मज़े इश्क़ के कुछ वही जानते हैं
कि जो मौत को ज़िंदगी जानते हैं

शब-ए-वस्ल लीं उन की इतनी बलाएँ
कि हमदम मिरे हाथ ही जानते हैं

न हो दिल तो क्या लुत्फ़-ए-आज़ार-ओ-राहत
बराबर ख़ुशी ना-ख़ुशी जानते हैं

जो है मेरे दिल में उन्हीं को ख़बर है
जो मैं जानता हूँ वही जानते हैं

पड़ा हूँ सर-ए-बज़्म मैं दम चुराए
मगर वो इसे बे-ख़ुदी जानते हैं

कहाँ क़द्र-ए-हम-जिंस हम-जिंस को है
फ़रिश्तों को भी आदमी जानते हैं

कहूँ हाल-ए-दिल तो कहें उस से हासिल
सभी को ख़बर है सभी जानते हैं

वो नादान अंजान भोले हैं ऐसे
कि सब शेवा-ए-दुश्मनी जानते हैं

नहीं जानते इस का अंजाम क्या है
वो मरना मेरा दिल-लगी जानते हैं

समझता है तू ‘दाग़’ को रिंद ज़ाहिद
मगर रिंद उस को वली जानते हैं..

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दाग़ देहलवी
नवाब मिर्जा खाँ 'दाग़', उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे। इनका जन्म सन् 1831 में दिल्ली में हुआ। गुलजारे-दाग़, आफ्ताबे-दाग़, माहताबे-दाग़ तथा यादगारे-दाग़ इनके चार दीवान हैं, जो सभी प्रकाशित हो चुके हैं। 'फरियादे-दाग़', इनकी एक मसनवी (खंडकाव्य) है। इनकी शैली सरलता और सुगमता के कारण विशेष लोकप्रिय हुई। भाषा की स्वच्छता तथा प्रसाद गुण होने से इनकी कविता अधिक प्रचलित हुई पर इसका एक कारण यह भी है कि इनकी कविता कुछ सुरुचिपूर्ण भी है।

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