अनुवाद: शम्भु यादव

सुबह मैं गली के दरवाज़े में खड़ी सब्ज़ीवाले से गोभी की क़ीमत पर झगड़ रही थी। ऊपर रसोईघर में दाल-चावल उबालने के लिए चढ़ा दिए थे। नौकर सौदा लेने के लिए बाज़ार जा चुका था। ग़ुस्लख़ाने में वकार साहब बेसिन के ऊपर लगे हुए धुंधले-से शीशे में अपना मुँह देखते हुए गुनगुना रहे थे और शेव करते जाते थे। मैं सब्ज़ीवाले के साथ बहस करने के साथ-साथ सोचने में व्यस्त थी कि रात के खाने के लिए क्या-क्या बना लिया जाए। इतने में सामने एक कार आकर रुकी। एक लड़की ने खिड़की में से झाँका और दरवाज़ा खोलकर बाहर उतर आयी। मैं पैसे गिन रही थी, इसलिए मैंने उसे न देखा। वह एक क़दम आगे बढ़ी। अब मैंने सिर उठाकर उस पर नज़र डाली।

“अरे!… तुम…” उसने हक्की-बक्की होकर कहा और ठिठककर रह गयी। ऐसा लगा जैसे वह मुद्दतों से मुझे मरी हुई सोचे बैठी है और अब मेरा भूत उसके सामने खड़ा है।

उसकी आँखों में एक क्षण के लिए जो डर मैंने देखा, उसकी याद ने मुझे बावला-सा कर दिया है। मैं तो सोच-सोचकर पागल हो जाऊँगी।

यह लड़की, इसका नाम तक मुझे याद नहीं, और इस समय मैंने झेंप के मारे उससे पूछा भी नहीं, वरना वह कितना बुरा मानती! मेरे साथ दिल्ली के क्वीन मेरी स्कूल में पढ़ती थी। यह बीस साल पहले की बात है। मैं उस समय यही कोई सत्रह वर्ष की रही हूँगी लेकिन मेरा स्वास्थ्य इतना अच्छा था कि अपनी उम्र से कहीं बड़ी लगती थी और मेरे सौन्दर्य की धूम मचनी शुरू हो चुकी थी। दिल्ली का रिवाज था कि लड़के वालियाँ स्कूल-स्कूल घूमकर लड़कियाँ पसन्द करती फिरती थीं और जो लड़की पसन्द आती थी, उसके घर ‘रुक्का’ भिजवा दिया जाता था। उन्हीं दिनों मुझे यह ज्ञात हुआ कि इस लड़की की माँ-मौसी आदि ने मुझे पसन्द कर लिया है (स्कूल डे के उत्सव के दिन देखकर) और अब वे मुझे बहू बनाने पर तुली बैठी हैं। ये लोग नूरजहाँ रोड पर रहते थे और लड़का हाल ही में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया में दो-डेढ़ सौ रुपये मासिक पर नौकर हुआ था। चुनाचे ‘रुक्का’ मेरे घर भिजवाया गया। लेकिन मेरी अम्माजान मेरे लिए बड़े-बड़े सपने देख रही थीं। मेरे अब्बा दिल्ली से बाहर मेरठ में रहते थे और अभी मेरे विवाह का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था इसलिए वह प्रस्ताव एकदम अस्वीकार कर दिया गया।

इसके बाद यह लड़की कुछ दिन तक मेरे साथ कॉलेज में भी पढ़ी। फिर इसकी शादी हो गयी और यह कॉलेज छोड़कर चली गयी। आज बहुत दिनों बाद माल रोड के पिछवाड़े इस गली में मेरी उससे भेंट हुई। मैंने उससे कहा, “ऊपर आओ, चाय-वाय पीयो, इत्मीनान से बैठकर बातें करेंगे।”

लेकिन उसने कहा, “मैं जल्दी में किसी ससुराली रिश्तेदार का मकान ढूँढती हुई इस गली में आ निकली थी। इंशाअल्लाह! मैं फिर कभी ज़रूर आऊँगी।”

इसके बाद उसने वहीं खड़े-खड़े जल्दी-जल्दी एक-एक करके सारी पुरानी सहेलियों के क़िस्से सुनाए—कौन कहाँ है और क्या कर रही है। सलमा अमुक ब्रिगेडियर की पत्नी है, चार बच्चे हैं, परख़ुदा का पति ‘फ़ौरिन सरविस’ (विदेश मन्त्रालय) में है, उसकी बड़ी लड़की लन्दन में पढ़ रही है। रेहाना अमुक कॉलेज में प्रिंसिपल हैं। सईदा अमरीका से ढेरों डिग्रियाँ ले आयी है और कराची में किसी ऊँचे पद पर विराजमान है। कॉलेज की हिन्दू सहेलियों के बारे में भी उसे पता था कि प्रभा का पति इण्डियन नेवी में कमाण्डर है। वह बम्बई में रहती है। सरला ऑल इण्डिया रेडियो में स्टेशन डायरेक्टर है और दक्षिण भारत में कहीं है। लोतिका बड़ी प्रसिद्ध चित्रकार बन चुकी है और नई दिल्ली में उसका स्टुडियो है, आदि-आदि। वह यह बातें कर रही थी लेकिन उसकी आँखों के डर को मैं न भूल सकी।

उसने कहा, “मैं, सईदा, रेहाना आदि जब भी कराची में इकट्ठा होती हैं, तुम्हें बराबर याद करती हैं।”

“सचमुच…?” मैंने खोखली हँसी हँसकर पूछा। मुझे पता था मुझे किन शब्दों में याद किया जाता होगा। पिच्छल परछाइयाँ! अरे क्या वे लोग मेरी सहेलियाँ थीं! स्त्रियाँ वास्तव में एक-दूसरे के सम्बन्ध में चुड़ैलें होती हैं, कुटनियाँ कुलटाएँ! उसने मुझसे यह नहीं पूछा था कि यहाँ अंधेरी गली में इस खण्डहर जैसे मकान में क्या कर रही हूँ। उसे पता था।

