विनीता अग्रवाल बहुचर्चित कवियित्री और सम्पादक हैं। उसावा लिटरेरी रिव्यू के सम्पादक मण्डल की सदस्य विनीता अग्रवाल के चार काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं— ‘टू फुल मून्स’, ‘सिल्क ऑफ़ हंगर’, ‘द लॉन्गेस्ट प्लेज़र’ और ‘वर्ड्स नॉट स्पोकन’।

अनुवाद: किंशुक गुप्ता

यशोधरा

तारों से झिलमिलाता हुआ उल्टे कटोरे-सा रात का आकाश
और तुम्हारा पति तुम्हारे जीवन से दूर जाता हुआ, यशोधरा

तुम उस मौन को ध्यान से सुनो
मौन जो सबसे बड़ा विध्वंसक है

दोष के पीले धब्बों से ढका उसका चोग़ा
नीचे, नीचे, नीचे, उतरता जाता है अंधकार की ओर

आँसुओं से भरा तुम्हारा बिस्तर, तुम्हारे कोमल बच्चे को
हलराता हुआ, पेड़ के तनों के सुराखों से रिसतीं ख़ून की लाल बूँदें सूखी हुईं

बादल, हवा, पत्ते, फूल सब आवाज़ खो चुके हैं
रोशनी ने सबका रंग सोखकर पुतलों जैसा बेरंग कर दिया है

ऐसी निष्क्रियता यशोधरा कि फिर कभी भी कहीं गति न होगी
ऐसा हहराता सूनापन कि ज्ञान का भी गला घुट जाए

वो लौटेगा लेकिन तुम्हारे दस साल के बच्चे को छीनने के लिए
उसका भिक्षा-पात्र उसके बच्चे के लिए उसकी विरासत

वह सौंपगा उसे उसके सही हक़दार को
और एक बार फिर, चल देगा, पूर्व की ओर

उल्टे कटोरे-सा रात का आकाश
सूना हो जाएगा सभी चमकते तारों से!

मेरे पास पाँच घर हैं

—सब मुझमें समाहित

ढीली कछारी मिट्टी की
पतली परत
ढके रहती है मेरे पाँच घर

पहला
बना है रुई के फाहों
खरपतवार, भूसे, और घास से

उन पक्षियों का सुरक्षित गेह
जो थक गए हैं उड़ते-उड़ते
जिनका तब तक पीछा किया जाता है
जब तक पस्त होकर
वे आकाश से गिर न पड़ें
या हो जाएँ शिकार अनेक हाथों में
पकड़ी गुलेल का

दूसरा—
सुगंध से बना
जब आटा फूलकर बनता था रोटी
तुम्हारी त्वरित उँगलियों के नीचे, माँ

मुझ पर तुम्हारे अस्तित्व का घनत्व
मिंट कुकुम्बर, कड़ी पत्ता, पुराना बासमती
ख़ुशबुओं का मुलायम, झीना पर्दा
उनका चुम्बकीय आकर्षण ध्रुवों से तीक्ष्ण
जैसे जीवन का सत्व साँसों से खींचा जा सके

तीसरा—
दीवारों को जोड़ते
दुरुस्त कोने

अंधकार का
एक समकोण
जहाँ रेंगती हुई मैं छुप सकती
भुलाकर कि मेरे पास कान हैं
और लोगों के पास जीभ

चौथा आम बारिश से बना
बारिश जो मुझे वहाँ ले जाती है
जहाँ से वह गिरती है

मैं छत की ओर भागती
मिलन को आतुर
उसकी गीली मॉर्स भाषा
मेरी नंगी बाँहों पर स्पष्ट
बादलों के संकेत जो मैं तभी सीख गई थी
जब मैं पैदा हुई थी

पाँचवाँ
लकड़ी की वह नेमप्लेट
जो नहीं निकाली जाएगी
चाहे घर को दो बार भी
नया-नकोर कर दिया जाए

बाँस की वह तख़्ती
जिस पर मेरे पिता का नाम है
एक खूँटी जिस पर थकान टाँगी जा सके
अकूत दृढ़ता का चिह्न

विश्वास करने योग्य
झुकने योग्य
हर दिन ख़ून बहाने योग्य!

* * *

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किंशुक गुप्ता
किंशुक गुप्ता मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ लेखन से कई वर्षों से जुड़े हुए हैं। अंग्रेज़ी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओंं में कविताएँ, लेख और कहानियाँ प्रकाशित। कविताओं के लिए अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित। 'मिथिला रिव्यू', 'जैगरी लिट', 'उसावा लिटरेरी रिव्यू' के संपादक मंडल के सदस्य।

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