वह पहले चौराहों पर बिजली के टॉर्च बेचा करता था। बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा। कल फिर दिखा। मगर इस बार उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी और लम्बा कुरता पहन रखा था।

मैंने पूछा, “कहाँ रहे? और यह दाढ़ी क्यों बढ़ा रखी है?”

उसने जवाब दिया, “बाहर गया था।”

दाढ़ी वाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढ़ी पर हाथ फेरने लगा। मैंने कहा, “आज तुम टॉर्च नहीं बेच रहे हो?”

उसने कहा, “वह काम बन्द कर दिया। अब तो आत्मा के भीतर टॉर्च जल उठा है। ये ‘सूरजछाप’ टॉर्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं।”

मैंने कहा, “तुम शायद संन्यास ले रहे हो। जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है। किससे दीक्षा ले आए?”

मेरी बात से उसे पीड़ा हुई। उसने कहा, “ऐसे कठोर वचन मत बोलिए। आत्मा सबकी एक है। मेरी आत्मा को चोट पहुँचाकर आप अपनी ही आत्मा को घायल कर रहे हैं।”

मैंने कहा, “यह सब तो ठीक है। मगर यह बताओ कि तुम एकाएक ऐसे कैसे हो गए? क्या बीवी ने तुम्हें त्याग दिया? क्या उधार मिलना बन्द हो गया? क्या साहूकारों ने ज़्यादा तंग करना शुरू कर दिया? क्या चोरी के मामले में फँस गए हो? आख़िर बाहर का टॉर्च भीतर आत्मा में कैसे घुस गया?”

उसने कहा, “आपके सब अंदाज़े ग़लत हैं। ऐसा कुछ नहीं हुआ। एक घटना हो गई है, जिसने जीवन बदल दिया। उसे मैं गुप्त रखना चाहता हूँ। पर क्योंकि मैं आज ही यहाँ से दूर जा रहा हूँ, इसलिए आपको सारा क़िस्सा सुना देता हूँ।”

उसने बयान शुरू किया-

पाँच साल पहले की बात है। मैं अपने एक दोस्त के साथ हताश एक जगह बैठा था। हमारे सामने आसमान को छूता हुआ एक सवाल खड़ा था। वह सवाल था – ‘पैसा कैसे पैदा करें?’ हम दोनों ने उस सवाल की एक-एक टाँग पकड़ी और उसे हटाने की कोशिश करने लगे। हमें पसीना आ गया, पर सवाल हिला भी नहीं। दोस्त ने कहा – ‘यार, इस सवाल के पाँव ज़मीन में गहरे गड़े हैं। यह उखड़ेगा नहीं। इसे टाल जाएँ।’

हमने दूसरी तरफ़ मुँह कर लिया। पर वह सवाल फिर हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। तब मैंने कहा – ‘यार, यह सवाल टलेगा नहीं। चलो, इसे हल ही कर दें। पैसा पैदा करने के लिए कुछ काम-धन्धा करें। हम इसी वक़्त अलग-अलग दिशाओं में अपनी-अपनी क़िस्मत आज़माने निकल पड़े। पाँच साल बाद ठीक इसी तारीख़ को इसी वक़्त हम यहाँ मिलें।’

दोस्त ने कहा – ‘यार, साथ ही क्यों न चलें?’
मैंने कहा – ‘नहीं। क़िस्मत आज़माने वालों की जितनी पुरानी कथाएँ मैंने पढ़ी हैं, सबमें वे अलग-अलग दिशा में जाते हैं। साथ जाने में क़िस्मतों के टकराकर टूटने का डर रहता है।’

तो साहब, हम अलग-अलग चल पड़े। मैंने टॉर्च बेचने का धन्धा शुरू कर दिया। चौराहे पर या मैदान में लोगों को इकठ्ठा कर लेता और बहुत नाटकीय ढंग से कहता – “आजकल सब जगह अन्धेरा छाया रहता है। रातें बेहद काली होती हैं। अपना ही हाथ नहीं सूझता। आदमी को रास्ता नहीं दिखता। वह भटक जाता है। उसके पाँव काँटों से बिन्ध जाते हैं, वह गिरता है और उसके घुटने लहूलुहान हो जाते हैं। उसके आसपास भयानक अन्धेरा है। शेर और चीते चारों तरफ़ धूम रहे हैं, साँप ज़मीन पर रेंग रहे हैं। अन्धेरा सबको निगल रहा है। अन्धेरा घर में भी है। आदमी रात को पेशाब करने उठता है और साँप पर उसका पाँव पड़ जाता है। साँप उसे डँस लेता है और वह मर जाता है।”

आपने तो देखा ही है साहब, कि लोग मेरी बातें सुनकर कैसे डर जाते थे। भरी दोपहर में वे अन्धेरे के डर से काँपने लगते थे। आदमी को डराना कितना आसान है!