स्त्रियों की ‘इंटेलीजेंस सर्विस’ इतनी तेज़ होती है कि ख़ुफ़िया विभाग का विशेषज्ञ भी उसके आगे पानी भरे, और फिर मेरी कहानी तो इतनी दुःख भरी है। मेरी दशा कोई उल्लेखनीय नहीं। गुमनाम हस्ती हूँ इसलिए किसी को मेरी चिन्ता नहीं, स्वयं मुझे भी अपनी चिन्ता नहीं।

मैं तनवीर फ़ातिमा हूँ। मेरे माँ-बाप मेरठ के रहने वाले थे। वे साधारण स्थिति के व्यक्ति थे। हमारे यहाँ बड़ा कड़ा पर्दा किया जाता है। स्वयं मेरा अपने चचाजान, फुफेरे भाइयों से पर्दा था। मैं असीम लाड़-प्यार में पली चहेती लड़की थी। जब मैंने स्कूल में बहुत-से वज़ीफ़े ले लिए तो मैट्रिक करने के लिए विशेष रूप से मुझे क्वीन मेरी स्कूल में दाख़िल कराया गया। इण्टर के लिए अलीगढ़ भेज दी गयी। अलीगढ़ गर्ल्स कॉलेज के दिन मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिन थे। क्या स्वप्न भरे मदमाते दिन थे! मैं भावुक नहीं, लेकिन अब भी जब कॉलेज का सहन, लॉन, घास के ऊँचे पौधे, पेड़ों पर झुकी बारिश, नुमाइश के मैदान में घूमते हुए काले बुर्क़ों के परे होस्टल के संकरे-संकरे बरामदों, छोटे-छोटे कमरों का वह कठोर वातावरण याद आता है तो जी डूब-सा जाता है। एम.एस.सी. के लिए फिर दिल्ली आ गयी। यहाँ कॉलेज में मेरे साथ ये ही सब लड़कियाँ पढ़ती थीं—सईदा, रेहाना, प्रभा, फलानी-ढिमाकी। मुझे लड़कियाँ पसन्द नहीं आयीं, मुझे दुनिया में अधिकतर लोग पसन्द नहीं आए। अधिकतर लोग व्यर्थ ही समय नष्ट करने वाले हैं। मैं बहुत दम्भी थी। सौन्दर्य ऐसी चीज़ है कि आदमी का दिमाग़ ख़राब होते देर नहीं लगती। फिर मैं तो लाखों में एक थी। शीशे का एक झलकता हुआ रंग, लालिमा लिए हुए सुनहरी बाल, एकदम हृष्ट-पुष्ट—बनारसी साड़ी पहन लूँ तो बिलकुल कहीं की महारानी लगती थी।

ये विश्वयुद्ध के दिन थे या शायद युद्ध इसी साल ख़त्म हुआ था, मुझे ठीक से याद नहीं है। बहरहाल, दिल्ली पर बहार आयी हुई थी। करोड़पति कारोबारियों और भारत-सरकार के बड़े-बड़े अफ़सरों की लड़कियाँ हिन्दू-सिख-मुसलमान… लम्बी-लम्बी मोटरों में उड़ी-उड़ी फिरतीं। नित नई पार्टियाँ, उत्सव, हंगामे—आज इन्द्रप्रस्थ कॉलेज में ड्रामा है, कल मिराण्डा हाउस में, परसों लेडी इरविन कॉलेज में संगीत-सभा है। लेडी हार्डिंग और सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज, चेम्सफ़ोर्ड क्लब, रोशनआरा, अमीरिल जिमख़ाना—मतलब यह कि हर ओर अलिफ़-लैला के बाल बिखरे पड़े थे, हर स्थान पर नौजवान फ़ौजी अफ़सरों और सिविल सर्विस के अविवाहित पदाधिकारियों के ठट डोलते दिखायी देते। एक हंगामा था।

प्रभा और सरला के साथ एक दिन दिलजीतकौर के यहाँ, जो एक करोड़पति सिख कांट्रैक्टर की लड़की थी, किंग एडवर्ड रोड की एक शानदार कोठी में गार्डन पार्टी में निमन्त्रित थी।

यहाँ मेरी भेंट मेजर ख़ुशवक़्तसिंह से हुई। वह झाँसी की तरफ़ का चौहान राजपूत था। लम्बा-तगड़ा, काला भुजंग, लम्बी-लम्बी ऊपर को मुड़ी हुई नुकीली मूँछें, बेहद चमकते और ख़ूबसूरत दाँत, हँसता तो बहुत अच्छा लगता। ग़ालिब का उपासक था। बात-बात में शेर पढ़ता, क़हक़हे लगाता और झुक-झुककर बहुत ही सभ्यतापूर्वक सबसे बातें करता। उसने हम सबको दूसरे दिन सिनेमा चलने का निमन्त्रण दिया। सरला, प्रभा एक ही बद-दिमाग़ लड़कियाँ थीं और अच्छी-ख़ासी रूढ़ीवादी थीं। वे लड़कों के साथ बाहर घूमने बिलकुल नहीं जाती थीं। ख़ुशवक़्तसिंह दिलजीत के भाई का मित्र था। मेरी समझ में नहीं आया कि मैं उसे क्या उत्तर दूँ कि इतने में सरला ने चुपके से कहा, “ख़ुशवक़्त के साथ हरगिज़ सिनेमा न जाना, बड़ा लोफ़र लड़का है।”

मैं चुप हो गयी।

इन दिनों नई दिल्ली के एक-दो आवारा लड़कियों के क़िस्से बहुत मशहूर हो रहे थे और मैं सोच-सोचकर ही डरा करती थी। शरीफ़ ख़ानदानों की लड़कियाँ अपने माँ-बाप की आँखों में धूल झोंककर किस तरह लोगों के साथ रंग-रेलियाँ मनाती हैं। होस्टल से प्रायः इस प्रकार की लड़कियों के सम्बन्ध में अटकलें लगाया करतीं। वे बहुत ही अजीब और रहस्यमयी हस्तियाँ मालूम होतीं, यद्यपि देखने में वे भी हमारी ही तरह की लड़कियाँ थीं—साड़ियाँ सलवारें पहने, बाक़ी सुन्दर और पढ़ी-लिखी।

“लोग बदनाम करते हैं जी”, सईदा दिमाग़ पर बड़ा ज़ोर डालकर कहती, “अब ऐसा भी क्या है?”

