नवागत

‘Navagat’, a poem by Kavita Nagar

साल के आख़िरी महीने के
कान में पड़ रहा है धीमा स्वर,
गूँज रहा है नये साल का गीत।

बिखर रही हैं स्वर लहरियाँ,
मन में उत्सव की तरह।
हर बार की तरह फिर
आगंतुक है बारहों महीनें।
आवभगत होगी उनकी जमकर।
फिर कुछ ‘दिन’ जीम कर चले जाएँगे।

चिरौरी की थी लम्हों ने कभी, तभी तो
नयी ऊर्जा का पैरहन पहन,
आये नये माह मेहमान बनकर।
इनकी मुलाक़ातों में छिपी है,
अपार सम्भावनाएँ।

फिर एक बार
नवीनता की कोख में
कुछ
तारीख़ें उम्मीद से है।