मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है

साँस खींचती हूँ
तो खिंची चली आती है
कई टूटे तारों की राख
ना जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ
साँस छोड़ती हूँ
तो बढ़ने लगता है
धरती का तापमान

तुम तो सूरज ही थे
तुम्हारे तेज से जीवित थे
सब पौधे, कीट, पशु व इंसान
मेरी देह को मगर
जकड़ लिया कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन ने

तुम्हारा हर लाल शब्द
जो कल तक मुझे छूकर
वापस लौट जाता था
अपने स्त्रोत पर
अब सोख लिया जाता है
तुम जो प्रेम की वर्षा भी करते हो मुझपर
वह मेरी देह के संगमरमर को काला करने लगी है

कल लोग मुझे देखकर
आँखें फेर लें
या मेरा जलता बदन
लहू में सुनामी उठा दे
और फूट पड़ें सब शिराएँ, सब धमनियाँ
तो तुम खुद को दोष मत देना
तुम तो सूरज ही हो
यह तो मैं ही थी
जो महत्वकांक्षाओं की कुल्हाड़ी से
भावनाओं को काटती गयी

हमारे बीच की गर्माहट
कब ग्लोबल वॉर्मिंग हो गयी
पता ही नहीं चला…

 

चित्र श्रेय: Redd Angelo


Shiva

अपने बारे में बताने को कुछ आकर्षक सा हो, इसका तो अभी इंतज़ार ही है।
एक परंपरागत भारतीय लड़की की छवि से ज़्यादा दूर नहीं हूँ। समाज की अनेक बातों से बेचैन, खुद को लेकर बहुत असुरक्षित, दिन में सपने देखती और रात में घर की छत को तकती रहती एक आम लड़की। हर तरह की किताबों से बहुत प्यार करती हूँ, तरह तरह से उन्हें अलमारी में सजाया करती हूँ, और एक ‘विश’ माँगने को बोला जाए तो यही चाहूँगी की हज़ारों किताबों का निचोड़ दिमाग़ में समा जाए।
अपनी असुरक्षाओं से लड़ने के लिए कुछ कुछ लिख लेती हूँ, और लोगों की सच्ची-झूठी तारीफों में सुकून पा लेती हूँ।
लिखने- पढ़ने के अलावा संगीत एक और ऐसी चीज़ है जो मैं कस के अपने पास रखे रहना चाहती हूँ।

8 Comments

  • Kabir Malik · September 23, 2016 at 7:59 am

    बहुत सुंदर। बहुत खूबी से आपने इस कविता का निष्कर्ष निकाला है।

      Shiva · September 20, 2017 at 1:09 pm

      शुक्रिया कबीर । आपका कमेंट एक वेलिडेशन की तरह है ।

  • Prasu Jain · September 24, 2016 at 6:46 am

    Very well written Shiva.

      Shiva · September 20, 2017 at 1:10 pm

      Thank you so much Prasu! Glad you liked it. 🙂

  • Deepika Sharma · September 4, 2017 at 2:56 am

    वाह! बहुत ही ख़ूबसूरत। दिल को छु गयीं ये रचना। Well Done.

      Shiva · September 20, 2017 at 1:10 pm

      Thanks Deepika di. Love!

  • G. Aureen · October 6, 2017 at 4:14 pm

    Climate change ko saalo se padh rahi hun. Magar is tarah pahli baar padha hai. Un logon ko sunane ka man kar raha hai jo rishto aur dharti, dono hi ka mulya samajh nahin paate. Is se zyada khubsurat kisi tragedy ka description possible hi nahin hai Shiva.

    You are an inspiration 🙂

      Shiva · October 9, 2017 at 11:40 pm

      Hey Ghaniya! So happy that you understood and liked it 🙂 Will try not disappointing you in future too!

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