Tag: Jaishankar Prasad
तुम्हारी आँखों का बचपन
तुम्हारी आँखों का बचपन!
खेलता था जब अल्हड़ खेल,
अजिर के उर में भरा कुलेल,
हारता था हँस-हँस कर मन,
आह रे वह व्यतीत जीवन!
तुम्हारी आँखों का बचपन!
साथ...
कलावती की शिक्षा
लज्जा कभी न करना, यह पुरुषों की चालाकी है, जो उन्होंने इसे स्त्रियों के हिस्से कर दिया है। यह दूसरे शब्दों में एक प्रकार का भ्रम है, इसलिए तुम भी ऐसा रूप धारण करना कि पुरुष, जो बाहर से अनुकम्पा करते हुए तुमसे भीतर-भीतर घृणा करते हैं, वह भी तुमसे भयभीत रहें, तुम्हारे पास आने का साहस न करें।
हिमाद्रि तुंग शृंग से
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं-प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र- हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'
असंख्य...
दुखिया
हमारे समाज की जाति और वर्ग व्यवस्था हमेशा इसी तरह की रही है कि उच्च वर्ग के असंयमित व्यवहार और लापरवाही की सजा भी निम्न वर्ग ही भुगतता है, चाहे उसमें उसका लेश मात्र भी योगदान न हो.. मोहन की सहानुभूति भी दुखिया के लिए दुःख का कारण बनती है और अंत में वही होता है, जो हमेशा होता आया है..! पढ़िए! :)
तुम कनक किरन
तुम कनक किरन के अन्तराल में
लुक-छिपकर चलते हो क्यों?
नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौन्दर्य बता दो
मौन बने रहते...
भिखारिन
जाह्नवी अपने बालू के कम्बल में ठिठुरकर सो रही थी। शीत कुहासा बनकर प्रत्यक्ष हो रहा था। दो-चार लाल धारायें प्राची के क्षितिज में...
ग्राम
'ग्राम' - जयशंकर प्रसाद
टन! टन! टन! स्टेशन पर घंटी बोली।
श्रावण-मास की संध्या भी कैसी मनोहारिणी होती है! मेघ-माला-विभूषित गगन की छाया सघन रसाल-कानन में...
छोटा जादूगर
दूरदर्शन पर 'छोटा जादूगर' टेलीफिल्म शायद सभी ने देखी होगी! एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ की बीमारी के चलते, मेले में जीते हुए खिलौनों से अभिजात्य लोगों का मन बहलाने की कोशिशें करता हुआ और बदले में उसे ही शंका की नज़रों से देखा जाना.. यह कहानी चित्रों में जितने भाव उकेर दिया करती थी, पढ़ने में भी वही मर्म पाठकों के मन को बेध देता है!
छायावाद के प्रमुख स्तम्भ, कवि और कहानीकार जयशंकर प्रसाद की यह कहानी 'छोटा जादूगर' निस्संदेह हिन्दी साहित्य की एक अमूल्य कृति है! पढ़िए! :)
सुनहला साँप
'सुनहला साँप' - जयशंकर प्रसाद
''यह तुम्हारा दुस्साहस है, चन्द्रदेव!''
''मैं सत्य कहता हूँ, देवकुमार।''
''तुम्हारे सत्य की पहचान बहुत दुर्बल है, क्योंकि उसके प्रकट होने...
पुरस्कार
आज राष्ट्रवाद की आड़ में लोगों को स्वार्थी कहकर उनके विवेक पर प्रश्न उठाना आम बात है। फिर स्वार्थ की बात करें तो प्रेम से बड़ा स्वार्थ कोई है? लेकिन मधूलिका ने दोनों को साधा, यह इशारा किए बगैर कि उसकी मंशा किसी एक को भी साधने की है। पढ़िए जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध एवं उत्कृष्ट कहानी 'पुरस्कार'!
रूप की छाया
'Roop Ki Chhaya', a story by Jaishankar Prasad
काशी के घाटों की सौध-श्रेणी जाह्नवी के पश्चिम तट पर धवल शैलमाला-सी खड़ी है। उनके पीछे दिवाकर...

