Tag: Anamika

Anamika

अयाचित

मेरे भण्डार में एक बोरा ‘अगला जनम’ ‘पिछला जनम’ सात कार्टन रख गई थी मेरी माँ।चूहे बहुत चटोरे थे घुनों को पता ही नहीं था कुनबा सीमित रखने का...
Anamika

पतिव्रता

जैसे कि अंग्रेज़ी राज में सूरज नहीं डूबा था, इनके घर में भी लगातार दकदक करती थी एक चिलचिलाहट।स्वामी जहाँ नहीं भी होते थे होते थे उनके वहाँ पँजे, मुहर,...
Anamika

कुछ तो

कुछ तो हो! कोई पत्ता तो कहीं डोले कोई तो बात होनी चाहिए अब ज़िन्दगी में बोलने में समझने जैसी कोई बात चलने में पहुँचने जैसी करने में हो जाने...
Anamika

चौका

मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी। ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़। भूचाल बेलते हैं घर। सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर।रोज़ सुबह सूरज में एक नया उचकुन लगाकर, एक नयी धाह...
Anamika

मौसियाँ

वे बारिश में धूप की तरह आती हैं— थोड़े समय के लिए और अचानक! हाथ के बुने स्वेटर, इन्द्रधनुष, तिल के लड्डू और सधोर की साड़ी लेकर वे...
Anamika

प्रेम के लिए फाँसी

मीरा रानी तुम तो फिर भी ख़ुशक़िस्मत थीं, तुम्हें ज़हर का प्याला जिसने भी भेजा, वह भाई तुम्हारा नहीं थाभाई भी भेज रहे हैं इन दिनों ज़हर के...
Anamika

ओढ़नी

मैट्रिक के इम्तिहान के बाद सीखी थी दुल्हन ने फुलकारी! दहेज की चादरों पर माँ ने कढ़वाए थे तरह-तरह के बेल-बूटे, तकिए के खोलों पर 'गुडलक' कढ़वाया था! कौन माँ नहीं...

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Abstract, Time

चींटी और मास्क वाले चेहरे

स्वप्न में दिखती है एक चींटी और मास्क वाले चेहरे चींटी रेंगती है पृथ्वी की नाल के भीतर मास्क वाले चेहरे घूमते हैं भीड़ मेंसर से...
Abstract, Woman

जीवन सपना था, प्रेम का मौन

जीवन सपना था आँखें सपनों में रहीं और सपने झाँकते रहे आँखों की कोर से यूँ रची हमने अपनी दुनिया जैसे बचपन की याद की गईं कविताएँ हमारा दुहराया...
Kedarnath Singh

फ़र्क़ नहीं पड़ता

हर बार लौटकर जब अन्दर प्रवेश करता हूँ मेरा घर चौंककर कहता है 'बधाई'ईश्वर यह कैसा चमत्कार है मैं कहीं भी जाऊँ फिर लौट आता हूँसड़कों पर परिचय-पत्र माँगा...
Naveen Sagar

वह मेरे बिना साथ है

वह उदासी में अपनी उदासी छिपाए है फ़ासला सर झुकाए मेरे और उसके बीच चल रहा हैउसका चेहरा ऐंठी हुई हँसी के जड़वत् आकार में दरका है उसकी आँखें बाहर...
Nurit Zarchi

नूइत ज़ारकी की कविता ‘विचित्रता’

नूइत ज़ारकी इज़राइली कवयित्री हैं जो विभिन्न साहित्य-सम्बन्धी पुरस्कारों से सम्मानित हैं। प्रस्तुत कविता उनकी हीब्रू कविता के तैल गोल्डफ़ाइन द्वारा किए गए अंग्रेज़ी...
Sunset

कितने प्रस्थान

सूरज अधूरी आत्महत्या में उड़ेल आया दिन-भर का चढ़ना उतरते हुए दृश्य को सूर्यास्त कह देना कितना तर्कसंगत है यह संदेहयुक्त है अस्त होने की परिभाषा में कितना अस्त हो जाना दोबारा...
Naresh Mehta

कवच

मैं जानता हूँ तुम्हारा यह डर जो कि स्वाभाविक ही है, कि अगर तुम घर के बाहर पैर निकालोगे तो कहीं वैराट्य का सामना न हो जाए, तुम्हें...
Vishesh Chandra Naman

मैं

मैं एक तीर था जिसे सबने अपने तरकश में शामिल किया किसी ने चलाया नहींमैं एक फूल था टूटने को बेताब सबने मुझे देखा, मेरे रंगों की तारीफ़ की और मैं...
Gaurav Bharti

कविताएँ: नवम्बर 2021

यात्री भ्रम कितना ख़ूबसूरत हो सकता है? इसका एक ही जवाब है मेरे पास कि तुम्हारे होने के भ्रम ने मुझे ज़िन्दा रखातुम्हारे होने के भ्रम में मैंने शहर...
God, Abstract Human

कौन ईश्वर

नहीं है तुम्हारी देह में यह रुधिर जिसके वर्ण में अब ढल रही है दिवा और अँधेरा सालता हैरोज़ थोड़ी मर रही आबादियों में रोज़ थोड़ी बढ़ रही...
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