‘Bandooqein Phool Ban Jaaein’, a poem by Usha Dashora

जब युद्ध की घोषणा हुई
तब हँसते हुए बच्चे
प्रार्थना बुदबुदाते बच्चे
फूल वाले पौधों को पानी दे रहे थे

बच्चों की प्रार्थनाओं के भार से डरी बन्दूक़ें
फूलों की पीठ पीछे जा छुपी
उनके पैरों ने उठने से मना कर दिया

बन्दूक़ों में फूल के बीज होने की ज़िद होने लगी
बन्दूक़ों की जिद थी उनकी देह पर भी फूटे मीठी गन्ध
बन्दूक़ों की ज़िद थी उनके माथे पर भी हो प्रार्थना वाले फूल

बन्दूक़ें फूल बन जाएँ
इस उम्मीद की मौत नहीं होनी चाहिए

क्योंकि अभी सींचने हैं बच्चों को
धरती के सारे फूल
क्योंकि अभी गानी है बच्चों को, धरती की सारी प्रार्थनाएँ।

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