“वास्तव में हमारी सोसाइटी ही अभी इस योग्य नहीं हुई कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को अपने में समो सके।” सरला कहती।

“होता यह है कि लड़कियाँ सन्तुलन-भावना को खो बैठती हैं।” रेहाना अपना मत प्रकट करती।

जो भी हो, किसी भी तरह विश्वास न होता कि हमारी जैसी हमारे ही साथ की कुछ लड़कियाँ ऐसी-ऐसी भयानक करतूतें किस तरह करती हैं।

दूसरी शाम को मैं लेबोरेटरी की ओर जा रही थी कि निकल्सन मेमोरियल के पास एक किरमिची रंग की लम्बी-सी कार धीरे-से रुक गयी। उसमें से ख़ुशवक़्तसिंह ने झाँका और अंधेरे में उसके ख़ूबसूरत दाँत झिलमिलाए।

“अजी देवीजी, यों कहिए कि आप अपना कल वाला एप्वाइंटमेंट भूल गयीं!”

“जी…?” मैंने हड़बड़ाकर कहा।

“हुज़ूरेआला चलिए मेरे साथ फ़ौरन! यह शाम का वक़्त लेबोरेटरी में घुसकर बैठने का नहीं है। इतना पढ़कर क्या कीजिएगा?”

मैंने बिलकुल यों ही अपने चारों ओर देखा और कार में दुबककर बैठ गयी।

हमने कनॉट प्लेस जाकर एक अंग्रेज़ी फ़िल्म देखी।

उसके अगले दिन भी।

इसके बाद मैंने एक हफ़्ते तक उसके साथ ख़ूब सैर की। वह ‘मेडेंस’ में ठहरा हुआ था।

उस सप्ताह के अन्त तक मैं मेजर ख़ुशवक़्तसिंह की श्रीमती बन चुकी थी।

मैं साहित्यिक नहीं हूँ। मैंने चीनी, जापानी, रूसी, अंग्रेज़ी या उर्दू कवियों का अध्ययन नहीं किया। साहित्य पढ़ना मेरे विचार से समय बर्बाद करना है। पन्द्रह वर्ष की आयु से विज्ञान ही मेरा ओढ़ना-बिछौना रहा है। मैं नहीं जानती कि आध्यात्मिक कल्पनाएँ क्या होती हैं और रहस्यवाद का क्या अर्थ है। काव्य और दर्शन के लिए मेरे पास न तब समय था और न अब है। मैं बड़े-बड़े, उलझे हुए, अस्पष्ट और रहस्यपूर्ण शब्द भी प्रयोग नहीं कर सकती।

बहरहाल, पन्द्रह दिन के अन्दर-अन्दर यह घटना भी कॉलेज में सबको मालूम हो गयी थी, लेकिन मुझमें अपने अन्दर हमेशा से एक विचित्र-सा आत्मविश्वास था। मैंने चिन्ता नहीं की। पहले भी मैं लोगों से बोलचाल बहुत कम रखती थी। सरला वग़ैरह का गुट अब मुझे ऐसी निगाहों से देखता जैसे मैं मंगल ग्रह से उतरकर आयी हूँ, मेरे सिर पर सींग हैं। डाइर्निंग हॉल में मेरे बाहर जाने के बाद घण्टों मेरे क़िस्से दुहराए जाते। अपनी इंटेलीजेन्स सार्विस के ज़रिए मेरे और ख़ुशवक़्त के बारे में उनको पल-पल की ख़बर रहती—हम लोग शाम को कहाँ गए, रात को नई दिल्ली के कौन से बॉलरूम में नाचे (ख़ुशवक़्त मार्के का डांसर था, उसने मुझे नाचना भी सिखा दिया था), ख़ुशवक़्त ने मुझे कौन-कौन से तोहफ़े, कौन-कौन सी दुकान से ख़रीद कर दिए।

ख़ुशवक़्तसिंह मुझे मारता बहुत था और मुझसे इतना प्यार करता था जितना आज तक दुनिया में किसी भी पुरुष ने किसी भी स्त्री से न किया होगा।

कई महीने बीत गए। मेरी एम.एस.सी. प्रिवियस की परीक्षा सिर पर आ गयी और मैं पढ़ने में जुट गयी। परीक्षाएँ होने के बाद उसने कहा, “जानेमन, दिलरुबा! चलो किसी ख़ामोश-से पहाड़ पर चलें—सोलन, डलहौजी, लेनसाउ।”

मैं कुछ दिन के लिए मेरठ गयी और अब्बा से यह कहकर (अम्माजान का, जब मैं थर्ड ईयर में थी, स्वर्गवास हो गया था) दिल्ली वापस आ गयी कि अन्तिम वर्ष के लिए बेहद पढ़ाई करनी है। उत्तर भारत के पहाड़ी स्थानों पर बहुत-से परिचितों के मिलने की सम्भावना थी, इसलिए हम सुदूर दक्षिण में ऊटी चले गए। वहाँ महीना-भर रहे। ख़ुशवक़्त की छुट्टियाँ ख़त्म हो गयीं तो दिल्ली वापस आकर तिमारपुर के एक गाँव में टिक गए।

कॉलेज खुलने से एक हफ़्ता पहले मेरी और ख़ुशवक़्त की ज़बर्दस्त लड़ाई हुई। उसने मुझे ख़ूब मारा। इतना मारा कि मेरा चेहरा लहूलुहान हो गया और मेरी बाँहों और पिंडलियों पर नील पड़ गए। लड़ाई का कारण उसकी वह मुरदार ईसाई मंगेतर थी जो न जाने कहाँ से टपक पड़ी थी और सारे शहर में मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलती फिर रही थी। अगर उसका बस चलता तो मुझे कच्चा चबा जाती। वह चार सौ बीस लड़की महायुद्ध के दिनों में फ़ौज में थी और ख़ुशवक़्त को बर्मा के मोर्चे पर मिली थी।

ख़ुशवक़्त न जाने किस तरह उसे उसके साथ शादी करने का वचन दे दिया था, पर मुझसे मिलने के बाद वह अब उसकी अँगूठी वापस करने पर तुला बैठा था।