लोग डर जाते, तब मैं कहता – “भाइयों, यह सही है कि अन्धेरा है, मगर प्रकाश भी है। वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूँ। हमारी ‘सूरजछाप’ टॉर्च में वह प्रकाश है, जो अन्धकार को दूर भगा देता है। इसी वक़्त ‘सूरजछाप’ टॉर्च ख़रीदो और अन्धेरे को दूर करो। जिन भाइयों को चाहिए, हाथ ऊँचा करें।”

साहब, मेरे टॉर्च बिक जाते और मैं मज़े में ज़िन्दगी गुज़ारने लगा।

वायदे के मुताबिक़ ठीक पाँच साल बाद मैं उस जगह पहुँचा, जहाँ मुझे दोस्त से मिलना था। वहाँ दिन भर मैंने उसकी राह देखी, वह नहीं आया। क्या हुआ? क्या वह भूल गया? या अब वह इस असार संसार में ही नहीं है? मैं उसे ढूँढने निकल पड़ा।

एक शाम जब मैं एक शहर की सड़क पर चला जा रहा था, मैंने देखा कि पास के मैदान में ख़ूब रोशनी है और एक तरफ़ मंच सजा है। लाउडस्पीकर लगे हैं। मैदान में हज़ारों नर-नारी श्रद्धा से झुके बैठे हैं। मंच पर सुन्दर रेशमी वस्त्रों से सजे एक भव्य पुरुष बैठे हैं। वे ख़ूब पुष्ट हैं, सँवारी हुई लम्बी दाढ़ी है और पीठ पर लहराते लम्बे केश हैं। मैं भीड़ के एक कोने में जाकर बैठ गया।

भव्य पुरुष फ़िल्मों के सन्त लग रहे थे। उन्होंने गुरु-गम्भीर वाणी में प्रवचन शुरू किया। वे इस तरह बोल रहे थे जैसे आकाश के किसी कोने से कोई रहस्यमय सन्देश उनके कान में सुनायी पड़ रहा है, जिसे वे भाषण दे रहे हैं।

वे कह रहे थे – “मैं आज मनुष्य को एक घने अन्धकार में देख रहा हूँ। उसके भीतर कुछ बुझ गया है। यह युग ही अन्धकारमय है। यह सर्वग्राही अन्धकार सम्पूर्ण विश्व को अपने उदर में छिपाए है। आज मनुष्य इस अन्धकार से घबरा उठा है। वह पथभ्रष्ट हो गया है। आज आत्मा में भी अन्धकार है। अन्तर की आँखें ज्योतिहीन हो गई हैं। वे उसे भेद नहीं पातीं। मानव-आत्मा अन्धकार में घुटती है। मैं देख रहा हूँ, मनुष्य की आत्मा भय और पीड़ा से त्रस्त है।”

इसी तरह वे बोलते गए और लोग स्तव्य सुनते गए।

मुझे हँसी छूट रही थी। एक-दो बार दबाते-दबाते भी हँसी फूट गई और पास के श्रोताओं ने मुझे डाँटा।

भव्य पुरुष प्रवचन के अन्त पर पहुँचते हुए कहने लगे – “भाइयों और बहनों, डरो मत। जहाँ अन्धकार है, वहीं प्रकाश है। अन्धकार में प्रकाश की किरण है, जैसे प्रकाश में अन्धकार की किंचित कालिमा है। प्रकाश भी है। प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अन्तर में खोजो। अन्तर में बुझी उस ज्योति को जगाओ। मैं तुम सबका उस ज्योति को जगाने के लिए आह्वान करता हूँ। मैं तुम्हारे भीतर वही शाश्वत ज्योति को जगाना चाहता हूँ। हमारे ‘साधना मन्दिर’ में आकर उस ज्योति को अपने भीतर जगाओ।”

साहब, अब तो मैं खिलखिलाकर हँस पड़ा। पास के लोगों ने मुझे धक्का देकर भगा दिया। मैं मंच के पास जाकर खड़ा हो गया।

भव्य पुरुष मंच से उतरकर कार पर चढ़ रहे थे। मैंने उन्हें ध्यान से, पास से देखा। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, इसलिए मैं थोड़ा झिझका। पर मेरी तो दाढ़ी नहीं थी। मैं तो उसी मौलिक रूप में था। उन्होंने मुझे पहचान लिया। बोले – “अरे तुम!”

