Tag: Religion in Politics

God, Abstract Human

विस्थापित ईश्वर

जो घटना समझ नहीं आयी, उसे हमने ईश्वर माना और उनसे ईश्वर रचे जो समझ के अधीन हुईं। उसने वर्षा, हवा, पेड़ों में शक्ल पायी, और सीधे सम्बन्ध...
Common Man

अम्बिकेश कुमार की कविताएँ

Poems: Ambikesh Kumar विकल्प उसने खाना माँगा उसे थमा दिया गया मानवविकास सूचकाँक उसने छत माँगी हज़ारों चुप्पियों के बाद उसे दिया गया एक पूरा लम्बा भाषण उसने वस्त्र माँगा मेहनताना उसे...
Civilization, Updesh, Play, Culture, King, War, Warrior

सभ्यता के वस्त्र चिथड़े हो गए हैं

कुछ अंह का गान गाते रह गए। कुछ सहमते औ' लजाते रह गए। सभ्यता के वस्त्र चिथड़े हो गए हैं, हम प्रतीकों को बचाते रह गए। वेद मंत्रों...

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Recent Posts

Faiz Ahmad Faiz

इस वक़्त तो यूँ लगता है

इस वक़्त तो यूँ लगता है, अब कुछ भी नहीं है महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन और...
Bheedtantra - Asghar Wajahat

‘भीड़तंत्र’ से दो लघु कहानियाँ

राजपाल एण्ड सन्ज़ से प्रकाशित असग़र वजाहत की किताब 'भीड़तंत्र' से साभार स्वार्थ का फाटक —“हिंसा का रास्ता कहाँ से शुरू होता है?” —“जहाँ से बातचीत का...
Pratibha Sharma

लाल रिबन

मेरे गाँव में सफ़ेद संगमरमर से बनी दीवारें लोहे के भालों की तरह उगी हुई हैं जिनकी नुकीली नोकों में नीला ज़हर रंगा हुआ है खेजड़ी के ईंट-चूने...
Subhadra Kumari Chauhan

यह कदम्ब का पेड़

यह कदम्ब का पेड़ | Yah Kadamb Ka Ped यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे। मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥ ले...
Sleepless, Person sitting

यह स्त्री सोयी नहीं है

बहुत अर्से से यह स्त्री सोयी नहीं है उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे इसका प्रमाण हैं समस्त सृष्टि को अपने आग़ोश में लेकर उसे विश्राम दिलाने का दावा करती रात्रि का...
Trilochan

तुम्हें जब मैंने देखा

पहले पहल तुम्हें जब मैंने देखा सोचा था इससे पहले ही सबसे पहले क्यों न तुम्हीं को देखा! अब तक दृष्टि खोजती क्या थी, कौन रूप, क्या रंग देखने को उड़ती थी ज्योति-पंख...
Amir Khusrow

अमीर ख़ुसरो के दोहे

अमीर ख़ुसरो के दोहे | Amir Khusro Ke Dohe ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग॥ ख़ुसरो...
Meena Keshwar Kamal

मैं कभी पीछे नहीं लौटूँगी

मैं वह औरत हूँ जो जाग उठी है अपने भस्‍म कर दिए गए बच्‍चों की राख से मैं उठ खड़ी हुई हूँ और बन गयी हूँ एक...
Dinkar

अवकाश वाली सभ्यता

मैं रात के अँधेरे में सितारों की ओर देखता हूँ जिनकी रोशनी भविष्य की ओर जाती है अनागत से मुझे यह ख़बर आती है कि चाहे लाख बदल...
Madan Daga

रेखांकित हक़ीक़त

किसने कह दिया तुम्हें कि मैं कविता लिखता हूँ मैं कविता नहीं लिखता मैंने तो सिर्फ़ जन-मन के दर्द के नीचे एक रेखा खींच दी है हाँ, दर्द के नीचे फ़क़त...
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