उसके ज़हरी होंठ काले पड़ गए थे
उसकी आँखों में
अधूरी ख़्वाहिशों के देवताओं के
जनाज़े गड़ गए थे
उसके चेहरे की शफ़क़ का रंग
घायल हो चुका था
उसके जलते जिस्म की ख़ुशबू का सूरज
पर्वतों की चोटियों से नीचे गिरकर
टुकड़े-टुकड़े हो चुका था
उसकी छाती पर
सुलगते चाँद के सायों के पत्थर
रास्ता रोके खड़े थे
उसके जलते जिस्म के झुलसे हुए सहरा में
पीली हसरतों के आसमाँ
प्यासे पड़े थे
बन्द कमरे में
मिरी मौजूदगी से डर गई थी
वो मर गई थी…

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