‘ठेठ हिन्दी का ठाट’ की भूमिका में ठेठ हिन्दी की परिभाषा मैंने यह निश्चित् की है-

“जैसे शिक्षित लोग आपस में बोलते चालते हैं, भाषा वैसी ही हो, गँवारी न होने पावे। उसमें दूसरी भाषा अरबी, फारसी, तुर्की, अँगरेजी इत्यादि का कोई शब्द शुद्ध रूप या अपभ्रंश रूप में न हो। भाषा अपभ्रंश संस्कृत शब्दों से बनी हो, और यदि कोई संस्कृत शब्द उसमें आवे भी तो वही जो अत्यन्त प्रचलित हो, और जिसको एक साधारण जन भी बोलता हो।”

इस विषय में श्रीमान् डाक्टर जी० ए० ग्रियर्सन साहब क्या लिखते हैं, वह भी देखने योग्य है। ‘अधखिला फूल’ की प्राप्तिस्वीकार करते हुए आप अपने १७ जुलाई सन् १९०५ के पत्र में लिखते हैं-

ठेठ हिन्दी क्या है?

ठेठ हिन्दी संस्कृत की पौत्री है, हम यह कह सकते हैं कि संस्कृत की पुत्री प्राकृत और प्राकृत की पुत्री ठेठ हिन्दी है।

अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी भी दूसरी भाषाओं से शब्द ग्रहण करती है। जब वह किसी विशेष विचार को प्रकट करना चाहती है, और देखती है कि उसके पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं, उस समय वह प्रायः आवश्यक शब्द संस्कृत से उधार लेती है।

प्रत्येक ठेठ शब्द अर्थात् प्रत्येक वह शब्द जो कि प्राकृत-प्रसूत है, तद्भव कहलाता है। संस्कृत से उधार लिया हुआ प्रत्येक शब्द जो कि प्राकृत से उत्पन्न नहीं है, और इस कारण ठेठ नहीं है, तत्सम कहलाता है। यदि तद्भव शब्द न मिलते हों तो तत्सम शब्द के प्रयोग करने में कोई आपत्ति नहीं, ‘पाप’ तत्सम है । ठीक-ठीक इस अर्थ का द्योतक कोई तद्भव शब्द नहीं है। अतएव यथास्थान ‘पाप’ का प्रयोग किया जा सकता है। किन्तु जहाँ एक ही अर्थ के दो शब्द हैं, एक तद्भव (अर्थात् ठेठ) दूसरा तत्सम, वहाँ पर तद्भव शब्द का ही प्रयोग होना चाहिए । ‘हाथ’ के लिए तद्भव शब्द ‘हाथ’ और तत्सम शब्द “हस्त‘ है, अतएव ‘हस्त‘ के स्थान पर ‘हाथ’ का प्रयोग होना ही संगत है।

यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक तत्सम शब्द उधार लिया हुआ है। यह उधार हिन्दी को अपनी दादी से लेना पड़ता है। यदि मैं अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों से प्रायः ऋण लेने की आदत डालूँ तो मैं विनष्ट हो जाऊँगा। इसी प्रकार यदि हिन्दी उस अवस्था में भी जब कि उसके लिए ऋण लेना नितान्त आवश्यक नहीं है, ऋण लेने का स्वभाव डालती रही तो वह भी विनष्ट हो जावेगी। इस कारण मैं बलपूर्वक यह सम्मति
देता हूँ कि हिन्दी के लेखक जहाँ तक संभव हो ठेठ शब्दों (अर्थात् तद्भव शब्दों) का प्रयोग करें, क्योंकि वे हिन्दी के स्वाभाविक अंग अथवा अंशभूत साधन हैं। उधार लिये हुए संस्कृत (तत्सम) शब्दों का जितना ही कम प्रयोग हो उतना ही अच्छा। मैं यह देखकर प्रसन्न हूँ कि आपने यह कर दिखाया कि कितनी सफलता के साथ ऐसा किया जा सकता है। मैं यह प्रकट कर देना चाहता हूँ कि शब्दों के प्रयोग करने की कसौटी यह है कि हम देखें कि यह शब्द तद्भव है, न यह कि तत्सम.. कारण इसका यह है कि बहुत से तद्भव शब्द ऐसे हैं जो कि ज्यों के त्यों वैसे ही हैं, जैसे कि संस्कृत में हैं। जैसे-

संस्कृत     प्राकृत     तद्भव (ठेठ हिन्दी)
वनं           वणं         वन

यहाँ तत्सम शब्द भी वन (या बन) है, परन्तु बन भी अच्छा ठेठ हिन्दी शब्द है, क्योंकि वन केवल संस्कृत ही नहीं है, वरन् संस्कृत से प्राकृत में होकर आया हिन्दी शब्द है। यह बिल्कुल साधारण बात है कि देवदत्त का पौत्र भी देवदत्त ही कहा जावे, और यही बात हिन्दी के विषय में भी कही जा सकती है।

नीचे कुछ अन्य रूप भी दिये जाते हैं।

संस्कृत     प्राकृत     तद्भव (ठेठ हिन्दी)     तत्सम
जङ्गलः     जंगलो     जंगल                         जङ्गल या जंगल
विलासः    विलासो   विलास                       विलास या बिलास
सारः        सारो        सार                           सार
एकः        एक्को      एक                           एक
समरः      समरो      समर                          समर
गुणः        गुणो        गुन                             गुण या गुन

