कितनी सम्मोहक होती है ना,
अदृश्य की छवि।
रोम रोम सुनाता है,
अनछुए स्पर्श का एहसास।
आकर्षित करती है,
नेपथ्य की हलचल।
लुभाते हैं,
चुप्पियों के शब्द।
बुलाती है अपनी ओर,
अपरिचित कस्तूरी की परिचित खुशबू।
और उभर आती है…
प्रणय अभिलाषा।
पर क्या प्रणय भी इतना ही सुंदर होता है?
होता होगा शायद…
पर उतना नहीं,
जितना ख़ूबसूरत है…
रोमावली में समाया,
अनछुए का स्पर्श।
नयनों में छिपी,
अदृश्य की छवि।
अधरों पर जमी,
चुप्पियों के शब्द।
अब मान भी जाओ ना…
प्रणय से भी ख़ूबसूरत होती है…
अपरिचित की ख़ुशबू,
नेपथ्य का संभ्रम,
और…
अप्राप्य का सुख।

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