तुम्हारे शहर आया था मैं बरसों बाद फिर से,
तुम्हारे हाँ तुम्हारे शहर बरसों बाद फिर से।
उसे अपना भी कह सकता हूँ शायद
गुज़ारा है वहाँ पर एक अरसा,
वो सबसे खूबसूरत ज़िन्दगी का एक अरसा
वो सबसे खूबसूरत इसलिए था,
वो अपने साथ में तुमको लिए था।
मगर छोड़ो ये बातें, हाँ कहाँ था मैं,
तुम्हारे हाँ तुम्हारे शहर बरसों बाद फिर से।

ज़रूरी काम का एक सिलसिला था,
कुछ पुराने दोस्तों से भी मिला था
पुराने दोस्त, कितने भी पुराने हों,
पुराने से नहीं लगते।
वो केवल दोस्त होते हैं, वो केवल दोस्त लगते हैं
मगर थे तो पुराने ही पुरानी बात छिड़नी थी,
पुरानी बात हो और फिर तुम्हारी बात ना आए,
ये नामुमकिन सा लगता है,
ये मुमकिन ही नहीं शायद!
पुरानी याद के पन्ने पलटते जा रहे थे,
हम अपने कल से जाकर के लिपटते जा रहे थे।
मगर छोड़ो ये बातें, हाँ कहाँ था मैं,
तुम्हारे हाँ तुम्हारे शहर बरसों बाद फिर से।

शहर के उन पुराने रास्तों से भी मैं गुज़रा था,
कुछ एक पल के लिए जाकर के उस पुल पर भी ठहरा था,
खड़े होकर जहाँ पर मैं तुम्हारी राह तकता था
वो सारी तंग गालियां हम जहाँ पर साथ चलते थे
वो चौराहे जहाँ राहों के संग संग हम भी मिलते थे,
किनारा झील का हम तुम जहां पर साथ बैठे थे
वो सब मंजर न जाने कितनी यादों को समेटे थे।
सभी कुछ था वो पहले सा, तुम्हारी ही कमी थी बस
तुम्हारी याद दिल में और आंखों में नमी थी बस।
मगर छोड़ो ये बातें, हाँ कहाँ था मैं,
तुम्हारे हाँ तुम्हारे शहर बरसों बाद फिर से।

तुम्हारे शहर आया था मगर अब लौट आया हूँ
शहर से लौट कर आना बहुत आसान है लेकिन
जो यादों का शहर दिल में बसा रक्खा है तुमने
मैं उसको छोड़ कर जा ही नहीं सकता कहीं भी
वो मेरे दिल में है अब भी, मैं अब भी उस शहर में हूँ।
मगर छोड़ो ये बातें, हाँ कहाँ था मैं,
तुम्हारे हाँ तुम्हारे शहर बरसों बाद फिर से।

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भास्कर शुक्ला
Full time Researcher, Part time Poet

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