उस रात तिमारपुर के सुनसान बंगले में उसने मेरे हाथ जोड़े और रो-रोकर मुझसे कहा कि मैं उससे विवाह कर लूँ। अन्यथा वह मर जाएगा। मैंने कहा, हरगिंज़ नहीं, क़यामत तक नहीं। मैं शरीफ़ घराने की सैयदज़ादी हूँ, भला मैं उस काले तम्बाकू के पिंडे हिन्दू जाति के आदमी से शादी करके ख़ानदान के माथे पर कलंक का टीका लगाती! मैं तो उस सुन्दर और रूपवान किसी बहुत से ऊँचे मुसलमान घराने के कुल-दीप के स्वप्न देख रही थी जो एक दिन देर-सबेर बरात लेकर मुझे ब्याहने आएगा, हमारा आरसी मुसाहिफ़ होगा, मैं ठाट-बाट से मायके से विदा होकर उसके घर जाऊँगी, छोटी ननदें दरवाज़े पर देहली रोककर अपने भाई से नेग के लिए झगड़ेंगी, मीरासिनें ढोलक लिए खड़ी होंगी। क्या-क्या कुछ होगा! मैंने क्या हिन्दू-मुस्लिम शादियों का परिणाम देखा नहीं था। कइयों ने प्रगतिवाद या प्यार की भावना के जोश में हिन्दुओं से शादियाँ रचायीं और साल-भर बाद जूतियों में दाल बटी! बच्चों का भविष्य बिगड़ा वह अलग, न इधर के रहे न उधर के। मेरे इंकार करने पर ख़ुशवक़्त ने जूते-लातों से मार-मारकर मेरा कचूमर निकाल दिया और तीसरे दिन उस डायन काली बला कैथरिन धर्म-दास के साथ आगरे चला गया जहाँ उस कमीनी लड़की से सिविल मैरिज कर ली।

जब मैं नई टर्म शुरू होने पर होस्टल पहुँची तो इस हुलिये से कि मेरे सिर और मुँह पर पट्टी बंधी हुई थी। अब्बा को मैंने लिख भेजा कि लेबोरेटरी में एक एक्सपेरीमेंट कर रही थी कि एक ख़तरनाक एसिड भक से उड़ा और उससे मेरा मुँह थोड़ा-सा जल गया। अब बिलकुल ठीक हूँ, आप बिलकुल चिन्ता न करें।

लड़कियों को तो पहले ही सारा क़िस्सा मालूम था, इसलिए उन्होंने औपचारिक रूप से मेरी ख़ैर-ख़बर न पूछी। इतने बड़े स्कैण्डल के बाद मुझे होस्टल में रहने की अनुमति न दी जाती, लेकिन होस्टल की वार्डन ख़ुशवक़्त सिंह की गहरी दोस्त थी इसलिए सब ख़ामोश रहे। इसके अतिरिक्त किसी के पास किसी प्रकार का प्रमाण भी न था। कॉलेज की लड़कियों को लोग यों भी ख़ामख़ाह बदनाम करने पर तुले रहते हैं।

मुझे वह वक़्त अच्छी तरह याद है, जैसे कल ही की बात हो। सुबह के ग्यारह बजे होंगे। रेलवे स्टेशन से लड़कियों के तांगे आकर फाटक में घुस रहे थे, होस्टल के लॉन पर बरगद के पेड़ के नीचे लड़कियाँ अपना-अपना सामान उतरवाकर रखवा रही थीं। बड़ी चिल्ल-पों मचा रखी थीं। जिस समय मैं अपने तांगे से उतरी व मेरा ढाठे से बन्धा सफ़ेद चेहरा देखकर इतनी आश्चर्यचकित हुई जैसे सबको साँप सूँघ गया हो। मैंने अपना सामान चौकीदार के सिर पर रखवाया और अपने कमरे की ओर चली गयी। दोपहर को जब मैं खाने की मेज़ पर आकर बैठी तो उन कुलटाओं ने मुझसे इस ढंग से औपचारिक बातें शुरू की जिनसे भली-भाँति यह प्रकट हो जाए कि मेरी इस दुर्घटना का वास्तविक कारण उन्हें पता है और मुझे अपमानित होने से बचाने के लिए उसकी चर्चा ही नहीं कर रही हैं। उनमें से एक ने जो उस चण्डाल-चौकड़ी का केन्द्र और उन सबकी उस्ताद थी, रात को खाने की मेज़ पर निर्णय दिया कि मैं एक कामी स्त्री हूँ। मेरी जासूसों द्वारा यह सूचना तुरन्त ऊपर मेरे पास पहुँच गयी जहाँ मैं उस समय अपने कमरे में खिड़की के पास टेबुल लैम्प लगाए पढ़ाई में व्यस्त थी और इस तरह की बातें तो अब आम थीं कि बेपर्दगी आज़ादी ख़तरनाक है और ऊँची शिक्षा बदनाम है आदि-आदि।

मैं अपनी सीमा तक शत-प्रतिशत इन बातों से सहमत थी। मैं स्वयं सोचती थी कि कुछ अच्छी-ख़ासी, भली-चंगी, उच्च शिक्षा-प्राप्त लड़कियाँ आवारा क्यों हो जाती हैं। एक विचारधारा थी कि वही लड़कियाँ आवारा होती हैं जिनके पास सूझ-बूझ बहुत कम होती है। मानव-मस्तिष्क कभी भी अपनी बर्बादी की ओर जान-बूझकर क़दम नहीं उठाएगा लेकिन मैंने तो अच्छी-ख़ासी समझदार, तज़ो-तर्रार लड़कियों को आवारागर्दी करते देखा था। दूसरी विचारधारा थी कि रुपये-पैसे, ऐशो-आराम का जीवन, क़ीमती भेंटों का लालच, रोमांस की खोज, साहसिक कार्य करने की अभिलाषा या मात्र उकताहट या पर्दे के बन्धनों के बाद स्वतंत्रता के वातावरण में प्रवेश कर पुराने बन्धनों से विद्रोह इस आवारगी के कुछ कारण है। ये सब बातें अवश्य होंगी, अन्यथा और क्या कारण हो सकता है?

