रडयार्ड किपलिंग

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Mahadev Toppo

रूपांतरण

जब तक थे वे जंगलों में मांदर बजाते, बाँसुरी बजाते करते जानवरों का शिकार अधनंगे शरीर वे बहुत भले थे तब तक उनसे अच्छा था नहीं दूसरा कोई नज़रों में तुम्हारी छब्बीस...
Girl reading a book, School, Kid

वो उतना ही पढ़ना जानती थी

वो उतना ही पढ़ना जानती थी जितना अपना नाम लिख सके स्कूल उसको मज़दूरों के काम करने की जगह लगती थी जहाँ वे माचिस की डिब्बियों की तरह बनाते थे...
Zafar Iqbal

अभी आँखें खुली हैं और क्या-क्या देखने को

अभी आँखें खुली हैं और क्या-क्या देखने को मुझे पागल किया उसने तमाशा देखने को वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न...
Rahul Sankrityayan

तुम्हारे समाज की क्षय

मनुष्य सामाजिक पशु है। मनुष्य और पशु में अन्तर यही है कि मनुष्य अपने हित और अहित के लिए अपने समाज पर अधिकतर निर्भर...
Maya Angelou

माया एंजेलो की कविता ‘मैं फिर भी उठती हूँ’

तुम मेरा इतिहास लिख सकते हो अपने कड़वे, मुड़े-तुड़े झूठों से तुम मुझे गंदगी में कुचल सकते हो फिर भी, धूल की तरह, मैं उठूँगी। क्या मेरी उन्मुक्तता...
Naval Shukla

ईश्वर से अधिक हूँ

एक पूरी आत्मा के साथ एक पूरी देह हूँ मैं जिसे धारण करते हैं ईश्वर कभी-कभी मैं एक आत्मा एक देह एक ईश्वर से अधिक हूँ। ईश्वर युगों में सुध...
Viren Dangwal

हमारी नींद

मेरी नींद के दौरान कुछ इंच बढ़ गए पेड़ कुछ सूत पौधे अंकुर ने अपने नाम-मात्र, कोमल सींगों से धकेलना शुरू की बीज की फूली हुई छत, भीतर से। एक मक्खी...
Rituraj

मरूँगा नहीं

दूसरे-दूसरे कारणों से मारा जाऊँगा बहुत अधिक सुख से अकठिन सहज यात्राविराम से या फिर भीतर तक बैठी जड़ शान्ति से लेकिन नहीं मरूँगा कुशासन की कमीनी चालों से आए दिन के...
Kedarnath Singh

घास

दुनिया के तमाम शहरों से खदेड़ी हुई जिप्सी है वह तुम्हारे शहर की धूल में अपना खोया हुआ नाम और पता खोजती हुई आदमी के जनतन्त्र में घास के सवाल...
Naukar Ki Kameez - Vinod Kumar Shukla

विनोद कुमार शुक्ल – ‘नौकर की कमीज़’

विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास 'नौकर की कमीज़' से उद्धरण | Quotes from 'Naukar Ki Kameez', a novel by Vinod Kumar Shukla   "घर बाहर जाने...
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