‘घुमक्कड़-शास्त्र’ से

निरुद्देश्‍य का अर्थ है उद्देश्‍यरहित, अर्थात् बिना प्रयोजन का। प्रयोजन बिना तो कोई मंदबुद्धि भी काम नहीं करता। इसलिए कोई समझदार घुमक्कड़ यदि निरुद्देश्‍य ही बीहड़पथ को पकड़े तो यह विचित्र-सी बात है। निरुद्देश्‍य बंगला में ‘घर से गुम हो जाने’ को कहते हैं। यह बात कितने ही घुमक्कड़ों पर लागू हो सकती है जिन्‍होंने कि एक बार घर छोड़ने के बाद फिर उधर मुँह नहीं किया। लेकिन घुमक्कड़ों के लिए जो साधन और कर्त्तव्‍य इस शास्‍त्र में लिखे गए हैं, उन्‍हें देखकर कितने ही घुमक्कड़ कह उठेंगे—हमें उनकी आवश्‍यकता नहीं, क्‍योंकि हमारी यात्रा का कोई महान या लघु उद्देश्‍य नहीं। बहुत पूछने पर वह तुलसीदास की पाँती ‘स्वांतः सुखाय’ कह देंगे। लेकिन ‘स्वांतः सुखाय’ कहकर भी तुलसीदास ने जो महती कृति संसार के लिए छोड़ी, क्या वह निरुद्देश्‍यता की द्योतक है? ख़ैर ‘स्वांतः सुखाय’ कह लीजिए, आप जो करेंगे वह बुरा काम तो नहीं होगा? आप बहुजन के अकल्‍याण का तो कोई काम नहीं करेंगे? ऐसा कोई सम्भ्रान्त घुमक्कड़ नहीं होगा, जो कि दूसरों को दुःख और पीड़ा देने वाला काम करेगा। हो सकता है, कोई आलस्‍य के कारण लेखनी, तूलिका या छिन्‍नी नहीं छूना चाहता, लेकिन इस तरह के स्‍थायी आत्‍मप्रकाश के बिना भी आदमी आत्‍म-प्रकाश कर सकता है।

हर एक आदमी अपने साथ एक वातावरण लेकर घूमता है, जिसके पास आने वाले अवश्य उससे प्रभावित होते हैं।

घुमक्कड़ यदि मौन रहने का व्रत धारण कर ले, तो वह अधिक सफलता से आत्‍म-गोपन कर सकता है, किंतु ऐसा घुमक्कड़ देश की सीमा से बाहर जाने की हिम्‍मत नहीं कर सकता। फिर ऐसा क्या संकट पड़ा है कि सारे भुवन में विचरण करने वाला व्‍यक्ति अपनी जीभ कटा ले। केवल बोलने वाला घुमक्कड़ दूसरे का कम लाभ नहीं करता। बोलने और लिखने दोनों ही से काल और देश दोनों में अधिक आदमी लाभ उठा सकते हैं, लेकिन अकेली वाणी भी कम महत्त्व नहीं रखती। इस शताब्‍दी के आरम्भ में काशी के सर्वश्रेष्‍ठ विद्वान पंडित शिवकुमार शास्‍त्री अपने समय के ही नहीं, वर्तमान अर्ध-शताब्‍दी के सर्वश्रेष्‍ठ संस्कृतज्ञ थे। वह शास्‍त्रार्थ में अद्वितीय तथा सफल अध्‍यापक थे, किंतु लेखनी के या तो आलसी थे या दुर्बल, अथवा दोनों ही। उन्‍होंने एक पुस्‍तक पहले लिखी, जब कि उनकी ख्‍याति नहीं हुई थी। ख्‍याति के बाद एक पुस्‍तक लिखी, किंतु उसे अपने शिष्‍य के नाम से छपवाया। प्रतिद्वंद्वी दोष निकालेंगे, इसीलिए वह कुछ भी लिखने से हिचकिचाते थे। उस समय के दोष निकालने वाले संस्कृतज्ञ कुछ निम्नतल में चले गए थे, इसमें संदेह नहीं। भट्टोजी दीक्षित ने शाहजहाँ के समय सत्रहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ‘सिद्धांत कौमदी’ नाम की प्रसिद्ध पुस्‍तक लिखी, साथ ही व्‍याकरण के कितने की तत्‍वों की व्‍याख्‍या करते हुए ‘मनोरमा’ नामक ग्रंथ भी लिखा। शाहजहाँ के दरबारी पंडित, पंडितराज जगन्‍नाथ विचारों में कितने उदार थे, यह इसी से मालूम होगा कि उन्‍होंने स्वधर्म पर आरूढ़ रहते एक मुसलमान स्‍त्री से ब्‍याह किया। उनकी सारे शास्त्रों में गति थी और वह वस्‍तुतः पंडितराज ही नहीं बल्कि संस्कृत के अंतिम महान कवि थे। लेकिन भट्टोजी दीक्षित की भूल दिखलाने के लिए उन्‍होंने बहुत निम्‍नतल पर उतरकर मनोरमा के विरुद्ध ‘मनोरमा-कुचमर्दन’ लिखा। बेचारे शिवकुमार ‘दूध का जला छाछ फूँक-फूँककर पिए’ की कहावत के मारे यदि लेखनी नहीं चला सके, तो उन्‍हें दोषी नहीं ठहराया ना सकता। लेकिन दो पीढ़ियों तक पढ़ाते संस्कृत के सैकड़ों चोटी के विद्वानों को पढ़ाकर क्या उन्‍होंने अपनी विद्वत्ता से कम लाभ पहुँचाया? कौन कह सकता है, वह ऋषि-ऋण से उऋण हुए बिना चले गए। इसलिए यह समझना ग़लत है कि घुमक्कड़ यदि अपनी यात्रा निरुद्देश्‍य करता है, तो वह ठोस पदार्थ के रूप में अपनी कृति नहीं छोड़ जाएगा।

