‘Tilchatte’, a poem by Nirmal Gupt

जब इस धरती पर कुछ भी न बचेगा
तिलचट्टे फिर भी रहेंगे
उनकी अमरता पर कोई विमर्श नहीं

आदमी उसे पाने को
सदियों से जूझ रहा है

तिलचट्टे बदबू फैलाते
अँधेरे और सीलन में निरंतर पनपते हैं
वे ख़तरे और रौशनी का सुराग़ पाकर
भागते हैं आठ पैरों के सहारे
फिर भी वे मार डाले जाते हैं
तिलचट्टे अमरता को नहीं जानते

तिलचट्टे तभी तक हैं बचे हुए
जब तक वजूद है
घनीभूत कालिमा और कायर आद्रता का,
आदमी के पास नहीं है
उनको जड़मूल नष्ट करने की तकनीक
विज्ञान सम्मत नासमझी में उनकी जान बसती है

आदमी जानता है तिलचट्टे की सारी ख़ूबियाँ
फिर भी कतराता है उस जैसा बनने से
बना सकता है वह चाहे तो
उसकी हुबहू अनुकृति
पर अजरता के लिए उसे
तिलचट्टा बनना मंजूर नहीं

धरती पर जब कुछ न बचेगा
तो ये बचे हुए तिलचट्टे करेंगे
समस्त जल वाष्पित हो जाने के बावजूद
समुद्र मंथन जैसा कुछ
अमृत और विष तलाशेंगे शायद
तिलचट्टे देवता बनने की कोशिश करेंगे!

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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