जिस जाति की सभ्यता जितनी पुरानी होती है, उसकी मानसिक दासता के बंधन भी उतने ही अधिक होते हैं। भारत की सभ्यता पुरानी है, इसमें तो शक ही नहीं और इसलिए इसके आगे बढ़ने के रास्ते में रुकावटें भी अधिक हैं। मानसिक दासता प्रगति में सबसे अधिक बाधक होती है।

हमारे कष्ट, हमारी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक समस्याएँ इतनी अधिक और इतनी जटिल हैं कि हम तब तक उनका कोई हल सोच नहीं सकते जब तक कि हम साफ़-साफ़ और स्वतंत्रतापूर्वक इन पर सोचने का प्रयत्न न करें। वर्तमान शताब्दी के आरम्भ में भारत में राष्ट्रीयता की बाढ़-सी आ गई, कम से कम तरुण शिक्षितों में। यह राष्ट्रीयता बहुत अंशों में श्लाघ्य रहने पर भी कितने ही अंशों में अंधी राष्ट्रीयता थी।

झूठ-सच जिस तरीक़े से भी हो, अपने देश के इतिहास को सबसे अधिक निर्दोष और गौरवशाली सिद्ध करने अर्थात अपने ऋषि-मुनियों, लेखकों और विचारकों, राजाओं और राज-संस्थाओं में बीसवीं शताब्दी की बड़ी से बड़ी राजनीतिक महत्त्व की चीज़ों को देखना हमारी इस राष्ट्रीयता का एक अंग था। अपने भारत को प्राचीन भारत और उसके निवासियों को हमेशा से दुनिया के सभी राष्ट्रों से ऊपर साबित करने की दुर्भावना से प्रेरित हो हम जो कुछ भी अनाप-शनाप ऐतिहासिक खोज के नाम पर लिखें, उसको यदि पाश्चात्य विद्वान न मानें तो झट से फ़तवा पास कर देना कि सभी पश्चिमी ऐतिहासिक अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी, जर्मन और इटालियन, अमेरिकी और रूसी, डच और चेकोस्लाव सभी बेईमान हैं, सभी षड्यंत्र करके हमारे देश के इतिहास के बारे में झूठी-झूठी बातें लिखते हैं। वे हमारे पूजनीय वेद को साढ़े तीन और चार हज़ार वर्षों से अधिक पुराना नहीं होने देते (हालाँकि वे ठीक एक अरब बानवे वर्ष पहले बने थे)। इन भलेमानसों के ख़याल में आता है कि अगर किसी तरह से हम अपनी सभ्यता, अपनी पुस्तकों और अपने ऋषि-मुनियों को दुनिया में सबसे पुराना साबित कर दें, तो हमारा काम बन गया। शायद दुनिया हमारे अधिकारों की प्राचीनता को देखकर बिना झगड़ा-झंझट के ही हमें आज़ाद हो जाने दे, अन्यथा हमारे तरुण अपनी नसों में उस प्राचीन सभ्यता के निर्माताओं का रक्त होने के अभिमान में मतवाले हो जाएँ और फिर अपने राष्ट्र की उन्नति के लिए बड़ी से बड़ी क़ुरबानी भी उनके बाएँ हाथ का खेल बन जाए, और तब हमारे देश को आज़ाद हो जाने में कितने दिन लगेंगे?

आज हमारे हाथ में चाहे आग्नेय अस्त्र न हों, नई-नई तोपें और मशीनगन न हों, समुन्दर के नीचे और हवा के ऊपर से प्रलय का तूफ़ान मचाने वाली पनडुब्बियाँ और जहाज़ न हों, लेकिन यदि हम राजा भोज के काठ के उड़ने वाले घोड़े और शुक्रनीति में बारूद साबित कर दें तो हमारी पॉंचों अंगुलियाँ घी में। इस बेवक़ूफ़ी का भी कहीं ठिकाना है कि बाप-दादों के झूठ-मूठ के ऐश्वर्य से हम फूले न समाएँ और हमारा आधा जोश उसी की प्रशंसा में ख़र्च हो जाए।

