‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा

मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है

साँस खींचती हूँ
तो खिंची चली आती है
कई टूटे तारों की राख
जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ
साँस छोड़ती हूँ
तो बढ़ने लगता है
धरती का तापमान

तुम तो सूरज ही थे
तुम्हारे तेज से जीवित थे
सब पौधे, कीट, पशु व इंसान
मेरे शरीर को मगर
जकड़ लिया कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन ने

तुम्हारा हर लाल शब्द
जो कल तक मुझे छूकर
लौट जाता था
अपने स्त्रोत पर
अब सोख लिया जाता है
तुम जो प्रेम की वर्षा भी करते हो
तो ये संगेमरमर की बांहें काली हुई जाती हैं

कल लोग मुझे देखकर
आँखें फेर लें
या मेरा जलता बदन
लहू में सुनामी उठा दे
और फूट पड़ें सब शिराएँ, सब धमनियाँ
तो तुम खुद को दोष मत देना
तुम तो सूरज ही हो
यह तो मैं ही थी
जो ली महत्वकांक्षाओं की कुल्हाड़ी
और भावनाओं को काटती गयी

हमारे बीच की गर्माहट
कब ग्लोबल वॉर्मिंग हो गयी
पता ही नहीं चला…

■■■

(यह नज़्म/कविता हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)


Special Facts:

Related Info:

Link to buy the book:

© 2018 पोषम पा ALL RIGHTS RESERVED | ABOUT | CONTACT | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE

Don`t copy text!