भूतकाल में हमारे बहुत-से ऐसे घुमक्कड़ हुए, जिन्‍होंने कोई लेख या पुस्‍तक नहीं छोड़ी। बहुत भारी संख्‍या को संसार जान भी नहीं सका। एक महान रूसी चित्रकार ने तीन सवारों का चित्र उतारा है। किसी दुर्गम निर्जन देश में चार तरुण सवार जा रहे थे, जिनमें से एक यात्रा की बलि हो गया। बाक़ी तीन सवार बहुत दिनों बाद बुढ़ापे के समीप पहुँचकर लौट रहे थे। रास्‍ते में अपने प्रथम साथी और उसके घोड़े की सफ़ेद खोपड़ियाँ दिखायी पड़ीं। तीनों सवारों और घोड़े के चेहरे में करुणा की अतिवृष्टि कराने में चित्रकार ने कमाल कर दिया है। इस चित्र को उस समय तक मैंने नहीं देखा था, जबकि 1930 में समय के विहार में अपने से बारह शताब्‍दी पहले हिमालय के दुर्गम मार्ग को पार करके तिब्‍बत गए नालंदा के महान आचार्य शांतरक्षित की खोपड़ी देखी तो मेरे हृदय की अवस्‍था बहुत ही करुण हो उठी थी। कुछ मिनटों तक मैं उस खोपड़ी को एकटक देखता रहा, जिसमें से ‘तत्‍व-संग्रह’ जैसा महान दार्शनिक ग्रंथ निकला और जिसमें पचहत्तर वर्ष की उमर में भी हिमालय पार करके तिब्‍बत जाने की हिम्‍मत थी। परंतु शांतरक्षित गुमनाम नहीं मरे। उन्‍होंने स्वयं अपनी यात्रा नहीं लिखी, लेकिन दूसरों ने महान आचार्य बोधिसत्‍व के बारे में काफ़ी लिखा है।

