तुम्हारी ज़ब्त यादों की हिफ़ाज़त कर रहा हूँ मैं
मिरी जां आज भी तुमसे मुहब्बत कर रहा हूँ मैं

हवा जब भी तुम्हारे गाल को छूकर गुज़रती है
तुम्हें तब कौन बतलाये, शरारत कर रहा हूँ मैं

मिरे भीतर की दुनिया कोई मायाजाल है शायद
उसी को सच बनाने की हिमाक़त कर रहा हूँ मैं

मुझे मालूम है ऊँची सदायें तिलमिलायेंगी
किसी की बेजुबानी को कहावत कर रहा हूँ मैं

ज़रा सा आईने का रुख़ तुम्हारी ओर क्या मोड़ा
तुम्हारी ये शिकायत है, बग़ावत कर रहा हूँ मैं

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दीपक 'विकल'
हिंदी परास्नातक छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली[email protected]

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