मैं पहचानकर बोलने ही वाला था कि उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर कार में बिठा लिया। मैं फिर कुछ बोलने लगा तो उन्होंने कहा – “बँगले तक कोई बातचीत नहीं होगी। वहीं ज्ञानचर्चा होगी।”

मुझे याद आ गया कि वहाँ ड्राइवर है।

बँगले पर पहुँचकर मैंने उसका ठाठ देखा। उस वैभव को देखकर मैं थोड़ा झिझका, पर तुरन्त ही मैंने अपने उस दोस्त से खुलकर बातें शुरू कर दीं।

मैंने कहा – “यार, तू तो बिलकुल बदल गया।”

उसने गम्भीरता से कहा – “परिवर्तन जीवन का अनन्त क्रम है।”

मैंने कहा – “साले, फिलॉसॉफी मत बघार यह बता कि तूने इतनी दौलत कैसे कमा ली पाँच सालों में?”

उसने पूछा – “तुम इन सालों में क्या करते रहे?”

मैंने कहा – “मैं तो घूम-घूमकर टॉर्च बेचता रहा। सच बता, क्या तू भी टॉर्च का व्यापारी है?”

उसने कहा – “तुझे क्या ऐसा ही लगता है? क्यों लगता है?”

मैंने उसे बताया कि जो बातें मैं कहता हूँ, वही तू कह रहा था। मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू उन्हीं बातों को रहस्यमय ढंग से कहता है। मैं भी अन्धेरे का डर दिखाकर लोगों को टॉर्च बेचता हूँ। तू भी अभी लोगों को अन्धेरे का डर दिखा रहा था, तू भी ज़रूर टॉर्च बेचता है।

उसने कहा – “तुम मुझे नहीं जानते, मैं टॉर्च क्यों बेचूगा! मैं साधु, दार्शनिक और सन्त कहलाता हूँ।”

मैंने कहा – “तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टॉर्च हो। तुम्हारे और मेरे प्रवचन एक जैसे हैं।

चाहे कोई दार्शनिक बने, सन्त बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अन्धेरे का डर दिखाता है, तो ज़रूर अपनी कम्पनी का टॉर्च बेचना चाहता है।

तुम जैसे लोगों के लिए हमेशा ही अन्धकार छाया रहता है। बताओ, तुम्हारे जैसे किसी आदमी ने हज़ारों में कभी भी यह कहा है कि आज दुनिया में प्रकाश फैला है? कभी नहीं कहा। क्यों? इसलिए कि उन्हें अपनी कम्पनी का टॉर्च बेचना है। मैं ख़ुद भरी दोपहर में लोगों से कहता हूँ कि अन्धकार छाया है। बता किस कम्पनी का टॉर्च बेचता है?”

मेरी बातों ने उसे ठिकाने पर ला दिया था। उसने सहज ढंग से कहा – “तेरी बात ठीक ही है। मेरी कम्पनी नयी नहीं है, सनातन है।”

मैंने पूछा – “कहाँ है तेरी दुकान? नमूने के लिए एकाध टॉर्च तो दिखा। ‘सूरजछाप’ टॉर्च से बहुत ज़्यादा बिक्री है उसकी?

उसने कहा – “उस टॉर्च की कोई दुकान बाज़ार में नहीं है। वह बहुत सूक्ष्म है। मगर क़ीमत उसकी बहुत मिल जाती है। तू एक-दो दिन रह, तो मैं तुझे सब समझा देता हूँ।”

तो साहब मैं दो दिन उसके पास रहा। तीसरे दिन ‘सूरजछाप’ टॉर्च की पेटी को नदी में फेंककर नया काम शुरू कर दिया।

वह अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरने लगा। बोला – “बस, एक महीने की देर और है।”

मैंने पूछा – “तो अब कौन-सा धन्धा करोगे?”

उसने कहा – “धन्धा वही करूँगा, यानी टॉर्च बेचूँगा। बस कम्पनी बदल रहा हूँ।”

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हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई (22 अगस्त, 1924 - 10 अगस्त, 1995) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार थे। उनका जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा।