मछलियों का मायका नहीं होता
उन्हें ब्याह कर ससुराल नहीं जाना पड़ता
उनका मरद उन्हें छोड़ कमाने बाहर नहीं जाता
बच्चे भी हमेशा आसपास ही रहते हैं
कितना सुंदर है मछलियों का संसार

रिश्ते तो उनके भी होते होंगे
होता होगा
अपना-पराया
देश-परदेश
सरहद
तीज-त्योहार
धर्मस्थल
तीर्थस्थल
होती होंगी इच्छाएँ
लालसाएँ
वर्जनाएँ

तभी तो
आटे की गोली खाने में
बिछड़ जाती हैं एक-दूसरे से
फँस जाती हैं जाल में
तोड़ देती हैं दम
तड़पते हुए पानी से बाहर।

Previous articleअरबी बाज़ार
Next articleबीस साल बाद
अखिलेश्वर पांडेय
पत्रकारिता | जमशेदपुर (झारखंड) में निवास | पुस्तक : पानी उदास है (कविता संग्रह) - 2017 प्रकाशन: हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, पाखी, कथादेश, परिकथा, कादंबिनी, साक्षात्कार, इंद्रप्रस्थ भारती, हरिगंधा, गांव के लोग, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, प्रभात खबर आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, साक्षात्कार व आलेख प्रकाशित. कविता कोश, हिन्दी समय, शब्दांकन, स्त्रीकाल, हमरंग, बिजूका, लल्लनटॉप, बदलाव आदि वेबसाइट व ब्लॉग पर भी कविताएं व आलेख मौजूद. प्रसारण: आकाशवाणी जमशेदपुर, पटना और भोपाल से कविताएं व रेडियो वार्ता प्रसारित. फेलोशिप/पुरस्कार: कोल्हान (झारखंड) में तेजी से विलुप्त होती आदिम जनजाति सबर पर शोधपूर्ण लेखन के लिए एनएफआई का फेलोशिप और नेशनल मीडिया अवार्ड. ई-मेल : [email protected]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here