मैं एक बेरोज़गार नौजवान था

कितनी मधुर लगती थीं
और गहराई तक कचोटती थीं
रेडियो और दूरदर्शन पर
उद्घोषिकाओं की आवाज़ें
जब वो पढ़ती थीं रिक्तियाँ, अर्हताएँ

कैसे दिल धड़कता था
कैसी थी वो ज़िन्दगी से मोहब्बत
हर मोहब्बत से बड़ी
रिश्ता कुछ उम्मीदों, कुछ तमन्नाओं का

कल से घर की सब तकलीफ़ें दूर हो जाएँगी

माँ को ला दूँगा एक सोने की चेन, बहन को एक कलाई घड़ी…
रिश्ता ऐसे छोटे-छोटे ख़्वाबों का।

अब जो रोज़मर्रा ऑफ़िस आता-जाता हूँ
अब जो ज़िन्दगी चलती है, मालगाड़ी की तरह पटरी पर
और आती है एक नपी-तुली तनख़्वाह बैंक में हर महीने,
अचानक शामों को मन चला जाता है तीन दशक पहले की शामों की तरफ़
जब
सरकारी सेवाओं के ख़ाली पद बताए जाते थे
आकाशवाणी और दूरदर्शन पर,
वह एकरस तथ्यपरक सम्भव-सी आवाज़
बस शायद यही काम मिल जाए,
आवाज़ तो मेरी भी अच्छी है
पढ़ता तो मैं भी अच्छा हूँ।
एक व्यावसायिक भाव से
बेचूँ नौकरी के सपने…

किस तरह दिल पे एक सही निशाने के तीर-सा घुस जाता था
रोज़गार समाचार का वह कोना, जहाँ कुछ अपने जैसा दिखे।

इतने सालों से वही बोझ रोज़ उठाता, रोज़ उतारता
जीता हूँ जो, तो अकेले बैठे कभी याद आते हैं वो दिन
एक उच्छवास, एक सुख-दुःख की मिली-जुली ये दुनिया और ज़िन्दगी की रवायत
अब जो भी है
जैसी भी है
बस ठीक है, स्वीकार कर लेने का भाव…

एक बूँद पानी आँख की कोरों पर आता है
जिसे मैं छुपा के, मुस्कुरा के पोंछ लेता हूँ
और दिल की नरम पहली सतह पर दुआएँ लिखता हूँ।

भाई की कमीज़, दोस्त के जूते उधार पहनकर
जो अनवरत चक्की-सी चलने वाली नौकरी का इण्टरव्यू पास किया मैंने
बस.. बस ईश्वर मेरे-जैसे हर नौजवान को इतना ज़रूर देना…
क्योंकि ईश्वर न करे, ज़िन्दगी इससे भी ज्यादा ख़राब हो सकती थी
और उठ जाता हूँ रोज़ उसी रस्ते पर चलने।

जब गला सूख जाता था सोच के कि कब होगा, क्या होगा
कण्ठ में गटकना
मुश्किल होता
जैसे धातु की कोई गोली फँसी हो,
छाती में ग़ुबार
पेट में ऐंठनें।

ज़िन्दगी झोपड़ी से महल नहीं,
बस मध्यम वर्ग से एक मध्यम वर्ग का सफ़र रही
और बस बहुत रही।

क्योंकि अगर ये भी न होता तो क्या होता?

मैं एक बेरोज़गार नौजवान था।

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