चिताओं की पंक्तियाँ
सवालों की पंक्तियों से अलग हो गईं
एक तरफ हाँफते रहे सवाल
कि क्यों उठी चिताएँ
चिताओं ने गर्दन घुमाकर देखा भी नहीं
उन्हें पता था
चिताओं और ‘चिंताओं’ के सवालों में
वही अन्तर होता है
जो हस्तिनापुर की राजसभा में
कृष्ण के सवाल और दुर्योधन के उत्तर में था
तुम्हारी ‘देशभक्ति’
चिताओं की सबसे उर्वर ज़मीन है
गेंहू के एक पौधे की तरह चिताओं से
चिताओं की बालियाँ जमाती
सम्वेदनाएँ अपवाद होने की ओर हैं
और वेदनाएँ उपनिवेश
राष्ट्रवाद की किलेबंदी से महफूज़
साम्राज्यवादी ध्वजों के नीचे
या तो केवल चिताएँ हैं या फिर भावी चिताएँ
तो चलो न!
हम सभी अपनी-अपनी नागरिकताएँ
वापस कर दें हर उन नगरों को
जहाँ चिताएँ राजा के कर के रूप में
घासों की तरह उगती हैं!

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