“ये क्या, आज भी तुमने रात के खाने में एक ही सब्ज़ी बनायी! क्या हो गया है तुम्हें!”

“देखो, जो बन जा रहा है, वही खा लो। खाना बनाने वाली की माँ बीमार है और वह गाँव गई है। शायद महीने भी लग सकते हैं और फिर काम से आने के बाद एक ही सब्ज़ी बन जाती है, तो काफ़ी है।” एक लम्बा भाषण देते हुए सुनयना ने कहा।

“ठीक है, पर तुम कुछ दिन के लिए किसी नयी खाना बनाने वाली को क्यों नहीं रख लेतीं?”, मैंने कहा।

“नयी खाना बनाने वाली यानी कि एक नयी मुसीबत। फिर से नमक-मिर्च का अन्दाज़, टेस्ट, सब नये सिरे से सिखाओ।” सुनयना ने सब्ज़ी परोसते हुए कहा।

“ख़ैर, मैंने तो यूँ ही कहा, पर रख लोगी तो तुम्हें ही आराम मिलेगा”, मैंने थाली सरकाते हुए कहा।

“ठीक है, मिलेगी कोई तो देखूँगी।” सुनयना ने डाइनिंग टेबिल से उठते हुए कहा।

“अरे वाह, आज तो दो-दो सब्ज़ियाँ और साथ में चटनी भी। वाह, क्या बात है, मज़ा आ गया।” दस्तरख़ान सजा देख, मैंने सुनयना से कहा।

“हाँ, एक खाना बनाने वाली महाराजिन मिल गई है, उसी ने बनाया है।” सुनयना थाली लगाते हुए बोली।

“हाँ, खाना खाने में भी ठीक है, बस रोटी ही ज़रा मोटी बनी है”, मैंने कौर चबाते हुए कहा।

“खाना ठीक ही बना लेती है, ज़्यादा बताना भी नहीं पड़ा। ग़रीब घर की मालूम पड़ती है। कपड़े तो साफ़ पहने थी, पर कई जगह से सिले हुए।”, सुनयना बोली।

“ठीक है, अगर ऐसी बात है तो उसे सौ-पचास रुपये ज़्यादा ही दे देना।”

“नहीं-नहीं, मुझे उसका दिमाग़ नहीं ख़राब करना। बहुत हुआ, तो एकाध पुरानी साड़ी दे दूँगी उसे।”, सुनयना ने खीर परोसते हुए जवाब दिया।

“ये खीर, ये तुमने बनायी है?”

“नहीं, ये भी उसी ने बनायी है।” सुनयना ने कहा।

“अच्छा है, पहले वाली तो रोटी-सब्ज़ी ही बना दे, तो काफ़ी था।”, मैंने एक सन्तुष्टि भरी डकार लेते हुए कहा।

“महाराजिन, तुम ज़रा रोटियाँ पतली-पतली सेंकना और सब्ज़ी भी ज़्यादा नहीं हो और कम भी नहीं पड़े, ध्यान रखना।” अगले दिन ही सुबह सुनयना खाना बनाने वाली को हिदायत दे रही थी।

खाना बनाने वाली दुबली-पतली परन्तु स्वाभिमानी-सी लगी मुझे। खाना बनाना और उसे सलीक़े से रखना देख, ऐसा लगता था कि शायद खाना बनाना उसका पेशा न हो। आए दिन जो भी नयी हिदायत सुनयना उसे देती, वह उसे चुपचाप बिना बहस के सुन लेती।

सुनयना उससे एक दिन कह रही थी, “देखो, हमें बासी खाना खाने की आदत नहीं है, इसलिए जो भी सब्ज़ी-रोटी बच जाए, उसे फेंकने के बजाए गाय को दे दिया करो। परन्तु ध्यान रहे, खाना ज़्यादा नहीं बने तो, कम भी नहीं पड़े।”

उसने सुनयना की इस हिदायत को उसी ध्यान से सुना। प्रायः सब्ज़ी-रोटी बच ही जाती थी क्योंकि मैं और सुनयना अक्सर ही बिना किसी प्रोग्राम के किसी दोस्त के यहाँ या होटल में रात का खाना खा आते थे और खाना बच जाता था, जिसे महाराजिन गाय को डाल आती थी।

