बाढ़ इंसानों की इक दुनिया बहा कर ले गई
ये हवा जब भी गई छप्पर उड़ा कर ले गई

जादूगरनी की तरह निकली हमारी मुफ़लिसी
सब मिरा वो आँख में आँखे मिलाकर ले गई

वो कोई बैकुण्ठ या फिर था कोई मायानगर
नींद की झपकी जहाँ मुझको बुलाकर ले गई

एक पूँजी थी जमा मुद्दत से आँखों में मिरी
रात चोरों की तरह सपने चुरा कर ले गई

तुम सियासतदां से थोड़ा फासला रखना ‘विकल’
ये सियासत कब किसे अपना बना कर ले गई

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दीपक 'विकल'
हिंदी परास्नातक छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली[email protected]

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