ऐसी भी खोपड़ियों का निराकार रूप में साक्षात्‍कार हुआ है, जो दुनिया घूमते-घूमते गुमनाम ही चली गईं। निजनीनवोग्राद में गए उस भारतीय घुमक्कड़ के बारे में किसी को पता नहीं कि वह कौन था, किस शताब्‍दी में गया था, न यही मालूम कि वह कहाँ पैदा हुआ था, और कैसे-कैसे चक्‍कर काटता रहा। यह सारी बातें उसके साथ चली गईं। वर्तमान शताब्‍दी के आरम्भ में एक रूसी उपन्‍यासकार को निजनीनवोग्राद की भौगोलिक और सामाजिक पृष्‍ठभूमि को लिए एक उपन्‍यास लिखने की इच्‍छा हुई। उसी ने वहाँ एक गुप्‍त सम्प्रदाय का पता लगाया, जो बाहर से अपने को ईसाई कहता था, लेकिन लोग उस पर विश्‍वास नहीं करते थे। उपन्‍यासकार ने उनके भीतर घुसकर पूजा के समय गाए जाने वाले कुछ गीत जमा किए। वह गीत यद्यपि कई पीढ़ियों से भाषा से अपरिचित लोगों द्वारा गाए जाते थे, इसलिए भाषा बहुत विकृत हो चुकी थी, तो भी इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं, कि वह हिन्दी भाषा के गीत थे और उनमें गौरी तथा महादेव की महिमा गायी गई थी। उपन्‍यासकार ने लिखा है कि उसके समय (बीसवीं शताब्‍दी के आरम्भ में) इस पंथ की संख्‍या कई हज़ार थी, उसका मुखिया जार की सेना का एक कर्नल था। मालूम नहीं क्रांति की आँधी में वह पंथ कुछ बचा या नहीं, किंतु ख़याल कीजिए—कहाँ भारत और कहाँ मध्‍य वोल्‍गा में आधुनिक गोरकी और उस समय का निजनीनवोग्राद। निजनीनवोग्राद (निचला नया नगर) में दुनिया का सबसे बड़ा मेला लगता था, जिसमें यूरोप ही नहीं, चीन, भारत तक के व्‍यापारी पहुँचते थे। जान पड़ता है, मेले के समय वह फक्‍कड़ भारतीय वहाँ पहुँचा गया। फक्‍कड़ बाबा के लिए क्या बात थी? यदि वह कहीं दो-चार साल के लिए रम जाता तो वहाँ उसकी समाधि होती। फिर तो उपन्‍यासकार अवश्य उसका वर्णन करता। ख़ैर, भारतीय घुमक्कड़ ने रूसी परिवारों में से कुछ को अपना ज्ञान-ध्‍यान दिया। भाषा का इतना परिचय हो कि वह वेदांत सिखलाने की कोशिश करे, यह सम्भव नहीं मालूम होता। वेदांत सिखलाने वाले को हर-गौरी के गीतों पर अधिक ज़ोर देने की आवश्‍यकता नहीं होती। फक्‍कड़ बाबा के पास कोई चीज़ थी, जिसने वोल्‍गा तट के ईसाई रूसियों को अपनी ओर आकृष्‍ट किया, नहीं तो वह इकट्ठा होकर पूजा करते हर-गौरी का गीत क्‍यों गाते? सम्भव है फक्‍कड़ बाबा को योग और त्राटक के लटके मालूम हों। ये अमोल अस्‍त्र हैं जिन्‍हें लेकर हमारे आज के कितने ही सिद्ध पुरुष यूरोपियन शिक्षितों को दंग करते हैं। फिर सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्‍दी में यदि फक्‍कड़ बाबा ने लोगों को मुग्‍ध किया हो, अथवा आत्मिक शांति दी हो, तो क्या आश्‍चर्य? वोल्‍गा तक फक्‍कड़ बाबा भी निरुद्देश्‍य गया, लेकिन निरुद्देश्‍य रहते भी वह कितना काम कर गया? पश्चिमी यूरोप के लोग उन्‍नीसवीं-बीसवीं सदी में जिस तरह भारतीयों को नीची निगाह से देखते थे, रूसियों का भाव वैसा नहीं था। क्या जाने उसका कितना श्रेय फक्‍कड़ बाबा जैसे घुमक्कड़ों को है? इसलिए निरुद्देश्‍य घुमक्कड़ से हमें हताश होने की आवश्‍यकता नहीं है।

तीस बरस से भारत से गए हुए एक मित्र जब पहली बार मुझे रूस में मिले, तो गद्गद् होकर कहने लगे—”आपके शरीर से मातृभूमि की सुगंध आ रही है।”

हर एक घुमक्कड़ अपने देश की गंध ले जाता है। यदि वह उच्‍च श्रेणी का घुमक्कड़ नहीं हो तो वह दुर्गंध होती है, किंतु हम निरुद्देश्‍य से दुर्गंध पहुँचाने की आशा नहीं रखते। वह अपने देश के लिए अभिमान करेगा। भारत जैसी मातृभूमि पाकर कौन अभिमान नहीं करेगा? यहाँ हज़ारों चीज़ें हैं, जिन पर अभिमान होना ही चाहिए।

गर्व में आकर दूसरे देश को हीन समझने की प्रवृत्ति हमारे घुमक्कड़ की कभी नहीं होगी, यह हमारी आशा है और यही हमारी परम्परा भी है।

