जब तक मैं थामे रहा
मेले की तमाम गहमागहमी के बीच
किसी उँगली को मज़बूती के साथ,
बचपन और नौचंदी का मेला बना रहा
मेरे लिए कौतुहल का सबब
और देखने-दिखाने लायक़

माँ अम्बे की आरती और
बाले मियाँ की मज़ार से उठीं
कव्वालों की सदाएँ
जब तक गूँजती रही कोरस में
मेरे लिए रहा यह मेला
वाक़ई एकदम मेले जैसा

मेले की दुकानों पर
जब तक हलुआ पराँठा
बरेली का ममीरा
कच्ची मिट्टी में पगा काजल मिलता रहा
मेरे लिए बर्फ़ की सिल पर रखे कसेरू
हमेशा सुस्वादिष्ट बने रहे

मेले की भीड़ के बीच
पुलिसिया घोड़े चलते रहे चुपचाप
बल्लियाँ जोड़कर बने वॉच टावर पर
ऊँघते रहे वर्दीधारी सिपाही
मेरे लिए उनकी ये बन्दूक़ें रहीं
लकड़ी के बेजान कुन्दे

मेले में एकबार मची थी भगदड़
हुई थी तब यहाँ ख़ूब मारकाट
इतिहास बाँचता कोई विद्वान्
जब यह बताता
मेरे लिए इसे अफ़वाह मान लेने की
मौजूद रहती थीं तमाम वजह

नौचंदी का मेला हर बरस लगता
इसकी हमनाम रेलगाड़ी रोज़ आती-जाती
रेलगाड़ी की खिड़की पर बैठा कवि
लगातार करता है ख़तरे की मुनादी

मेरे लिए नौचंदी का मेला फिर भी
ज़िन्दा उम्मीद का तन्हा लफ़्ज़ है!

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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