मैं अपनी पहली तिमाही परीक्षा से छूटी थी कि ख़ुशवक़्त भी आ पहुँचा। उसने मुझे लेबोरेटरी में फ़ोन किया कि मैं नरूला में छः बजे उससे मिलूँ। मैंने ऐसा ही किया। वह कैथरिन को अपने माँ-बाप के पास छोड़कर एक सरकारी काम से दिल्ली आया था। इस बार हम हवाई जहाज़ से एक सप्ताह के लिए बम्बई चले गए।

इसके बाद हर दूसरे-तीसरे महीने मिलना होता रहा। एक साल बीत गया। इस बार जब वह दिल्ली आया तो उसने अपने एक निकटतम मित्र को मुझे लेने के लिए मोटर लेकर भेजा क्योंकि वह लखनऊ से लाहौर जाते हुए पालम पर कुछ घण्टों के लिए ठहरा था। यह मित्र दिल्ली के एक बहुत बड़े मुसलमान व्यापारी का लड़का था। लड़का तो ख़ैर नहीं कहना चाहिए, उस समय वह चालीस के पेटे में रहा होगा—बीवी-बच्चोंवाला। ताड़-सा क़द। बेहद ग़लत अंग्रेज़ी बोलता था, काला, बदसूरत बिलकुल चिड़ीमार की शक्ल, होशो-हवाश ठीक-ठाक।

ख़ुशवक़्त इस बार दिल्ली से गया तो फिर कभी वापस न आया क्योंकि अब मैं फ़ारुक़ की पत्नी बन चुकी थी।

फ़ारुक़ के साथ अब मैं उसकी मंगेतर की हैसियत से बाक़ायदा दिल्ली की ऊँची सोसायटी में शामिल हो गयी। मुसलमानों में तो चार शादियाँ तक उचित हैं, इसलिए कोई बहुत बड़ी बात न थी, अर्थात धर्म की दृष्टि से कि वह अपनी अनपढ़, अधेड़ उम्र की पर्दे की पत्नी के होते हुए एक पढ़ी-लिखी लड़की से शादी करना चाहता था, जो चार आदमियों में ढंग से बैठ सके और फिर धनिक वर्ग में सब कुछ उचित है। यह तो हमारे मध्यवर्गीय समाज के ही नियम हैं कि यह न करो, वह न करो। लम्बी छुट्टियों के दिनों में फ़ारुक़ ने भी मुझे ख़ूब सैर करायी—कलकत्ता, लखनऊ, अजमेर—कौन-सी जगह थी जो मैंने उसके साथ न देखी। उसने मुझे हीरे-जवाहरात के गहनों से लाद दिया। अब्बा को लिख भेजती थी कि यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के साथ ‘टूर’ पर जा रही हूँ या अमुक स्थान पर साइंस कांफ़्रेंस में भाग लेने के लिए मुझे बुलाया गया है, लेकिन साथ-ही-साथ मुझे अपनी शिक्षा का रिकार्ड ऊँचा रखने की धुन थी। फ़ाइनल परीक्षा में मैंने बहुत ही ख़राब पर्चे किए और परीक्षाएँ समाप्त होते ही घर चली गयी।

उन्हीं दिनों दिल्ली में गड़बड़ी शुरू हुई और लड़ाई-झगड़ों को भूचाल आ गया। फ़ारुक़ ने मुझे मेरठ पत्र लिखा कि तुम अविलम्ब पाकिस्तान चली जाओ, मैं तुमसे वहीं मिलूँगा। मेरा पहले ही से यह इरादा था। अब्बा भी बेहद परेशान थे और यही चाहते कि इन हालात में मैं हिन्दुस्तान में न रुकूँ, यहाँ मुसलमान लड़कियों की इज़्ज़त निश्चित रूप से ख़तरे में हैं। पाकिस्तान अपना इस्लामी देश था, उसकी तो बात ही क्या थी। अब्बा ज़मीन-जायदाद वग़ैरह के कारण अभी देश छोड़कर नहीं जा सकते थे। मेरे दोनों भाई बहुत छोटे-छोटे थे और अम्माजान के स्वर्गवास के बाद अब्बा ने उनको मेरी फूफी के पास हैदराबाद दकन भेज दिया था। मेरा परिणाम निकल चुका था और मैं तीसरी श्रेणी में पास हुई थी। मेरा दिल टूट गया। जब बवलों को ज़ोर कुछ कम हुआ तो मैं हवाई जहाज़ से लाहौर आ गयी। फ़ारुक़ मेरे साथ आया। उसने यह कार्यक्रम बनाया था कि अपने कारोबार की एक ब्रांच पाकिस्तान में स्थापित करके लाहौर उसका हेड ऑफ़िस रखेगा। मुझे उसका मालिक बनाएगा और वहीं मुससे शादी कर लेगा। वह दिल्ली छोड़ नहीं रहा था क्योंकि उसके बाप बड़े उदारवादी विचारों के आदमी थे। योजना यह बनी कि वह हर दूसरे-तीसरे महीने दिल्ली से लाहौर आता रहेगा। लाहौर अफ़रा-तफ़री थी। यद्यपि एक-से-एक अच्छी कोठी अलॉट हो सकती थी लेकिन फ़ारुक़ यहाँ किसी को जानता न था। बहरहाल, सन्तनगर में एक छोटा-सा मकान मेरे नाम अलॉट कराके उसने मुझे वहाँ छोड़ दिया और मेरी देख-भाल, सहायता के लिए अपने एक दूर के रिश्तेदार कुटुम्ब को मेरे पास छोड़ दिया जो शरणार्थी होकर लाहौर आया था और मारे-मारे फिर रहा था।

मैं जीवन के इस अचानक परिवर्तन से इतनी हक्की-बक्की थी कि मेरी समझ में न आता था कि क्या हो गया! कहाँ अविभाज्य भारत की वह भरपूर, दिलचस्प, रंगारंग दुनिया, कहाँ सन् 48 के लाहौर का वह छोटा और अंधेरा मकान! देश त्याग! अल्लाहो-अकबर मैंने कैसे-कैसे दिल हिला देने वाले दिन देखे हैं।

