‘शहर से दस किलोमीटर’ ही वह दुनिया बसती है जो शहरों की न कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने सुखों, अपनी हरियाली और सूखों के साथ अपने आप में भरी-पूरी है। वहाँ खेत है, ज़मीन है, कुछ बंजर, कुछ पठार, कुछ उपजाऊ और उनसे जूझते, उनकी वायु में साँसें भरते लोग हैं, उनकी गाएँ-भैसें और कुत्ते हैं; और आपस में सबको जोड़नेवाली उनकी रिश्तेदारियाँ हैं, झगड़े हैं, शिकायते हैं, प्यार है! शहर से सिर्फ़ दस किलोमीटर परे की यह दुनिया हमारी ‘शहरवाली सभ्यता’ से स्वतंत्र हमारे उस देश की दुनिया है जो विकास की अनेक धाराओं में अपने पैर जमाने की कोशिशों में डूबता-उतराता रहता है। इसी जद्दोजहद के कुछ चेहरे और उनकी कहानियाँ शहर के बीचोबीच भी अपने पहियों, अपने पंखों पर तैरती मिल जाती हैं। नीलेश रघुवंशी का यह उपन्यास ‘शहर से दस किलोमीटर’ साइकिल के इश्क़ में डूबे एक जोड़ी पैरों की परिक्रमा के साथ खुलता है जो शहर के बीच से शुरू होती है और उसके दस किलोमीटर बाहर तक जाती है। यह शहर है भोपाल। पहाड़ी चढ़ाइयों और उतराइयों को सड़कों की संयत भाषा में व्याख्यायित करता शहर। सड़कों के किनारे अस्थायी टपरों में बसे लोग, तरह-तरह के कामों में लगे वे लोग जो शहरों में रहते हुए भी शहर से बाहर की अपनी पहचान को सँजोए रहते हैं। साइकिल सबका हाल-चाल दर्ज करती हुई घूमती रहती है। एक स्त्री की साइकिल, जिसका अपना एक इतिहास है, जो शहर की आपाधापी से दूर खेतों में, शहर के उन हिस्सों में बरबस निकल जाती है जहाँ शहर तो है लेकिन उसकी कोई ख़ूबी नहीं है। गाँवों की सरहदों का अतिक्रमण करता शहर यहाँ उन लोगों से बहुत बेरहम व्यवहार करता है जो गाँवों की साधनहीनता से भागकर शहर का हिस्सा होने आए हैं।

उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, प्रस्तुत है एक अंश—

चाँद ने मुझे कहना सिखाया। जब उसकी ओर देखकर पहली बार कहा— “हे प्रभु, तूने मुझे चाँद-तारों-सा जीवन क्यों न दिया।” तो तारों के साथ वह बहुत ज़ोर से हँसा। मैंने फिर कहा— “मुझे कुछ नहीं चाहिए और सब कुछ चाहिए, आधा चाँद भी पूरा चाहिए।” सुनते ही वह छिप गया। उसके छिपते ही एक लम्बी ठण्डी साँस छोड़ते बुदबुदायी— “सारा का सारा नहीं मिलता, कुछ भी।” सुनते ही वह उजागर हो गया। इतना कि हर चीज़ चमकने लगी। उस रात उसने लुका-छिपी का खेल नहीं खेला। मैं चाँद को देखते हुए चाँद के घर में रहने लगी।

और

जब पहली बार साइकिल को देखा तो लगा कि यही है वह, जो ज़मीन पर रहते हुए, ज़मीन से ऊपर उठाकर उस तक पहुँचाएगी। साइकिल सपनों की नसैनी बन गई, जिस पर चढ़कर चाँद को छूना था।

वो भी क्या दिन थे, जब एक मोहल्ले में नहीं, बल्कि दो-चार मोहल्लों में एक साइकिल हुआ करती थी और शहर में कई नहीं, कुछ साइकिल थीं! उन दिनों साइकिल प्रतिष्ठा नहीं, सपनों की प्रतीक हुआ करती थी। कोई भी किसी को भी अपनी साइकिल सिर्फ़ देखने ही नहीं, बल्कि छू भी लेने देता था और कभी-कभार एकाध चक्कर भी काट लेने देता था।

काले रंग की वो डंडे वाली साइकिल, जिसने सपनों में और जीवन में काले रंग की चमक को जगह दी और जिसने सिखाया कि डंडे के ऊपर पाँव डालना सीख लिया, तो समझो कि अँधेरा मन का वहम है, जिसे कभी भी उचककर या उलाँघकर दूर किया जा सकता है। किराए से साइकिल देने वाले धनकुबेर के पास एक नहीं, दस-बारह साइकिल होती थीं और सबके वश की बात न होती थी कि वह यूँ ही चक्कर काटने के लिए किराए की साइकिल ले ले।

उन दिनों काले रंग की डंडा साइकिल ही छोटे-बड़े सब चलाया करते थे। उसका क़द निश्चित था, आपका क़द चाहे कुछ भी हो। छोटे क़द वालों के पाँव ज़मीन पर न टिक पाते थे और लम्बे क़द वाले बड़ी शान से साइकिल चलाया करते थे। उनके पाँव जो टिकते थे। उन्हें उचककर साइकिल पर नहीं बैठना पड़ता था, और न उतरने के लिए कूदना पड़ता था। लम्बे क़द वाले शेखी बघारते हुए पोज़ मारते थे। वे घंटों खड़ी साइकिल पर बैठे हुए बतियाते रहते। फिर पैडल मारकर थोड़ी दूर चलते और अचानक बीच सड़क पर यूँ ही रुक जाते।

