रहता तो सब कुछ वही है
ये पर्दे, यह खिड़की, ये गमले…
बदलता तो कुछ भी नहीं है।

लेकिन क्या होता है
कभी-कभी
फूलों में रंग उभर आते हैं
मेज़पोश-कुशनों पर कढ़े हुए
चित्र सभी बरबस मुस्काते हैं,
दीवारें : जैसे अब बोलेंगीं
आसपास बिखरी किताबें सब
शब्द-शब्द
भेद सभी खोलेंगीं।
अनजाने होठों पर गीत आ जाता है।

सुख क्या यही है?
बदलता तो किंचित नहीं है,
ये पर्दे, यह खिड़की, ये गमले…