मेरा मस्तिष्क इतना खोखला हो चुका था कि मैंने नौकरी ढूँढने की भी कोई कोशिश नहीं की। रुपये-पैसे की ओर से चिन्ता न थी, क्योंकि फ़ारुक़ मेरे नाम दस हज़ार रुपये जमा करा गया था, सिर्फ़ दस हज़ार, वह स्वयं करोड़ों का आदमी था, लेकिन उस समय मेरी समझ में कुछ न आता था, अब भी नहीं आता।

दिन बीतते गए। मैं सुबह से शाम तक पंलग पर पड़ी फ़ारुक़ की मौसी या नानी, जो कुछ भी हो वे बड़ी थीं, उनके देश-त्याग की आपत्तियों की राम-कहानी और उनकी साबकाए-इमारत के क़िस्से सूना करती और पान-पर-पान खाती या उनकी पढ़नेवाली बेटी को एलजबरा-ज्योमेट्री सिखाया करती। उनका बेटा बराए नाम फ़ारुक़ के कारोबार की देखभाल कर रहा था।

फ़ारुक़ साल में पाँच-छः चक्कर लगा लेता। अब लाहौर का जीवन धीरे-धीरे साधारण होता जा रहा था। उसके आने से मेरे दिन कुछ अच्छी तरह कटते। उसकी मौसी बड़े प्रयत्न से दिल्ली के खाने तैयार करती। मैं माल के हेयर ड्रेसर के यहाँ जाकर अपने बाल सेट करवाती। शाम को हम दोनों जिमख़ाना क्लब चले जाते और वहाँ एक कोने की मेज़ पर बियर के गिलास सामने रखे फ़ारुक़ मुझे दिल्ली की घटनाएँ सुनाता। वह बेथके बोले जाता या कुछ देर के लिए चुप होकर कमरे में आनेवाली अजनबी सूरतों को देखता रहता। उसने शादी की कभी कोई चर्चा नहीं की। मैंने भी उससे नहीं कहा। मैं अब उकता चुकी थी। किसी चीज़ से कोई अन्तर नहीं पड़ता। जब वह दिल्ली चला जाता तो हर पन्द्रहवें दिन मैं अपनी कुशलता का पत्र और उसके कारोबार का हाल लिख भेजती और लिख देती कि इस बार आए तो कनाट प्लेस या चांदनी चौक की अमुक दुकान से अमुक-अमुक प्रकार की साड़ियाँ लेता आए क्योंकि पाकिस्तान में ऐसी साड़ियाँ नापैद हैं।

एक दिन मेरठ से चाचा मियाँ का पत्र आया कि अब्बाजान का स्वर्गवास हो गया।

“जब हमदे मरसल न रहे, कौन रहेगा?”

मैं मनोभावों से परिचित नहीं हूँ, लेकिन अब्बा मुझ पर जान छिड़कते थे। उनकी मृत्यु का मुझे बड़ा दुःख हुआ, सदमा पहुँचा। फ़ारुक़ ने मुझे बड़े प्यार से दिलासा-भरे पत्र लिखे तो तनिक ढाढ़स बन्धी। उसने लिखा, “नमाज़ पढ़ा करो! बहुत बुरा वक़्त है। दुनिया में काली आंधी चल रही है, सरज डेढ़ बलम पर आया चाहता है। एक पल का भरोसा नहीं।”

सारे व्यापारियों की तरह वह भी बड़ा धार्मिक और अन्धविश्वासी था। नियमपूर्वक अजमेर शरीफ़ जाता, निजूमियों, रम्मानों, पण्डितों, सियानों, पीरो, फ़क़ीरों, शकुन-अपशकुनों, स्वप्नों का परिणाम अर्थात प्रत्येक चीज़ में विश्वास करता था। एकाध महीने मैंने नमाज़ भी पढ़ी लेकिन जब मैं सिजदा करती तो जी चाहता कि ज़ोर-ज़ोर से हँसूँ।

देश में साइंस की प्राध्यापिकाओं की बड़ी माँग थी। जब मुझे एक स्थानीय कॉलेजवालों ने बहुत विवश किया तो मैंने पढ़ाना शुरू कर दिया, यद्यपि टीचरी करने से मुझे सख़्त नफ़रत है। कुछ समय बाद मुझे पंजाब के एक पिछड़े जिले के गर्ल्स कॉलेज में बुला लिया गया। कई साल तक मैंने वहाँ काम लिया। मुझसे मेरी शिष्याएँ प्रायः पूछतीं, “हाए अल्लाहे तनवीर आप इतनी प्यारी-सी हैं, आप अपने करोड़पति मंगेतर से शादी क्यों नहीं कर लेतीं?”

इस प्रश्न का स्वयं मेरे पास भी कोई उत्तर नहीं था।

यह नया देश था, नए लोग, नया सामजिक जीवन, यहाँ किसी को मेरे भूतकाल के बारे में पता न था। कोई भी भला आदमी मुझसे शादी करने को तैयार हो सकता था। (लेकिन भले आदमी, सुन्दर सीधे-सादे सभ्य लोग मुझे पसन्द ही नहीं आते थे, मैं क्या करती!) दिल्ली के क़िस्से दिल्ली ही में रह गए और फिर मैंने यह देखा है कि एक-से-एक हर्राफ़ा लड़कियाँ अब ऐसी सदाचारिणी बनी हुई हैं कि देखा ही कीजिए। स्वयं एट्थ हरीराम और रानीख़ान के उदाहरण मेरे सामने थे।

अब फ़ारुक़ भी कभी-कभी आता। हम लोग इस तरह मिलते जैसे बीसियों साल के पुराने विवाहित पति-पत्नी हैं जिनके पास सब-के-सब नए विषय ख़त्म हो चुके हैं और अब शान्ति, विश्राम और ठहराव का समय है। फ़ारुक़ की बेटी की अभी हाल ही में दिल्ली में शादी हुई है। उसका पति ऑक्सफ़ोर्ड जा चुका है। पत्नी को स्थायी रूप से दमा रहता है। फ़ारुक़ ने अपने व्यवसाय की शाखाएँ बाहर कई देशों में फैला दी हैं। नैनीताल में नया मकान बनवा रहा है। फ़ारुक़ अपने ख़ानदान के क़िस्से, व्यवसाय की बातें मुझे विस्तार से सुनाया करता और मैं उसके लिए पान बनाती रहती।

