कुछ पुरुष

नित्या शुक्ला की कविता ‘कुछ पुरुष’ | ‘Kuchh Purush’, a poem by Nitya Shukla

ज़िन्दगी की पटरियों पर,
उम्र के स्टेशनों को पार करते,
कुछ पुरुष…
नहीं उतरते हर प्लेटफ़ॉर्म पर चहलक़दमी के लिए।

हँसकर टाल देते हैं,
रोमांचक यात्राओं की बातें

बुलेट पर जमी हुई धूल साफ़ करते हुए
सुनाते हैं अपने ज़माने की दास्ताँ।

गिटार बजाते नायक को नायिका के इर्द-गिर्द घूमता देख,
मुस्कुराते हैं आँखों में शरारत लिए,
कारण पूछने पर,
सुना देते हैं कुछ आधे-अधूरे से क़िस्से।

गाड़ी का स्टेयरिंग सम्भाले हुए,
कनखियों से निहारते हैं अपनी जीवनसंगिनी की मुस्कान,
और भूल जाते हैं रास्ते…
फिर शहर की बढ़ती इमारतों पर, थोप देते हैं सारा इल्ज़ाम।

शब्दों में जताना नहीं जानते परवाह,
नियम से हर रोज़ लगाते हैं माँ को फ़ोन,
कुछ क्षणों के वार्तालाप में भाँप जाते हैं,
बढ़ते हुए बीपी की आहट
और घर के उखड़ते हुए दरवाज़े की आवाज़।

बोलते नहीं  कि अकेले सफ़र करना अब अच्छा नहीं लगता…
पर बनाते हैं योजनाएँ स्कूल के कैलेण्डर के हिसाब से।

ज़िन्दगी की पटरियों पर,
उम्र के स्टेशन पार करते,
कुछ पुरुष…

समझ जाते हैं आँखों की भाषा,
जानते हैं हाथों को नरमी से पकड़ने का तरीक़ा,
निकाल लेते हैं सही मतलब फीकी मुस्कानों का,
करते हैं धूप, कपूर, दिये से सँझाबाती,
पढ़ते हैं हनुमान चालीसा,
बन जाना चाहते हैं
बुरी नज़र को तोड़ने वाला कवच।

समझने लगते हैं आँखों के लाल डोरों
और स्नेह के गुलाबी धागों का अंतर
जानते हैं प्रेम और अधिकार की सीमाएँ

ज़िन्दगी की पटरियों पर,
उम्र के स्टेशन पार करते,
ये पुरुष…
जल्दी से और बड़े हो जाना चाहते हैं।

फिर दोस्तों के बीच बैठ,
पुरानी तस्वीरों को देख बच्चे बन जाते हैं।
किशोर वय बेटे के साथ,
उसके दोस्तों का ज़िक्र करते हुए,
भूले बिसरे शब्दों का अचानक करने लगते हैं
बेझिझक प्रयोग।

ज़िन्दगी की पटरियों पर,
उम्र के स्टेशन पार करते,
ये पुरुष
बस …जल्दी से और बड़ा हो जाना चाहते हैं।

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