“सुनो।”

“हाँ।”

“अगर मेरे लिए कोई मन्दिर बनाकर उसमें मेरी मूर्ति रखे, तो मुझे तो बहुत अच्छा लगे।”

“पर ऐसे पूजने वाले ज्यादा हो जायेंगे और प्यार करने वाले कम।”

“प्यार करने वाले चाहिए भी कितने, कोई एक ही हो बस।”

“कुछ कहलवाना चाहती हो?”

“हाँ, आज तो दिन भी है, हाँ तो तुम कुछ कह रहे थे..”

“छोड़ो ना, मन की बात है, मन ही में रहने दो। चलो.. मोमोज़ खिलाता हूँ तुम्हें।”


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

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