एक बार मैं छुट्टियों में कॉलेज से लाहौर गयी तो फ़ारुक़ के पुराने दोस्त सैयद वकार हुसैन ख़ाँ से मेरी भेंट हुई। लम्बा क़द, मोटे-ताज़े, काले तवे जैसा रंग, उम्र में पैंतालीस के लगभग अच्छे-ख़ासे देव-पुत्र मालूम होते। उनको पहली बार मैंने नई दिल्ली में देखा था। जहाँ उनका डांसिंग स्कूल था। ये रामपुर के एक शरीफ़ घराने के इकलौते बेटे थे, बचपन में घर से भाग गए। सरकसवालों और थियेटर कम्पनियों के साथ देश-विदेश घूमे—सिंगापुर, हाँगकाँग, शंघाई, लन्दन जाने कहाँ-कहाँ। अनगिनत जातियों और नस्लों की स्त्रियों से शादियाँ रचायीं। उनकी वर्तमान पत्नी उड़ीसा के एक मारवाड़ी महाजन की लड़की थी जिसको ये कलकत्ता से उड़ा लाए थे। बारह-पन्द्रह साल पहले मैंने उसे दिल्ली में देखा था। साँवली-साँवली-सी मँझले क़द की लड़की थी। उसकी शक्ल पर अजीब तरह का दर्द बरसता, मगर सुना था कि बड़ी पतिव्रता स्त्री थी। पति के दुर्व्यवहार से तंग आकर इधर-उधर भाग जाती लेकिन कुछ दिन बाद फिर वापस आ जाती। ख़ाँ साहब ने कनॉट सरकस की एक बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल में अंग्रेज़ी नाच सिखाने का स्कूल खोल रखा था, जिसमें वे, उनकी पत्नी, दो एंगलोइण्डियन लड़कियाँ स्टाफ़ में शामिल थीं। महायुद्ध के दिनों में स्कूल पर धन बरसा। हर इतवार की सुबह वहाँ गयी थी। सुना था कि वकार साहब की पत्नी महासती अनुसूइया का अवतार है कि उनके पति आज्ञा देते हैं कि अमुक-अमुक लड़की से बहनापा गाँठों और उसे मुझसे मिलाने के लिए ले आओ और वह नेक-बख़्त ऐसा ही करती। एक बार वह हमारे होस्टल भी आयी और कुछ लड़कियों के सिर हुई कि वह उसके साथ चलकर बारहखम्बा रोड पर चाय पिएँ।

भारत-विभाजन के बाद वकार साहब, उनके कथनानुसार, लुट-लुटाकर लाहौर आ पहुँचे थे और माल रोड के पीछे एक फ़्लैट अलॉट कराके उसमें अपना स्कूल खोल लिया था। शुरू-शुरू में तो कारोबार मन्दा रहा। दिलों पर मुर्दनी छायी हुई थी, नाचने-गाने का किसे होश था। इस फ़्लैट में भारत-विभाजन से पूर्व आर्यसमाजी हिन्दुओं का संगीत-विद्यालय था। लकड़ी के फ़र्श का हॉल, बंगले में दो छोटे-छोटे कमरे, ग़ुस्लख़ाना, रसोईघर। सामने लकड़ी की बॉलकनी और टूटा-फूटा हिलता हुआ जीना। ‘भारत माता संगीत विद्यालय’ का बोर्ड बॉलकनी के जंगले पर अब तक टेढ़ा लटका हुआ था। उसे उतारकर ‘वकारंज स्कूल ऑफ़ बॉलरूम एण्ड टैप डांर्सिंग’ का बोर्ड लगा दिया गया। अमरीकन फ़िल्मी पत्रिकाओं में से काटकर जेन केली, फ़रीदा स्टीयर, फ़्रेंक सीनट्रा, दोर्सडे आदि के रंगीन चित्र हॉल की पुरानी और कमज़ोर दीवारों पर लगा दी गयी और स्कूल चालू हो गया। रिकार्डों का छोटा-सा पुलन्दा ख़ाँ साहब दिल्ली से साथ लेते आए थे। ग्रामोफ़ोन और सेकण्डहैण्ड फर्नीचर फ़ारुक़ से रुपया क़र्ज़ लेकर उन्होंने यहाँ ख़रीद लिया। कॉलेज के मनचले नौजवान और नई अमीर बनी सोसाइटी की नई फ़ैशनेबल बेंगमों को ख़ुदा सलामत रखे, दो-तीन साल में उनका कारोबार ख़ूब चमक गया।

फ़ारुक़ की मित्रता के कारण मेरा और उनका सम्बन्ध कुछ भाभी और जेठ का-सा हो गया। वे प्रायः मेरी कुशल-क्षेम पूछने आ जाते। उनकी पत्नी घण्टों पकाने-रांधने, सीने-पिरोने की बातें किया करतीं। बेचारी मुझसे बिलकुल देवरानी जैसा स्नेह का व्यवहार करतीं। ये पति-पत्नी निःसन्तान थे, बड़ा उदास, बेरंग, बेतुका-सा बेलगाव जोड़ा था। ऐसे लोग भी दुनिया में मौजूद हैं।

कॉलेज में नई अमरीकी प्लेटनिक चढ़ी। प्रिंसिपल से मेरा झगड़ा हो गया। अगर वह सेर तो मैं सवा सेर। मैं स्वयं कौन अब्दुल हुसैन तानाशाह से कम थी। मैंने इस्तीफ़ा कॉलेज कमेटी के सिर पर मारा और फिर सन्तनगर लाहौर वापस आ गयी। मैं पढ़ाते-पढ़ाते उकता चुकी थी। मैं वज़ीफ़ा लेकर पी.एच.डी. के लिए बाहर जा सकती थी लेकिन इस इरादे को भी कल पर टालती रही। कल अमरीकनों के दफ़्तर जाऊँगी जहाँ वे वज़ीफ़े बाँटते हैं, कल ब्रिटिश काउन्सिल जाऊँगी, कल शिक्षा-मन्त्रालय में स्कॉलरशिप का प्रार्थनापत्र भेजूँगी।

