बसा सकता है। पर अमृता?

जाड़े की सूनी, लम्बी शाम। अमृता चुपचाप अँगीठी में दहकते कोयले देख रही थी। एक दिन उसके दिल में भी ऐसी ही आग धधक रही थी, मगर अब वह आग बुझ चुकी थी। बची थी गरम राख। दर्द में उतनी तेज़ी नहीं थी, मगर अब वह रोम-रोम में भिद गया था, नस-नस में बस गया था। अमृता ने बाहर नज़र डाली। अँधेरे में एक छाया-सी थी। निर्जन सड़क पर एक व्यक्ति, भला-भटका-सा। शायद यह भी मेरी ही तरह लक्ष्यहीन है। शायद इसके भी कोई घर नहीं है, जहाँ यह शाम को जा सके। उस अनजान, अपरिचित व्यक्ति के लिए संवेदना से उसका हृदय भर उठा।

किसी ने द्वार पर थपकी दी। अमृता ने द्वार खोल दिया, और विस्मय से पीछे हट गई। आगन्तुक बिजली के नीचे आया।

“आप?” वह जैसे चीख पड़ी।

“हाँ, मैं ही हूँ,” व्यथा से बोझिल स्वर में मुकुल बोला। और उसने एक नन्हे-से शिशु को सावधानी से आरामकुरसी पर लिटा दिया, जिसे वह अपने ओवरकोट से ढँके था। अमृता अवाक।

“अमृता, मेरी पत्नी मर चुकी है। उसके मरने से मेरे लिए कुछ अन्तर नहीं। मैं उसके जीते-जी उतना ही अकेला था, जितना कि तुम्हारे जाने के बाद से था। मैं जानता हूँ कि तुम मुझे स्वीकार नहीं करोगी, मगर न जाने क्या मुझे यहाँ तक खींच लाया। एक हल्की-सी आशा…”

अमृता एकटक उसे देख रही थी। आठ सालों में वह बहुत बदल गया था। बरसों का बीमार-सा, टूटा-टूटा, खोया-खोया, उदास और बेहद अकेला। उसके दर्द ने उसे एक स्निग्ध, अलौकिक आकर्षण दे दिया था, जिसे केवल अमृता की ही आँखें देख सकीं।

शिशु रोया, और अमृता ने झपटकर उसे उठा लिया। कन्धे से लगाया और धीरे-धीरे थपकने लगी। दिल में न जाने कैसा-सा लगा कि आँखों से आँसू चू पड़े।

Book by Usha Priyamvada:

Pratinidhi Kahaniyan - Usha Priyamvada

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उषा प्रियंवदा
उषा प्रियंवदा (जन्म २४ दिसम्बर १९३०) प्रवासी हिंदी साहित्यकार हैं। कानपुर में जन्मी उषा प्रियंवदा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पी-एच. डी. की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। उषा प्रियंवदा के कथा साहित्य में छठे और सातवें दशक के शहरी परिवारों का संवेदनापूर्ण चित्रण मिलता है। उस समय शहरी जीवन में बढ़ती उदासी, अकेलेपन, ऊब आदि का अंकन करने में उन्होंने अत्यंत गहरे यथार्थबोध का परिचय दिया है।