थोड़ा-सा चमकता हुआ
थोड़ा चमक खोता हुआ
आता है समय
ख़ुद को बचाता हुआ
ख़ुद को बिखराता हुआ

एक वज़नहीन कोहरे में लिपटा यह समय
कितना भारी हो गया है

मैं खिड़कियाँ साफ़ कर देखता हूँ
सफ़ेद-सी उदास रोशनी में ठण्डे हो रहे इस शहर को
इसकी काली सड़कों पर हमारी भूख की दवाएँ नष्ट हो रही हैं

खो गया है सूरज पर्दे में
जम गयी है नदी एक मजबूर यात्रा में
आसमान का नीलापन ग़ायब है
हम किस रेलगाड़ी की सवारी पर हैं

अपने तलवों को; मुट्ठियों को गर्म करना चाहता हूँ
कि सहला सकूँ किसी का हाथ इस सर्द में
इस कोहरे में गिन सकूँ छूकर किसी मुरझाए फूल की पंखुड़ियों को…

विशेष चंद्र नमन की कविता 'पोंछना'

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