हमारे घुमक्कड़ असंस्‍कृत देश में संस्‍कृति का संदेश लेकर गए, किंतु इसलिए नहीं कि जाकर उस देश को प्रताड़ित करें। वह उसे भी अपने जैसा संस्कृत बनाने के लिए गए। कोई देश अपने को हीन न समझे, इसी का ध्‍यान रखते उन्‍होंने अपने ज्ञान-विज्ञान को उसकी भाषा की पोशाक पहनायी, अपनी कला को उसके वातावरण का रूप दिया। मातृभूमि का अभिमान पाप नहीं हैं, यदि वह दुरभिमान नहीं हो। हमारा घुमक्कड़ निरुद्देश्‍य होने पर भी अपने को देश का प्रतिनिधि समझेगा, और इस बात की कोशिश करेगा कि उससे कोई ऐसी बात न हो, जिससे उसकी जन्‍मभूमि और घुमक्कड़-पंथ लांछित हों। वह समझता है, इस निरुद्देश्‍य घुमक्कड़ी में मातृभूमि की दी हुई हड्डियाँ न जाने किस पराये देश में बिखर जाएँ, देश की इस थाती को पराये देश में डालना पड़े, इस ऋण का ख़याल करके भी घुमक्कड़ सदा अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञ बनने की कोशिश करेगा।

बिना किसी उद्देश्‍य के पृथ्‍वी-पर्यटन करना, यह भी छोटा उद्देश्‍य नहीं है। यदि किसी ने बीस-बाईस साल की आयु में भारत छोड़ दिया और छओं महाद्वीपों के एक-एक देश में घूमने का ही संकल्‍प कर लिया, तो यह भी अप्रत्‍यक्ष रूप से कम लाभ की चीज़ नहीं है। ऐसे भी भारतीय घुमक्कड़ पहले हुए हैं, और एक तो अब भी जीवित है। उसकी कितनी ही बातें मैंने यूरोप के लोगों के मुँह से सुनीं। कई बातें तो विश्‍वसनीय नहीं हैं। सोलह-अठारह बरस की उमर में विश्‍वविद्यालय से दर्शन का डाक्‍टर होना—सो भी प्रथम विश्‍वयुद्ध के पहले, यह विश्‍वास की बात नहीं है। ख़ैर, उसके दोषों से कोई मतलब नहीं। उसने घुमक्कड़ी बहुत की है। शायद पैंतीस-छत्तीस बरस उसे घूमते ही हो गए, और अमेरिका, यूरोप, तथा अटलांटिक और प्रशांत महासागर के द्वीपों को उसने कितनी बार छान डाला, इसे कहना मुश्किल है। अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, स्‍पेनिश आदि भाषाएँ उसने घूमते-घूमते सीखीं। वह इसी तरह घूमते-घूमते एक दिन कहीं चिरनिद्रा-विलीन हो जाएगा और न अपने न परायों को याद रहेगा, कि लास्‍सेकंक्रकरिया नाम का एक अनथक निर्भय घुमक्कड़ भी भारत में पैदा हुआ था। तो भी वह शिक्षित और संस्कृत घुमक्कड़ है, इसलिए उसने अपनी घुमक्कड़ी में ब्राजील, क्‍यूबा, फ़्रांस और जर्मनी के कितने लोगों पर प्रभाव डाला होगा, इसे कौन बतला सकता है? और इसी तरह का एक घुमक्कड़ 1932 में मुझे लंदन में मिला था। वह हमीरपुर ज़िले का रहनेवाला था। नाम उसका शरीफ़ था। प्रथम विश्‍वयुद्ध के समय वह किसी तरह इंग्लैंड पहुँचा। उसके जीवन के बारे में मालूम न हो सका, किंतु जब मिला था तब से बहुत पहले ही से वह एकांत घुमक्कड़ी कर रहा था, और सो भी इंग्लैंड जैसे भौतिकवादी देश में। इंग्लैंड, स्‍काटलैंड और आयरलैंड में साल में एक बार ज़रूर वह पैदल घूम आता था। घूमते रहना उसका व्रत था। कमाने का बहुत दिनों से उसने नाम नहीं लिया। भोजन का सहारा भिक्षा थी। मैंने पूछा—”भिक्षा मिलने में कठिनाई नहीं होती? यहाँ तो भीख माँगने के ख़िलाफ़ कानून है।”