अधिकतर समय बीत गया, क्या करूँगी? कहीं बाहर जाकर कौन-से गढ़ जीत लूँगी? मुझे जाने किस वस्तु की प्रतीक्षा थी, मुझे पता नहीं। इसी बीच एक दिन वकार भाई मेरे पास बड़े निराश होकर आए और कहने लगे, “तुम्हारी भाभी के दिमाग़ में फिर कीड़ा उठा। वह वीसा बनवाकर हिन्दुस्तान चली गयी और अब कभी नहीं आएगी।”

“वह कैसे…?” मैंने तनिक लापरवाही से पूछा और उनके लिए चाय का पानी स्टोव पर रख दिया।

“बात यह हुई कि मैंने उन्हें तलाक़ दे दिया। उनकी ज़ुबान बहुत बढ़ गयी थी। हर समय टर्र-टर्र-टर्र-टर्र…” फिर उन्होंने सामने बिछे पलंग पर बैठकर शुद्ध पतियों वाले ढंग से अपनी पत्नी के विरुद्ध शिकायतों का दफ़्तर खोल दिया औैर स्वयं को निरपराध करने की कोशिश में व्यस्त रहे।

मैं बेपरवाही से वह सारी कथा सुनती रही। ज़िन्दगी की हर बात एकदम बेरंग, महत्त्वहीन, अनावश्यक और निरर्थक थी।

कुछ समय बाद वे मेरे यहाँ आकर बड़बड़ाए, “नौकरों ने नाक में दम कर रखा है। तुमसे कभी इतना भी नहीं होता कि आकर तनिक भाई के घर की दशा ही ठीक कर जाओ, नौकरों के कान उमेठो! मैं स्कूल भी चलाऊँ और घर भी!”

उन्होंने इस ढंग से शिकायत-भरे स्वर में कहा जैसे उनके घर का प्रबन्ध करना मेरा कर्तव्य है।

कुछ दिनों बाद मैं अपना सामान बांधकर वकार साहब के कमरों में जा पहुँची और नृत्य सिखाने के लिए उनकी असिस्टेंट भी बन गयी।

इसके महीने-भर बाद पिछले रविवार को वकार साहब ने एक मौलवी बुलाकर अपने दो चिरकिटों की गवाही में मुझसे निकाह पढ़वा लिया।

अब मैं दिन-भर काम-काज में व्यस्त रहती हूँ। मेरा रूप-सौन्दर्य भूतकाल की राम-कहानियों में शामिल हो चुका है। मुझे शोर-शराबे, पार्टियाँ, हंगामे बिलकुल पसन्द नहीं लेकिन घर में हर समय चा-चा किल्लियों और रॉक का शोर मचा रहता है। बहरहाल, यही मेरा घर है।

मेरे पास इस समय कई कॉलेजों में कैमिस्ट्री पढ़ाने के ऑफ़र हैं मगर भला कहीं पारिवारिक धन्धों से फ़ुरसत मिलती है? नौकरों का यह हाल है कि आज रखो, कल ग़ायब। मैंने अधिक की अभिलाषा कभी नहीं की, केवल इतना चाहा कि एक औसत दरजे की कोठी हो और सवारी के लिए मोटर ताकि आराम से आ-जा सकें। समान स्तरवाले लोगों में लज्जित न होना पड़े। चार मिलनेवाले आएँ तो बिठाने के लिए ठीक-सी जगह हो, बस!

इस समय हमारी डेढ़-दो हज़ार रुपये की आय है जो पति-पत्नी के लिए ज़रूरत से ज़्यादा है। आदमी अपने भाग्य से सन्तुष्ट हो जाए तो सारे-के-सारे दुःख मिट जाते हैं।

शादी हो जाने के बाद लड़की के सिर पर छत-सी पड़ जाती है। आज-कल की लड़कियाँ जाने किस रौ में बह रही हैं, किस तरह ये हाथों से निकल जाती हैं। जितना सोचो, अजीब-सा लगता है, और आश्चर्य होता है।

मैंने तो कभी किसी से बनावटी प्यार तक नहीं किया। ख़ुशवक़्त, फ़ारुक़ और इस पचास वर्षीय कुरूप और भौंडे आदमी के अतिरिक्त, जो मेरा पति है, मैं किसी चौथे आदमी से परिचित तक नहीं। मैं शायद बदमाश तो नहीं थी। न जाने मैं क्या थी और क्या हूँ। रेहाना, सईदा, प्रभा और यह लड़की जिसकी आँखों में मुझे देखकर डर पैदा हुआ, शायद वे मुझसे अधिक अच्छी तरह मुझसे परिचित हों!

अब ख़ुशवक़्त को याद करने से फ़ायदा? समय बीत चुका। जाने कब तक वह ब्रिगेडियर मेजर जनरल हो चुका हो। आराम की सीमा पर चीनियों के विरुद्ध मोर्चा लगाए बैठा हो या हिन्दुस्तान की किसी हरी-भरी सुन्दर छावनी के मैस में बैठा मूँछों पर ताव दे रहा हो और मुस्कराता हो। शायद वह कब कश्मीर मोर्चे पर मारा जा चुका हो! क्या मालूम। अंधेरी रातों में मैं चुपचाप आँखें खोल पड़ी रहती हूँ! विज्ञान ने हमें वर्तमान युग के बहुत-से रहस्यों से परिचित करा दिया है। मैंने कैमिस्ट्री पर अनगिनत किताबें पढ़ी हैं, पहरों सोचा है। पर मुझे बड़ा डर लगता है।

ख़ुशवक़्त सिंह! ख़ुशवक़्तसिंह, तुम्हें अब मुझसे मतलब?

क़ुर्रतुलऐन हैदर की कहानी 'फ़ोटोग्राफ़र'

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क़ुर्रतुलऐन हैदर
ऐनी आपा के नाम से जानी जानी वाली क़ुर्रतुल ऐन हैदर (२० जनवरी १९२७ - २१ अगस्त २००७) प्रसिद्ध उपन्यासकार और लेखिका थीं। १९५९ में उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास आग का दरिया प्रकाशित जिसे आज़ादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे बड़ा उपन्यास माना गया था जिसमें उन्होंने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर १९४७ तक की भारतीय समाज की सांस्कृतिक और दार्शनिक बुनियादों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया था।