इसी तरह से और भी बहुत से शब्द हैं। अतएव प्राकृत का जानना आवश्यक है, और मैं प्रत्येक मनुष्य को जो कि हिन्दी की उन्नति करना चाहता है यह सम्मति भी दूँगा कि वह प्राकृत का अध्ययन करे, क्योंकि वह हिन्दी की माता है। यदि आप जननी को जानते हैं तो लड़की को अच्छी तरह समझ सकते हैं।

“माय गुन गाय पिता गुन घोड़।
बहुत नहीं तो थोड़हि थोड़॥”

इस लेख को पढ़कर आप यह समझ गये होंगे कि मैंने जो ठेठ हिन्दी की परिभाषा लिखी है, लगभग उसके विषय में वही विचार डाक्टर साहब के भी हैं। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने ‘हिन्दी भाषा’ नाम की एक पुस्तक लिखी है, उसमें उन्होंने बारह प्रकार की हिन्दी भाषा लिखी है, उसका उदाहरण भी दिया है। उसके कुछ शीर्षक ये हैं-

१—जिसमें संस्कृत के बहुत शब्द हैं,
२—जिसमें संस्कृत के शब्द थोड़े हैं,
३–जो शुद्ध हिन्दी है,
४—जिसमें किसी भाषा के शब्द मिलने का नियम नहीं है,
५—जिसमें फारसी शब्द विशेष हैं, इत्यादि।

इनके उदाहरण नीचे दिये जाते हैं।

नम्बर–१

‘अहा ! यह कैसी अपूर्व और विचित्र वर्षाऋतु साम्प्रत प्राप्त हुई है। अनवर्त आकाश मेघाच्छन्न रहता है, और चतुर्दिक कुझ्झटिका-पात से नेत्र की गति स्तम्भित हो गयी है, प्रतिक्षण अभ्र में चंचला पुंश्चली स्त्री की भाँति नर्तन करती है।’

नम्बर-२

‘सब विदेशी लोग घर फिर आये, और व्यापारियों ने नौका लादना छोड़ दिया, पुल टूट गये, बाँध खुल गये, पंक से पृथ्वी भर गयी, पहाड़ी नदियों ने अपने बल दिखाये, बहुत वृक्ष समेत कूल तोड़ गिराये । सर्प बिलों से बाहर निकले, नदियों ने मर्यादा भंग कर दी, और स्वतन्त्र स्त्रियों की भाँति उमड़ चलीं।’

नम्बर-३

‘पर मेरे प्रीतम अब तक घर न आये, क्या उस देस में बरसात नहीं होती, या किसी सौत के फन्द में पड़ गये। कहाँ तो वह प्यार की बातें, कहाँ एक संग ऐसा भूल जाना कि चिट्ठी भी न भिजवाना। हा! मैं कहाँ जाऊँ, कैसी करूँ, मेरी तो ऐसी कोई मुहबोली सहेली भी नहीं कि उससे दुखड़ा रो सुनाऊँ, कुछ इधर उधर की बातों से ही जी बहलाऊं।’

नम्बर–४

‘ऐसी तो अँधेरी रात उसमें अकेली रहना, कोई हाल पूछने वाला भी पास नहीं, रह-रह कर जी घबड़ाता है, कोई खबर लेने भी नहीं आता, कौन और इस विपत्ति में सहाय होकर जान बचाता।’

नम्बर–५

‘खुदा इस आफ़त से जी बचाये, प्यारे का मुँह जल्द दिखाये, कि जान में जान आये। फिर वही ऐश की घड़ियाँ आवें, शबोरोज़ दिलवर की सुहबत रहे, रंजोगम दूर हो, दिल मसरूर हो।’

अन्त में आप लिखते हैं-

“हम इस स्थान पर वाद नहीं किया चाहते, कि कौन भाषा उत्तम है, और वही लिखनी चाहिये। पर हाँ मुझसे कोई अनुमति पूछे तो मैं यह कहूँगा कि नम्बर २ र ३ लिखने के योग्य हैं।”

नमूने जो ऊपर दिये गये हैं, उनके देखने से ज्ञात होगा कि नम्बर २ सरल हिन्दी है जिसमें कि थोड़े संस्कृत शब्द हैं अर्थात् जिसमें तत्सम शब्द कम हैं, और नम्बर ३ ठेठ हिन्दी है जिसमें बिलकुल तद्भव शब्द हैं, और इन्हीं दोनों को उक्त महोदय ने लिखने योग्य बतलाया है। कहना नहीं होगा कि शुद्ध शब्द और ठेठ शब्द का एक ही अर्थ है और ऐसी अवस्था में भारतेन्दुजी ने भी एक प्रकार से ठेठ हिन्दी की परिभाषा शब्द-विन्यास द्वारा वही की है जो मैं ऊपर कर आया हूँ।

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अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (15 अप्रैल, 1865-16 मार्च, 1947) हिन्दी के एक सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे। वे दो बार हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति रह चुके हैं और सम्मेलन द्वारा विद्यावाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किये जा चुके हैं। 'प्रिय प्रवास' हरिऔध जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है और इसे मंगला प्रसाद पारितोषित पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।