Tag: Ankit Kumar Bhagat
धरतीपुत्रों के बारे में
मैंने देखा है उन्हें
शहरों से दूर,
तराई वाले इलाक़ों
और पहाड़ों की ऊँचाई पर
बने घरों में वास करते।
श्याम-वर्णित मुखड़े के पीछे
उनकी दंतावलियाँ
टिमटिमाती हैं—
तारक-शृंखलाओं के सदृश,
जैसे झरने...
वर्गभेद और अतीत की ग़लतियाँ
दुनिया के कई हिस्सों में
बनाए गए हैं नियम—
निर्गत करने को विशेषाधिकार।
निर्धारित हैं चंद कसौटियाँ
जिनसे आँका जा सकता है फ़र्क़।
शताब्दियों की ये क़वायदें
समाजीकरण की नहीं...
त्रासद काल
"लोग घरों से ना निकलें
टाल दिए जाएँ सारे आयोजन
चेहरे ढँककर चलें सभी-जन।"
सरकारी ऐलान हुआ है-
हम सामाजिक-दूरी बनाना सीख लें
कि सबकी भागीदारी से ही
टाला जा सकेगा
यह...
जब आप प्रेम में होते हैं
'Jab Aap Prem Mein Hote Hain', a poem by Ankit Kumar Bhagat
सूरज भी करता है प्रेम
अपनी किरणों से,
यद्यपि वह गोला है 'आग' का।
जबकि वो...
अंकित कुमार भगत की कविताएँ
Poems: Ankit Kumar Bhagat
प्रतिरोध
काले गुलाब
और स्याह परछाइयों के बाद,
कालिख पुती दीवारें
इस दौर की विशेषताएँ हैं।
अँधेरा गहराता ही जाता है,
कि असहमतियों को आज़माने की
इजाज़त नहीं यहाँ।
विद्रोह...
सर्दियों में ‘तुम’
'Sardiyon Mein Tum', a poem by Ankit Kumar Bhagat
तुम मेरे लिए सर्दियों की
सुगबुगाहट जैसी हो।
शरद पूर्णिमा के धवल चंद्र से..
बसंत पंचमी की सरसराती हवाओं...