एक छुट्टी के दिन सुनयना बाज़ार गई हुई थी। महाराजिन ने आकर पूछा, “साहब खाने में आज क्या बनेगा।”

मैंने कहा कुछ भी बना लो और वह फ़्रिज से सब्ज़ियाँ निकालने लगी। उसे खाना अच्छा बनाना आता था। मेरी इच्छा हुई कि उससे बात करूँ, इसी ग़रज़ से मैंने उसका नाम पूछा।

‘महाराजिन’, उसका संक्षिप्त सा उत्तर था।

“अरे तुम्हारा ये नाम नहीं, तुम्हारा अपना नाम पूछ रहा हूँ।”

“जी, गीता!” उसने थोड़ी चुप्पी के बाद कहा।

“घर में कौन-कौन है”, मैंने फिर पूछा।

“दो छोटे बच्चे, एक पढ़ता है, पति क्लर्क हैं, बीमार हैं और फिलहाल बेकार हैं क्योंकि फ़ेक्ट्री बन्द हो गई है।” उसने लगभग एक ही साँस में सब कह डाला। शायद उसे मेरे सम्भावित प्रश्नों का ज्ञान हो।

उसके सलीक़ेदार व्यवहार से मुझे यह तो भान था कि वह वक़्त की मारी है और खाना बनाना उसका पेशा नहीं है। मेरे जिज्ञासु मन ने फिर एक सवाल कर ही दिया, “घर कैसे चलाती हो।”

“जी, बस एक-दो घर में खाना बनाने का काम करती हूँ।” उसका जवाब था।

“अच्छा तुम अपने घर का खाना कब बनाती हो?”, मैंने फिर पूछा।

“यहाँ से जाने के बाद देर रात में।”

“तब तक तो बच्चे भूखे ही सो जाते होंगे!”, मैंने फिर सवाल किया।

“हाँ, अक्सर उन्हें भूखे ही सोना पड़ता है।”, उसके जबाब में दर्द और तल्ख़ी झलक आयी थी।

“खाना तो तुम बढ़िया बनाती हो, क्या अपने बच्चों के लिए भी…?”

सवाल पूछने के बाद मुझे लगा कि क्या बेतुका, बेमानी-सा सवाल पूछ लिया। वह एक पल के लिए झिझकी और गहरी साँस के साथ उसने कहा, “हाँ!” जैसे कि वह इस सवाल का जवाब नहीं देना चाहती हो। परन्तु उसने लगभग स्वगत बात करते हुए आगे कहा कि “हाँ, उनके लिए भी। उन्हें खाना खिलाने के समय मटर-पनीर, रायते आदि की कहानी सुनाती रहती हूँ। मेरे बच्चे चावल और उसकी माड़ में नमक-मिर्च डालकर, इन कहानियों के स्वाद के साथ खा लेते हैं।” उसने अपने पल्लू से आँखों की कोर से ढलकने वाले आँसुओं को गिरने से पहले ही पोंछा और तेज़ी से रसोई में चली गई।

तभी सुनयना भी बाज़ार से लम्बी-चौड़ी ख़रीदारी करके वापस आ गई। मैंने सुनयना से कहा कि कल से जो भी सब्ज़ी-रोटी बच जाए, उसे गाय को देने के बजाय टिफ़िन में महाराजिन को दे दिया करो। उसके काम आ जाएगी।

सुनयना ने मुझे घूरा और कोई जवाब न देते हुए अन्दर चली गई।

अगले दिन ही सुनयना महाराजिन से कह रही थी कि “देखो, सब्ज़ी-रोटी हिसाब से बनाना, ज़रा भी बचनी नहीं चाहिए, तुम्हें मालूम है कि कितना मँहगा सामान आता है। यूँ ही गाय को फेंकने या देने के लिए नहीं।”

सुनयना कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से कह रही थी, शायद मुझे ही सुनाने के लिए।