अपने प्राचीन काल के गर्व के कारण हम अपने भूत के स्नेह में कड़ाई के साथ बंध जाते हैं और इससे हमें उत्तेजना मिलती है कि अपने पूर्वजों की धार्मिक बातों को आँख मूँदकर मानने के लिए तैयार हो जाएँ। बारूद और उड़नखटोला में तो झूठ-साँच पकड़ने की गुंजाइश है, लेकिन धार्मिक क्षेत्र में तो अंधेरे में काली बिल्ली देखने के लिए हरेक आदमी स्वतंत्र है। न यहाँ सोलहों आना बत्तीसों रत्ती ठीक-ठीक तौलने के लिए कोई तुला है और न झूठ-साँच की कोई पक्की कसौटी। एक चलता-पुर्ज़ा बदमाश है। उसने अपने कौशल, रुपये-पैसे और धोखे-धड़ी और तरह-तरह के प्रलोभन से कुछ स्वार्थियों या आँख के अंधे गाँठ के पूरों को मिलाकर एक नकटा पंथ क़ायम कर दिया और फिर लगी हज़ारों छोटी-मोटी, शिक्षित और मूर्ख, काली और सफ़ेद भेड़ें हा–हा कर नाक कटाने। ज़िन्दगी-भर वह बदमाश मौज़ करता रहा। मरने के बाद उसके अनुयायियों ने उसे और ऊँचा बढ़ाना शुरू किया। अगर उस जमात को कुछ शताब्दियों तक अपने इस प्रचार में कामयाबी मिली तो फिर वह धूर्त दुनिया का महान पुरुष और पवित्र आत्मा प्रसिद्ध हो गया।

पुराने वक़्त की बातों को छोड़ दीजिए। मैंने अपनी आँखों से ऐसे कुछ आदमियों को देखा है जिनमें कुछ मर गए हैं और कुछ अभी तक ज़िंदा हैं। उनका भीतरी जीवन कितना घृणित, स्वार्थपूर्ण और असंयत था। लेकिन बाहर भक्त लोग उनके दर्शन, सुमधुर आलाप से अपने को अहोभाग्य समझने लगते थे।

नज़दीक से देखिए, ये धार्मिक महात्माओं के मठ और आश्रम ढोंग के प्रचार के लिए खुली पाठशालाएँ हैं और धर्म-प्रचार क्या, पूरे सौ सैकड़े नफ़े का रोज़गार है। अधिकांश लोग इसमें अपने व्यवसाय के ख़याल से जुटे हुए हैं।

अयोध्या में एक महात्मा थे। उनसे रामजी इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने स्वयं बैकुण्ठ से आकर उनका पाणिग्रहण किया। हाँ, पाणिग्रहण किया! पुरुष थे पहले, पीछे तो भगवान की कृपा से वह उनकी प्रियतमा के रूप में परिवर्तित कर दिए गए। रामजी के लिए क्या मुश्किल है। जब पत्थर मनुष्य के रूप में बदल सकता है तो पुरुष को स्त्री के रूप में बदल देना कौन-सी बड़ी बात? ऐसा-ऐसा परिवर्तन तो आजकल भी अनायास कितनी बार देखा गया है।

एक नया मत इधर 50–60 वर्ष से चला है। वह दुनिया-भर की सारी बेवक़ूफ़ियों, भूत-प्रेत, जादू-मंत्र सबको विज्ञान से सिद्ध करने के लिए तुला हुआ है। बेवक़ूफ़ हिन्दुस्तानी समझते हैं कि ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज से गदहे नहीं निकलते और सभी जैक और जानसन साइंस छोड़कर दूसरी बात ही नहीं करते। इन अधकचरे पंडितों ने अपने अधूरे ज्ञान के आधार पर भूत-प्रेत, देवी-देवता, साधु-पूजा सबको तीस बरस पहले निकले वैज्ञानिक ‘सिद्धान्तों’ से सिद्ध करना शुरू किया। हालाँकि उन सिद्धान्तों में अब 75 फ़ीसदी ग़लत साबित हो गए हैं, लेकिन अभी अन्धे भक्तों के लिए उस पुराने विज्ञान के पुट से तैयार किए हुए ग्रंथ ब्रह्मवाक्य बन रहे हैं।

