झुकी मन के गवाक्षों पर किसी कचनार की टहनी
हमारे द्वार तक आयी किसी के द्वार की टहनी

लदी जब लाल फूलों से, बुलाने लग गई मुझको
कटीले तार की दीवार की उस पार की टहनी

इधर का मोगरा करता निवेदित गीत गन्धों के
उधर की रात्रि-गन्धा की झुकी वय भार की टहनी

समझकर भी नहीं समझे हमें संकेत जो करती
पड़ोसी के अहाते की शोख़ गुलनार की टहनी

बहुत चाहा कि हम भी तोड़ लें कुछ फूल छुगनी के
नहीं झुकती झुकाये पर सबल संस्कार की टहनी

सुबह से शाम तक लड़कर थके जब बाग़ में लौटे
किसी की बाँह सी लिपटी किसी के प्यार की टहनी

मुझे संजीवनी देती सुबह मैं युद्ध में लौटूँ
प्रणय-स्वीकार में हिलती किसी अभिसार की टहनी!

Previous articleकलाकार जन्मजात होता है या बनता है?
Next articleअब और कहने की ज़रूरत नहीं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here