‘पेट की खातिर’ – विजय ‘गुंजन’

उन दोनों के चेहरों पर उदासी थी। आपस में दोनों बहुत ही धीमी आवाज में बात कर रहे थे, पर क्या बात कर रहे थे, यह कोई नहीं जानता। सड़क के किनारे एक पान की गुमटी पर चार आदमियों की बातों ने उनका ध्यान उस तरफ लगा दिया। लोगों की बातों ने दोनों के चेहरों पर कुछ प्रसन्नता के भाव ला दिए थे।

“लगता है कि वर्मा बाबू बंचेगे नहीं, डाक्टर जल्द ही जवाब दे देंगे”, उन चारों में से एक ने कहा।

दूसरा बोला, “हालत गंभीर है”।

तीसरे ने कहा- “अब तो आख़िरी यात्रा की तैयारी की जानी चाहिए”।

चौथा- “हरिद्वार या कानपुर, कहाँ ले चलने का इरादा है?”

तभी अस्पताल से एक 22 साल का युवक घबराया हुआ बाहर निकलता है और रुआंसी आवाज में बोलता है, “जीजा, बाबू नहीं रहे।”

वो दोनों जो अब तक खामोशी से उनकी बातों को सुन रहे थे ‘नहीं रहे’ शब्द सुनकर एक साथ बोल उठते हैं- “कहां ले चलना है? हरिद्वार, कानपुर या बनारस, हमारी लाश गाड़ी तैयार है।”

उन चारों में से एक व्यक्ति बोला- “कितना पैसा लोगे?”

“चार हज़ार”, उन दो गाड़ी वालों ने एक साथ कहा।

“शर्म नहीं आती तुम्हें? यहां हमारे ऊपर इतनी बड़ी मुसीबत टूट गई है और तुम सौदा कर रहे हो”, वर्मा जी का लड़का बोल उठा।

“यह हमारे लिए रोज की बात है, पेट की खातिर ऐसा करते हैं बाबू जी, लोगों के घरों के बुझते चूल्हों से ही हमारे घर का चूल्हा जलता है।”

लड़का कुछ नहीं बोलता, बस अंदर चला जाता है।

बाकी तीन आदमी अस्पताल की कागजी कार्यवाई के लिए अंदर चले जाते है। चौथा आदमी वहीं रुककर बात तीन हजार में तय कर लेता है। वर्मा बाबू का पार्थिव शरीर उसी गाड़ी से कानपुर पहुंचाया जाता है। बाकी सारी क्रियाएं भी पूरी होती हैं।

रात को वे दोनों गाड़ी वाले उन रुपयों से घर का राशन लाते हैं, बच्चों के लिए सामान लाते हैं। उनके घर का चूल्हा जलता है उन रुपयों से। दोनों सगे भाई हैं और रहते है एक साथ एक छत के नीचे। नियति का खेल देखिये पंद्रह दिन बाद उनके वृद्ध पिता स्वर्ग सिधार जाते हैं।

“छोटे कहाँ ले चलना है “हरिद्वार या कानपुर”, बड़े ने पूछा।

“जैसे पिता जी की इच्छा थी, हरिद्वार।”

सुबह बड़ा भाई शव यात्रा और अंतिम संस्कार की तैयारी के लिए फूल लेने दुकान पर जाता है। दुकान उन्हीं वर्मा जी की है, जिनके पार्थिव शरीर को कुछ दिन पहले वे कानपुर ले गए थे। आज दुकान पर वर्मा जी का लड़का है।

“भाई साहब, वो खाटी पर चढ़ाने के लिए फूल कितने के दिए?”

“जी पंद्रह सौ के”, दुकानदार ने उत्तर दिया।

“भाई साहब मुसीबत में थोड़ा तो कम कीजिये”, बड़ा भाई रुआंसे गले से अनुरोध करता है।

“नहीं, बारह सौ तक हो सकता है, इससे एक रुपया कम नहीं।”

बात तय हो जाती है। जब वो फूल लेकर जाने लगता है तो वर्मा जी का लड़का कहता है- “सुनिए, ये रुपये मैं अपने और अपने परिवार के पेट की खातिर ले रहा हूँ, जब लोगों के घर खुशी आती है या गम आता है तो ही हमारे घर का चूल्हा जलता है।”

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चित्र श्रेय: Igor Ovsyannykov