हिन्दुस्तान का इतिहास बहुत लम्बा-चौड़ा है ही—काल और देश, दोनों के ख़याल से। हमारी बेवक़ूफ़ियों की लिस्ट भी उसी तरह बहुत लम्बी-चौड़ी है। अंधी राष्ट्रीयता और उसके पैगम्बरों ने हममें अपने भूत के प्रति अत्यन्त भक्ति पैदा कर दी है और फिर हमारी उन सभी मूर्खताओं के पोषण के लिए सड़ी-गली विज्ञान की थ्योरियाँ और दिवालिये श्वेतांग तैयार ही हैं। फिर क्यों न हम अपनी अक़्ल बेच खाने के लिए तैयार हो जाएँ? जिनके यहाँ वायुयान ही नहीं, काठ के घोड़े भी आकाश में उड़ते हों, जिनके यहाँ बारूद और आग्नेयास्त्र ही नहीं, मुख से निकली हुई ज्वाला में करोड़ों शत्रु एक क्षण में जलकर राख हो जाते हों, जिनकी सूक्ष्म दार्शनिक विवेचनाओं और आत्मवंचनाओं को सुनकर आज भी दुनिया दंग हो जाए, वह भला किसी बात को झूठा लिख सकता है? तिपाई पर भूत बुलाना, मेस्मेरिज़्म, हेप्नाटिज़्म आदि के द्वारा पहले वैज्ञानिक ढंग से हमें अपनी विस्तृत होती जाती बेवक़ूफ़ियों के पास ले जाया गया और अब तो विज्ञान पारितोषिक विजेता लोग सरे मैदान हरसूराम और हरिराम ब्रह्म की विभूति बाँट रहे हैं। आख़िर जब नोबल पुरस्कार विजेता आलिवर आज भूतों-प्रेतों पर पुस्तकें लिख रहा है और क़सम खा–खाकर लोगों में उनका प्रचार कर रहा है तो हमारे इन स्वदेशी भाइयों का क़सूर ही क्या?

