उस दिन मैंने दवा रखने वाली
छोटी-छोटी रंगीन डिब्बियों में
एक-एक कर सुबह-दोपहर-शाम के हिसाब से
सोमवार से लेकर रविवार तक
ज़िन्दा बने रहने की हिकमत को क़रीने से सजाया
फिर छत की ओर तेज़ी से घूमते पंखे की ओर देखा
सोचा- चलो जिन्दगी में रची बसी अराजकता ज़रा कम हुई

बहुत सोचने के बाद याद आया
जिन्हें मैं डिब्बियों के नाम से याद कर रहा
यह तो ऑर्गेनाइजर है
वक़्त कितना बदल गया कि
पापा, हैप्पी बर्थडे… कहता बेटा
उपहार में ग्लूकोमीटर या ऐसा ही कोई सामान देता
एक न एक दिन लगभग तसदीक़ कर देता है कि
दवाएँ रासायनिक दया हैं
किन्हीं भी दुआओं से अधिक विश्वसनीय

उस दिन
टाइम मशीन में बैठकर
बीते हुए समय में वापस लौट जाने की गाथा का
दुखांत पटाक्षेप हुआ मानो
विज्ञान ने अपनी तार्किकता से
छोटी-छोटी भावुक आत्मीयता से भरी
मरियल आस छीन ही ली जैसे
इसके बाद बताया कि
जीवन के निविड़ अंधकार में
किसी क़िस्म की उम्मीद बाँधने से नहीं
बिना सीली हुई माचिस में रखी
शुष्क तीली की सम्यक रगड़ से काम चलता है

उस दिन के बाद
दवाओं को खाने का वक़्त सदा याद रहा
पर मैं भुलाने लगा
स्मृति के गोपन कोनों में सहेजकर रखे
दैहिक उन्माद के प्रेमिल लम्हे
अपनत्व भरे कालातीत पल
और उत्तेजनापूर्ण यथार्थ का गल्प

उस दिन यकायक जाने क्या हुआ
मेरे भीतर का कापुरुष विजयी भाव के साथ
मेरी लापरवाह निजता को
बेदर्दी से रौंदता हुआ
चला गया समय के परली पार…

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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