किसी को साइकिल चलाते देखते हुए मन ही मन उसकी साइकिल पर उचककर बैठ जाना और पाँव न पहुँचने पर एक पैडल को ज़ोर से मारते हुए, दूसरे पैडल के आने तक पाँव को तैयार रखते हुए मन में मन की साइकिल चलती। दो पैडल, दो पाँव, दो चक्कों के बीच घूमते मन को सम्भालकर रखना बड़े जीवट की बात थी।

ऐसा लगता कि जीवन का सर्वश्रेष्ठ दिन वह होगा, जब कैंची चलाते हुए डंडे से सीट पर बैठ पैडल मारते हुए बहुत दूर निकल जाऊँगी। सारे शहर में घूमूँगी। भीड़ भरे इलाक़ों में भी, भीड़ में होते हुए भी साइकिल भीड़ से अलग जो कर देगी।

बचपन में छोटे-छोटे पाँव बड़े-बड़े पंख होते हैं। उस समय कोई भी चिड़िया के घोंसले को तोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता। जब सब कुछ नष्ट हो जाएगा, तब भी उड़ने की इच्छा बची रह जाएगी। एकदम क़रीब से चाँद को देखना था। अभी तक दूर से देखते थे। अब साइकिल एकदम पास से दिखाएगी। इतने पास से कि हमारी साँसें एक हो जाएँगी।

साइकिल के चलते हुए चक्कों को देख कभी सोचती कि डूब क्षेत्र में बस जाना है। डूब जाना है और पानी के उतर जाने पर पानी पर खड़े हो जाना है। पुलिया के उस पार साइकिल ही ले जाएगी। वो नाव जिसे मछुआरे किनारे छोड़ गए। जो कहीं न जा पाने के कारण उदास है। उस पर कुछ देर बैठ जाना है और फिर उस पार चले जाना है।

सड़क किनारे के आख़िरी पेड़ से टिककर सोचा करती कि नाव को साइकिल पर सवार करूँ या साइकिल पर नाव को बिठाकर उस पार चली जाऊँ। शायद उस पार जाकर नाव का मन हल्का हो जाए। उस पार जाने का मेरा भी बहुत मन है। जब उस पार जाऊँ, तो लोग इस पार के बारे में पूछें और लौटकर इस पार आऊँ तो सब उस पार के बारे मे पूछें। सब मुझे घेर लें और— “बतलाओ, तो नदी का पानी वहाँ कैसा है? चाँद जैसा यहाँ है, वैसा ही वहाँ है कि कुछ गड़बड़ करता है। क्या यहाँ की तरह वहाँ भी कभी पूरा, तो कभी आधा निकलता है? हँसिए की धार की तरह नुकीला या गले में, काले धागे में बँधे ताबीज़ की तरह? उस पार की बोली-बानी कैसी है? वहाँ का नदी किनारा हमारे किनारे से अच्छा तो नहीं है न? हो ही नहीं सकता।” जैसे अनगिनत सवालों से घिर जाऊँ।

और फिर मैं कहूँ कि— “मैंने उस ओर वालों से यह सब पूछा था, तो वो कहते थे कि बाप-दादों से, नानी-दादी से सुनते आए हैं कि इस पार और उस पार में कोई फ़र्क़ नहीं है। दरअसल दोनों पार एक ही हैं। देखो न, नदी का रंग और पानी एक है। खेत-खलिहान और पशु-पक्षी भी एक हैं। फ़सल भी एक जैसी है और चाँद… उसको देखकर तो लगा ही नहीं कि वो आज इस पार नहीं, उस पार उगा है। कोई इस पार, उस पार नहीं है। इस ओर, उस ओर भी नहीं है। इस ओर भी खंडहर हैं, उस ओर भी खंडहर हैं। इस ओर भी चट्टान हैं, उस ओर भी चट्टान हैं। यहाँ भी चट्टान पर कपड़ों के संग गीले मन सूखते हैं। वहाँ भी चट्टान पर अकेले कपड़े नहीं सूखते हैं।” क्या कमाल का जवाब होगा!

फिर लोग पूछेंगे— “हमारी बातें, हमारी चीज़ें तुम्हारी ओर कैसे पहुँच जाती हैं? हम लोग तो कभी मिले नहीं? न इस ओर वाले उस ओर गए और न उस ओर वाले इस ओर आए? फिर ऐसा कैसे हो गया कि हमारे स्वभाव एक से हैं? हमारा हँसना-रोना और सुख-दुख सब एक से हैं?”

मैं कहूँगी— “साइकिल से! साइकिल के इन चक्कों से!” सब घूम-घूमकर आश्चर्यचकित हो साइकिल के घूमते पहियों को देखने लगेंगे। मैं फिर कहूँगी— “चिड़ियों से चिड़ियों का कमाल है ये। जिस तरह चोंच में दबाकर तुलसी और नीम ले आती हैं, बिल्कुल वैसे ही हमारी, तुम्हारी बातें ले जाती हैं। बोली-बानी ले जाती हैं।” सब आकाश में उड़ती चिड़िया को देखने लगेंगे।

गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' से कुछ उद्धरण

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