अभी तक शिक्षित लोग फलित ज्योतिष को झूठ समझते थे, लेकिन अब उसके भी काफ़ी अधिक हिमायती हो चले हैं। वह इसे पक्का विज्ञान मानते हैं। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी को छापने के लिए हमारे अख़बार एक-दूसरे से होड़ लगा रहे हैं। 27 अगस्त की ‘सर्चलाइट’ एक ज्योतिषी महाराज की मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणी को एक प्रधान पृष्ठ पर स्थान देती है। फिर पूना में लाखों रुपये ख़र्च करके इसके लिए यंत्र और विशेषज्ञ रखने की क्या ज़रूरत है? स्वदेशी का ज़माना है, कांग्रेस का मंत्रिमंडल भी हो गया है। ज्योतिषियों को चाहिए कि एक बड़ा-सा डेपुटेशन लेकर मुख्यमंत्रियों से मिलें। उनको विश्वास रखना चाहिए कि कांग्रेस के छह प्रान्तों में ऐसे मंत्री बहुत कम ही होंगे जिनका ज्योतिष में विश्वास न होगा। ज्योतिषी लोग देश-सेवा के ख़याल से अपना वेतन कम करने को तैयार होंगे ही, फिर क्या ज़रूरत है कि स्वदेशी साधन के रहते ऋतु-भविष्य-कथन के यंत्र, भूकम्प के सिस्मोग्राफ़ आदि का बखेड़ा और उस पर हज़ार-हज़ार, पन्द्रह-पन्द्रह सौ रुपये महीना लेने वाले विशेषज्ञों को रखा जाए? ज्योतिषी लोग अपने काम को बड़ी सफलता के साथ कर सकते हैं। उन्हें न यंत्रों की आवश्यकता है और न बाहर से सूचनाओं के मँगाने की। एक स्थान पर बैठे-बैठे ही वह सभी बातें बतला दिया करेंगे। फिर तारीफ़ यह कि एक ही आदमी अतिवृष्टि और अनावृष्टि को भी बतला देगा और भूकम्प को भी। स्वराज्य की क़िस्त आने-जाने में अगर कुछ देर होगी तो उसे भी नेताओं की जन्मपत्री देखकर बतला देगा। अभी इसी साल एक महाराज बादशाह की गद्दी देखने विलायत जाना चाहते थे। दुष्ट ग्रहों की उन्हें बड़ी फ़िक्र थी और उनसे भी अधिक फ़िक्र थी उनकी माँ की। एक ज्योतिषी जी ने आकर मेष-मिथुन गिनकर महाराज को भी सन्तुष्ट कर दिया कि कोई ग्रह ख़िलाफ़ नहीं है और माँ को भी ख़म ठोंककर कह दिया कि महाराज को कोई अनिष्ट नहीं है, मैं ज़िम्मेवारी लेता हूँ। सब लोग प्रसन्न हो गए। ज्योतिषी जी को 5 हज़ार रुपये मिले। भला इतना सस्ता ज़िन्दगी का बीमा कहीं हो सकता है? ऐसा होने पर एक और फ़ायदा होगा। हरेक प्रांतीय सरकार में एक सरकारी ज्योतिषी और 10-5 सहायक ज्योतिषी होने पर मंत्रियों और पदाधिकारियों को भी ज्योतिषियों के पीछे गली-गली की ख़ाक न छाननी पड़ेगी। अपनी बीवी और छोटे-मोटे बबुआ-बबुनी सबका वर्ष-फल साल का साल पहुँचता रहेगा। स्वदेशी व्यवसाय को ज़रूर आपको प्रोत्साहन देना चाहिए और इससे बढ़कर शुद्ध स्वदेशी व्यवसाय और क्या हो सकता है जिसके दिल, दिमाग़, शरीर और परिश्रम सभी चीज़ें सोलहों आने स्वदेशी हैं।

हम लोगों के मिथ्या विश्वास क्या एक-दो हैं कि जिन्हें एक छोटे से लेख में लिखा जा सके? हमारे यहाँ तो इसके मिसिल के मिसिल और फ़ाइल की फ़ाइल तैयार हैं। और तारीफ़ यह है कि इन बेवक़ूफ़ियों के भारी-भरकम बोझ को सिर पर लादे हुए हमारे नेता लोग समुन्दर पार कर जाना चाहते हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि बैकुण्ठ के भगवान, आकाश के नवग्रह और पृथ्वी के ज्योतिषी और ओझा-सयाने उनकी यात्रा में ज़रूर कुछ हाथ बटाऍंगे।

हमारी जाति-पाँति की व्यवस्था को ही ले लीजिए। वह हमारे ऋषि-मुनियों के उन बड़े आविष्कारों में है जिन पर हमें बड़ा अभिमान है। राष्ट्रीय भावनाओं की जागृति के साथ-साथ यद्यपि कुछ इने-गिने लोग जाति-पाँति के ख़िलाफ़ बोलने लगे, लेकिन अब भी हमारे उच्च कोटि के नेताओं का अधिकांश भाग अपने ऋषियों की इस अद्भुत विशेषता की क़द्र करने को तैयार है। नेताओं ने देख लिया कि यह जाति-पाँति, आपस के फूट, भेदभाव के बढ़ाने का एक सबसे बड़ा कारण बन रहा है। कुछ साल पहले तो भीतर-भीतर जातीय संगठन भी इन्होंने कर रखा था और अब भी बहुतों को उसे छोड़ने में मोह लगता है। मैं अन्य नेताओं की बात नहीं कहता। मैं ख़ास कांग्रेस के नेताओं की बात कहता हूँ। उन बेचारों को इसी कोशिश में मरना पड़ रहा है कि कैसे राष्ट्रीयता और जाति-पाँति दोनों साथ दाहिने-बाएँ कंधे पर वहन किए जा सकते हैं। उनमें से कुछ ने तो ज़रूर समझ लिया होगा कि यह असम्भव है।

