Tag: Agyeya

Agyeya

कतकी पूनो

छिटक रही है चाँदनी मदमाती उन्मादिनी कलगी-मौर सजाव ले कास हुए हैं बावले पकी ज्वार से निकल शशों की जोड़ी गयी फलाँगती सन्नाटे में बाँक नदी की जगी चमक...

बावरा अहेरी

भोर का बावरा अहेरी पहले बिछाता है आलोक की लाल-लाल कनियाँ पर जब खींचता है जाल को बाँध लेता है सभी को साथ : छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े...
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सागर मुद्रा

सागर के किनारे हम सीपियाँ-पत्थर बटोरते रहे, सागर उन्हें बार-बार लहर से डुलाता रहा, धोता रहा। फिर एक बड़ी तरंग आयी सीपियाँ कुछ तोड़ गयी, कुछ रेत में दबा गयी, पत्थर...
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हरी घास पर क्षण भर

'Hari Ghas Par Kshan Bhar', a poem by Agyeya आओ बैठें इसी ढाल की हरी घास पर। माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है, और घास तो अधुनातन मानव-मन...
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कितनी नावों में कितनी बार

कितनी दूरियों से कितनी बार कितनी डगमग नावों में बैठ कर मैं तुम्हारी ओर आया हूँ ओ मेरी छोटी-सी ज्योति! कभी कुहासे में तुम्हें न देखता भी पर कुहासे...
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यह दीप अकेला

यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा? पनडुब्बा : ये...
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हिरोशिमा

एक दिन सहसा सूरज निकला अरे क्षितिज पर नहीं, नगर के चौक : धूप बरसी पर अन्तरिक्ष से नहीं, फटी मिट्टी से। छायाएँ मानव-जन की दिशाहीन सब ओर पड़ीं—वह सूरज नहीं उगा था पूरब...
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विपथगा

"कोढ़ का रोगी जब डॉक्टर के पास जाता है, तो यही कहता है कि मेरा रोग छुड़ा दो। यह नहीं पूछता कि इस रोग को दूर करके इसके बदले मुझे क्या दोगे! क्रान्ति एक भयंकर औषध है, यह कड़वी है, पीड़ाजनक है, जलाने वाली है, किन्तु है औषध। रोग को मार अवश्य भगाती है। किन्तु इसके बाद, स्वास्थ्य-प्राप्ति के लिए जिस पथ्य की आवश्यकता है, वह इसमें खोजने पर निराशा ही होगी, इसके लिए क्रान्ति को दोष देना मूर्खता है।"
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जो पुल बनाएँगे

जो पुल बनाएँगे वे अनिवार्यतः पीछे रह जाएँगे। सेनाएँ हो जाएँगी पार मारे जाएँगे रावण जयी होंगे राम, जो निर्माता रहे इतिहास में बन्दर कहलाएँगे! अज्ञेय की कविता 'घृणा का गान' Book by Agyeya:
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