ये बात-बात में क्या नाज़ुकी निकलती है
दबी-दबी तिरे लब से हँसी निकलती है

ठहर-ठहर के जला दिल को, एक बार न फूँक
कि इसमें बू-ए-मोहब्बत अभी निकलती है

बजाए शिकवा भी देता हूँ मैं दुआ उसको
मिरी ज़बाँ से करूँ क्या, यही निकलती है

ख़ुशी में हम ने ये शोख़ी कभी नहीं देखी
दम-ए-इताब जो रंगत तिरी निकलती है

हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है

अदा से तेरी मगर खिंच रहीं हैं तलवारें
निगह-निगह से छुरी पर छुरी निकलती है

मुहीत-ए-इश्क़ में है क्या उमीद ओ बीम मुझे
कि डूब-डूब के कश्ती मिरी निकलती है

झलक रही है सर-ए-शाख़-ए-मिज़ा ख़ून की बूँद
शजर में पहले समर से, कली निकलती है

शब-ए-फ़िराक़ जो खोले हैं हम ने ज़ख़्म-ए-जिगर
ये इंतिज़ार है कब चाँदनी निकलती है

समझ तो लीजिए, कहने तो दीजिए मतलब
बयाँ से पहले ही मुझ पर छुरी निकलती है

ये दिल की आग है या दिल के नूर का है ज़ुहूर
नफ़्स-नफ़्स में मिरे रौशनी निकलती है

कहा जो मैंने कि मर जाऊँगा तो कहते हैं
हमारे ज़ाइचे में ज़िंदगी निकलती है

समझने वाले समझते हैं पेच की तक़रीर
कि कुछ न कुछ तिरी बातों में फी निकलती है

दम-ए-अख़ीर तसव्वुर है किस परी-वश का
कि मेरी रूह भी बनकर परी निकलती है

सनम-कदे में भी है हुस्न इक ख़ुदाई का
कि जो निकलती है सूरत परी निकलती है

मिरे निकाले न निकलेगी आरज़ू मेरी
जो तुम निकालना चाहो, अभी निकलती है

ग़म-ए-फ़िराक़ में हो ‘दाग़’ इस क़दर बेताब
ज़रा से रंज में जाँ आपकी निकलती है

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दाग़ देहलवी
नवाब मिर्जा खाँ 'दाग़', उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे। इनका जन्म सन् 1831 में दिल्ली में हुआ। गुलजारे-दाग़, आफ्ताबे-दाग़, माहताबे-दाग़ तथा यादगारे-दाग़ इनके चार दीवान हैं, जो सभी प्रकाशित हो चुके हैं। 'फरियादे-दाग़', इनकी एक मसनवी (खंडकाव्य) है। इनकी शैली सरलता और सुगमता के कारण विशेष लोकप्रिय हुई। भाषा की स्वच्छता तथा प्रसाद गुण होने से इनकी कविता अधिक प्रचलित हुई पर इसका एक कारण यह भी है कि इनकी कविता कुछ सुरुचिपूर्ण भी है।

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