शुद्ध राष्ट्रीयता तब तक आ ही नहीं सकती जब तक आप जाति-पाँति तोड़ने पर तैयार न हों। अगर आप जाति-पाँति तोड़े हुए नहीं हैं, तो आपका वास्तविक संसार आपकी जाति के भीतर है। बाहर वालों के साथ तो सिर्फ़ कामचलाऊ समझौता है। जब आप किसी पद पर पहुँचेंगे तो ईमानदारी रहने पर आपकी राय को प्रभावित करने में सफलता सबसे अधिक आपके जाति-भाइयों की होगी। नौकरी-चाकरी दिलाने, सब-कमेटी में भेजने और सिफ़ारिशी चिट्ठी लिखने में मजबूरन आपको अपनी जाति का ख़याल करना होगा।

आदमी के दिल में हज़ारों कोठरियाँ ज़रूर हैं, लेकिन वहाँ ऐसी फ़र्क़-फ़र्क़ कोठरियाँ नहीं हैं जिनमें एक में जाति-पाँति का भाव पड़ा रहे और दूसरे में उससे अछूती राष्ट्रीयता बनी रहे। जैसे किसानों के आंदोलन में आने वाले समझदार आदमियों को पहले ही से तैयार होकर आना चाहिए कि उन्हें साम्यवाद में पैर रखना है, वैसे ही राष्ट्रीयता के पथ पर पैर रखने वालों को भी समझना चाहिए कि उन्हें जाति-पाँति की दीवारों को तोड़ गिराना होगा।

यदि कोई आदमी राष्ट्रीय नेता रहना चाहता है और साथ ही अपने जाति-भाइयों की घनिष्ठता को क़ायम रखना चाहता है तो या तो वह ईमानदार नहीं रहेगा या उसे असफल होकर रहना पड़ेगा। अपनी जाति के साथ घनिष्ठता रखकर कैसे दूसरी जाति का विश्वासपात्र कोई हो सकता है? मंत्रियों को तो ख़ास तौर से सावधान रहना पड़ेगा। क्योंकि जाति-भाइयों की घनिष्ठता उन्हें आसानी से बदनाम कर सकती है। मेरी समझ में प्रान्त के लिए, राष्ट्र के लिए, कांग्रेस के लिए और व्यक्तिगत तौर से नेताओं के लिए अच्छा यही है कि हरेक प्रधान नेता तुरन्त से तुरन्त अपने लड़के-लड़कियों, भतीजे-भतीजियों अथवा भांजा-भांजियों या नाती-नतिनियों में से कम से कम एक की शादी जाति-पाँति तोड़कर दिखला दे, जैसा कि महात्मा गांधी जी तथा राजगोपालाचारी ने करके दिखाया।

आँख मूँदकर हमें समय की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। हमें अपनी मानसिक दासता की बेड़ी की एक-एक कड़ी को बेदर्दी के साथ तोड़कर फेंकने के लिए तैयार होना चाहिए। बाहरी क्रान्ति से कहीं ज़्यादा ज़रूरत मानसिक क्रान्ति की है। हमें दाहिने-बाएँ, आगे-पीछे दोनों हाथ नंगी तलवार नचाते हुए अपनी सभी रूढ़ियों को काटकर आगे बढ़ना चाहिए। क्रान्ति प्रचण्ड आग है, वह गाँव के एक झोपड़े को जलाकर चली नहीं जाएगी। वह उसके कच्चे-पक्के सभी घरों को जलाकर ख़ाक कर देगी और हमें नये सिरे से नये महल बनाने के लिए नींव डालनी पड़ेगी।

राहुल सांकृत्यायन का लेख 'स्त्री घुमक्कड़'

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राहुल सांकृत्यायन
राहुल सांकृत्यायन जिन्हें महापंडित की उपाधि दी जाती है हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे। वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए। वह हिंदी यात्रासहित्य के पितामह कहे जाते हैं। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था। इसके अलावा उन्होंने मध्य-एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।