आज से बहुत वर्ष पहले की बात है।

लंदन की किसी गली में फिलास फौन नाम के एक सज्जन रहते थे। अजीब मस्त-मौला स्वभाव के धुनी आदमी थे। जब जो भी मन में आता, वही कर बैठते। जिधर को जी चाहता, उधर ही को मुंह उठा कर चल देते। काम-धाम कुछ था नहीं। दिन भर अखबार पढ़ना, गपशप करना, दोस्तों के साथ ताश खेलना और अड्डे मारना- यही उनका काम थी। अपने इसी सनकीपन के कारण वे अपने यार-दोस्तों में ‘सैलानी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये थे। हमें भी उनका यह नाम बिल्कुल ठीक जँचता है। इसलिए हम भी उन्हें फिलास फौन न कह कर सैलानी ही कहेंगे।

हाँ, तो सैलानी अपने घर में अकेले ही थे। जोरू न जाँता, बस खुदा से नाता। बस, एक नौकर था। सो एक दिन उस पर नाराज होकर आपने उसे निकाल बाहर किया। बेचारे नौकर का कुसूर सिर्फ इतना था कि वह सेनानी के कहे अनुसार उनकी हजामत के लिए खूब उबलता हुआ पानी न लाकर कुछ कम गरम पानी ले आया था। नौकर भला आदमी था। उसे जब मालिक ने निकाल दिया तो उसने सोचा कि एक नौकर के बिना मालिक को तकलीफ होगी, सो मालिक के सामने एक नया नौकर लाकर उसने खड़ा कर दिया।

सैलानी ने उससे पूछा, “क्यों जी, तुम्हारा नाम क्या है?”

उसने जवाब दिया, “मेरा नाम जीन है। लेकिन लोग मुझे हरफन मौला कहते हैं। क्योकि मैं हर फन में उस्ताद हूँ। हर जगह काम कर सकता हूँ। हर जगह जाने के लिये तैयार रहता हूँ।”

उसकी बात सुन कर सैलानी ने कहा, “अच्छी बात है। तुम्हारा नाम भी बड़ा अच्छा है। तुम आदमी भी बड़े काम के जँचते हो। क्या तुम मेरे घर नौकरी करोगे?”

“जी हाँ।”

“तुम्हे हमारी नौकरी की शर्तें मालूम हैं?”

“जी हाँ, आपके पुराने नौकर ने सब बता दिया है।”

“अच्छी बात है। तुम आज दूसरी अक्टूबर, बुधवार की दोपहर के साढ़े ग्यारह बजे से मेरे नोकर हुए। समझे।” इतना कह कर सैलानी ने अपनी टोपी उठायी और उसको अपने सिर पर रख कर बिना कुछ कहे सैर-सपाटे के लिये घर से बाहर निकल पड़े।

हरफन मौला जब घर में अकेला रह गया तो उसने सैलानी के मकान को ऊपर से ले कर नीचे तक, एक कोने से ले कर दूसरे कोने तक देखना-भालना शुरू कर दिया। उसके रहने के लिये ऊपर के जीने में जगह दी गयी थी। जगह उसको बहुत पसन्द आयी। नीचे के कोठे से उसकी कोठरी के लिये बिजली की घंटी और बात करने का चोगा लगा हुआ था। मेज के ऊपर एक घड़ी रखी हुई थी जो सैलानी के कमरे में रखी एक ठीक वैसी ही घड़ी से बिजली के तार द्वारा जुड़ी हुई थी। यह इसलिये कि जिससे दोनो घड़ियों की सुइयाँ हमेशा ठीक एक चाल से चलती रहें।

हरफन मौला के कमरे में घड़ी के पास एक तख्ती टंगी हुई थी। पढ़ने से मालूम हुआ कि उस तख्ती पर हरफन मौला के रोज के कामकाज का लेखा था। सवेरे के आठ बजे से लेकर, जब कि मैलानी सो कर उठते थे, दोपहर के साढ़े ग्यारह बजे तक, जब कि सैलानी ताश खेलने के लिये क्लब में जाते थे, उसे क्या-क्या काम करना पड़ेगा, यह सब उस तख्ती के ऊपर लिखा हुआ था- आठ बज कर तेइस मिनट पर चाय-पानी तैय्यार करना, नौ बज कर सैंतीस मिनट पर हजामत के लिये पानी गरम करना, दस बजने में बीस मिनट बाकी रहे तब उनके नहाने के लिये पानी रखना- इत्यादि, इत्यादि। उसी प्रकार दोपहर के साढ़े ग्यारह बजे से लेकर रात के बारह बजे तक का सारा काम-काज भी हरफन मौला को समझा दिया जाता था।