शरीफ़ ने कहा—”हम बड़े घरों में माँगने नहीं जाते, वह कुत्ता छोड़ देते हैं या टेलिफ़ोन करके पुलिस को बुला लेते हैं। हमें वह गलियाँ और सड़कें मालूम हैं, जहाँ ग़रीब और साधारण आदमी रहते हैं। घरों के लेटर-बक्‍स पर पहले के घुमक्कड़ चिह्न कर देते हैं, जिससे हमें मालूम हो जाता है कि यहाँ डर नहीं है और कुछ मिलने की आशा है।”

शरीफ़ रंग-ढंग से आत्‍म-सम्‍मानहीन भिखारी नहीं मालूम होता था। कहता था—”हम जाकर किवाड़ पर दस्‍तक लगाते या घंटी दबाते हैं। किसी के आने पर कह देते हैं—क्या एक प्‍याला चाय दे सकती हैं? आवश्‍यकता हुई तो कह दिया, नहीं तो चाय के साथ रोटी का टुकड़ा भी आ जाता है।”

शहरों में भी यद्यपि शरीफ़ को घुमक्कड़ी ले जाती थी, किंतु वह लंदन जैसे महानगरों से दूर रहना अधिक पसंद करता था। सोने के बारे में कह रहा था—”रात को सार्वजनिक उद्यानों के फाटक बंद हो जाते हैं, इसलिए हम दिन ही में वहाँ घास पर पड़कर सो लेते हैं।”

शरीफ़ ने यह कहा—”चलें तो इस समय मैं रीजेंट पार्क में पचासों घुमक्कड़ों को सोया दिखला सकता हूँ। रात को घुमक्कड़ शहर की सड़कों पर घूमने में बिता देते हैं।”

वहीं एक अंग्रेज़ घुमक्कड़ से भी परिचय हुआ। कई सालों तक वह घुमक्कड़ी के पथ पर बहुत कुछ शरीफ़ के ढंग पर रहा, पर इधर पढ़ने का चस्‍का लग गया। लंदन में पुस्‍तकें सुलभ थीं और एक चिरकुमारी ने अपना सहवास दे दिया था, इस प्रकार कुछ समय के लिए उसने घुमक्कड़ी से छुट्टी ले ली थी।

ऐसे लोग भी निरुद्देश्‍य घुमक्कड़ कहे जा सकते हैं। पर उन्‍हें ऊँचे दर्जे का घुमक्कड़ नहीं मान सकते, इसलिए नहीं कि वह बुरे आदमी हैं। बुरा आदमी नि‍श्चिंततापूर्वक दस-पंद्रह साल घुमक्कड़ी कैसे कर सकता है? उसे तो जेल की हवा खानी पड़ेगी। बड़े घुमक्कड़ इसलिए नहीं थे कि उन्‍होंने अपने घूमने का स्‍थान दो टापुओं में सीमित रखा था। छओं द्वीप—एशिया, यूरोप,अफ़्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया—जिसकी जागीर हों, वह बड़ा घुमक्कड़ कहा जा सकता है। एशियाइयों के लिए छओं द्वीपों में कितने ही स्‍थान बंद हैं, इसलिए वह वहाँ नहीं पहुँच सकते, तो इससे घुमक्कड़ का बड़प्‍पन कम नहीं होता।

निरुद्देश्‍य घुमक्कड़ कोई उद्देश्‍य न रखकर भी एक काम तो कर सकता है—वह घुमक्कड़-पंथ के प्रति लोगों में सम्‍मान और विश्‍वास पैदा कर सकता है, सारे घुमक्कड़ों में घनिष्‍ठ भ्रातृभाव पैदा कर सकता है। यह काम वह अपने आचरण से कर सकता है। आज दुनिया में संगठन का ज़माना है। ‘संघे शक्ति: कलौ युगे’, इसलिए यदि घुमक्कड़ संगठन की आवश्‍यकता महसूस करने लगे, तो कोई आश्‍चर्य नहीं। किंतु किसी बाक़ायदा घुमक्कड़-संगठन की आवश्‍यकता नहीं है। हर एक घुमक्कड़ के भीतर भ्रातृभावना छिपी हुई है, यदि वह थोड़ा एक-दूसरे के सम्पर्क में और आएँ-जाएँ, तो यही संगठन का काम करेगा। स्वस्‍थ घुमक्कड़ के हाथ-पैर चल रहे हैं, उस वक़्त उसको चिंता नहीं हो सकती। बीमार हो जाने पर अवश्य बिना हित-मित्र, बिना गाँव-देश के उसे आश्रयहीन होना पड़ता है। यद्यपि उसकी चिंता से कभी घुमक्कड़-पंथ में आने वालों की कमी नहीं हुई, तो भी ऐसे समय घुमक्कड़ की घुमक्कड़ के प्रति सहानुभूति और सहायता होनी चाहिए। ऐसे समय के लिए अपने भक्‍त और अनुयायियों में उन्‍हें ऐसी भावना पैदा करनी चाहिए कि किसी भी घुमक्कड़ को सहायता मिल जाए। घुमक्कड़ मठ और आश्रम बनाकर कहीं एक जगह बस जाएगा, वह दुराशा मात्र है, किंतु घुमक्कड़ी-पंथ से सम्बन्ध रखने वाले जितने मठ हैं, उनमें ऐसी भावना भरी जाए, जिसमें घुमक्कड़ को आवश्‍यकता पड़ने पर विश्राम, स्‍थान मिल सके।

