नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा

मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है साँस खींचती हूँ तो खिंची चली आती है कई टूटे तारों की राख ना जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ साँस छोड़ती हूँ तो बढ़ने लगता Read more…

By Shiva, ago
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लप्रेक – चित्रलेखा

“मैंने एक अनुभव किया है- जब भी मैं अलगाव की कोई भी बात पढ़ती हूँ तो उद्विग्न हो जाती हूँ। उस व्यक्ति से घृणा होने लगती है जिसने अलग होने की भूमि तैयार की है Read more…

By Shiva, ago
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कविता: ‘राधा-कृष्ण’ – शिवा & पुनीत कुसुम

Puneet- हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे कान्हा ढूँढ रहा तुझे राधे ऊपर नभ् को खोल खोल कर धरती के भीतर टटोल कर स्वर्ग, नरक और पातालों में जीव-मरण Read more…

By Shiva, ago
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लप्रेक – चाय-अदरक

“चार महीने जिम जाकर ये अदरक जैसी बॉडी बनायी तुमने?” “तुम चाय जैसी क्यों होती जा रही हो?” “चाय जैसी? मतलब? देखो  रेसिस्ट कॉमेंट किया तो अभी ब्रेक-अप हो जाएगा” “अरे बाबा! मतलब हर वक़्त तुम्हारी तलब Read more…

By Shiva, ago
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कविता: एक्सट्रा चीज़! – शिवा & पुनीत कुसुम

Shiva- कभी आँखों से लिख दो कुछ मेरी आखों पर कि हया की हर झुकी नज़र का गुनेहगार तुम्हारा ज़िक्र हो और दुआ में उठी पलकें वहां ऊपर भी तुम्हें ही पायें Puneet- तुम आँखों Read more…

By Shiva, ago

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