आने वाले घुमक्कड़ों के रास्‍ते को साफ़ रखना, यह भी हर एक घुमक्कड़ का कर्तव्‍य है।

यदि इतने का भी ध्‍यान निरुद्देश्‍य घुमक्कड़ रखें, तो मैं समझता हूँ, वह अपने समाज का सहायक हो सकता है। हज़ारों निरुद्देश्‍य घुमक्कड़ घर छोड़कर निकल जाते हैं। यदि आँखों के सामने किसी माँ का पूत मर जाता है तो वह किसी तरह रो-धोकर संतोष कर लेती है, किंतु भागे हुए घुमक्कड़ी की माता वैसा नहीं कर सकती। वह जीवन-भर आशा लगाए बैठी रहती है। विवाहिता पत्‍नी और बंधु-बांधव भी आशा लगाए रहते हैं कि कभी वह भगोड़ा फिर घर आएगा। कई बार इसके विचित्र परिणाम पैदा होते हैं। एक घुमक्कड़ घूमते-घामते किसी अपरिचित गाँव में चला गया। लोगों में कानाफूसी हुई। उसे बड़ी आवभगत से एक द्वार पर रखा गया। घुमक्कड़ उनके हाथ की रसोई नहीं खा सकता था, इसलिए भोजन का सारा सामान और बर्तन दिया गया। भोजन खाते-खाते घुमक्कड़ को समझने में देर न लगी कि उसको घेरा जा रहा है। शायद उस गाँव का कोई एक तरुण दस-बारह साल से भाग गया था। उसकी स्‍त्री घर में थी। उक्‍त तरुण ने किसी बहाने गाँव से भागने में सफलता पायी। लोग उसके इंकार करने पर भी यह मानने के लिए तैयार न थे कि वह वही आदमी नहीं है।

आरा ज़िले में तो यहाँ तक हो गया कि लोगों ने इंकार करने पर भी एक घुमक्कड़ को मजबूर किया। भाग्य पर छोड़कर घुमक्कड़ बैठ गया। जिसके नाम पर बैठा था, उसके नाम पर उसने एक संतान पैदा की, फिर असली आदमी आ गया। ऐसी स्थिति न पैदा करने के लिए घुमक्कड़ क्या कर सकता था? वह जगह-जगह से चिट्ठी कैसे-लिख सकता था कि मैं दूर हूँ। चिट्ठी लिखना भी लोगों के दिल में झूठी आशा पैदा करना है।

निरुद्देश्‍य घुमक्कड़ होने का बहुतों का मौक़ा मिलता है। घुमक्कड़-शास्त्र अभी तक लिखा नहीं गया था, इसलिए घुमक्कड़ी का क्या उद्देश्‍य है, यह कैसे लोगों को पता लगता? अभी तक लोग घुमक्कड़ी को साधन मानते थे, और साध्‍य मानते थे मुक्ति—देव-दर्शन को, लेकिन घुमक्कड़ी केवल साधन नहीं, वह साथ ही साध्‍य भी है। निरुद्देश्‍य निकलने वाले घुमक्कड़ आजन्‍म निरुद्देश्‍य रह जाएँ, खूँटे से बँधें नहीं, तो भी हो सकता है कि पीछे कोई उद्देश्‍य भी दिखायी पड़ने लगे। सोद्देश्‍य और निरुद्देश्‍य जैसी भी घुमक्कड़ी हो, वह सभी कल्‍याणकारिणी हैं।

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राहुल सांकृत्यायन
राहुल सांकृत्यायन जिन्हें महापंडित की उपाधि दी जाती है हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे। वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए। वह हिंदी यात्रासहित्य के पितामह कहे जाते हैं। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था। इसके अलावा उन्होंने मध्य-एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।