वर्षा गोरछिया

वर्षा गोरछिया
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Recent Posts

Adarsh Bhushan

बंदोबस्त

शहर ख़ाली हो चुके हैं लोगों से, जब तक कोई बसता था यहाँ उदासी ढोता था ताने खाता था और लानत ओढ़कर सो जाता था खिन्न और अप्रसन्न लोग भड़के और...
Harivansh Rai Bachchan

आज़ादी के बाद

अगर विभेद ऊँच-नीच का रहा अछूत-छूत भेद जाति ने सहा किया मनुष्य औ’ मनुष्य में फ़रक़ स्वदेश की कटी नहीं कुहेलिका। अगर चला फ़साद शंख-गाय का फ़साद सम्प्रदाय-सम्प्रदाय का उलट न...
Agyeya

घृणा का गान

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान! तुम, जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचाकर भागे तुम, जो बहिनें छोड़ बिलखती, बढ़े जा रहे...
Harishankar Parsai

वह जो आदमी है न

निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं। निंदा ख़ून साफ़ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है। निंदा से माँसपेशियाँ...
Rituraj

अँधेरे में प्रार्थना

ले चलो मुझे इस लोक से दूर कहीं जहाँ निर्धन धनवानों को चुनते नहीं जहाँ मूर्ख और पंगु नहीं बनते बुद्धिमान जहाँ निर्बल स्त्रियों पर वीरता नहीं...
Chandrakant Devtale

घर में अकेली औरत के लिए

तुम्हें भूल जाना होगा समुद्र की मित्रता और जाड़े के दिनों को जिन्हें छल्ले की तरह अँगुली में पहनकर तुमने हवा और आकाश में उछाला था, पंखों में बसन्त...
Parveen Shakir

चाँद-रात

गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा था चाँद को देखके उसका चेहरा देखा था फ़ज़ा में 'कीट्स' के लहजे की नरमाहट थी मौसम अपने रंग...
Sara Shagufta

क़र्ज़

मेरा बाप नंगा था मैंने अपने कपड़े उतार उसे दे दिए ज़मीन भी नंगी थी मैंने उसे अपने मकान से दाग़ दिया शर्म भी नंगी थी, मैंने उसे अपनी...
Girdhar Rathi

स्वगत

'Swagat' | a poem by Girdhar Rathi वही— जिसे भींच रहे हो मुट्ठी में लेकिन जो टूट-बिखर जाता है बार-बार— जीवन है। कभी रेत और कभी बर्फ़ कभी आँच और...
Saadat Hasan Manto

वह लड़की

सवा चार बज चुके थे लेकिन धूप में वही तमाज़त थी जो दोपहर को बारह बजे के क़रीब थी। उसने बालकनी में आकर बाहर...
Earth Woman

प्रेम का अबेकस (दूसरा भाग)

1 प्रेम से क्रोध तक आग से आश्रय तक विश्वास करने के विपरीत क्या है? उसके लायक़ भी कुछ नही जैसे चाँदी की एक शानदार सुई चमकती है सफ़ेद परिधि में प्रेम...

चट्टान को तोड़ो, वह सुन्दर हो जाएगी

चट्टान को तोड़ो वह सुन्दर हो जाएगी उसे तोड़ो वह और, और सुन्दर होती जाएगी अब उसे उठा लो रख लो कन्धे पर ले जाओ शहर या क़स्बे में डाल दो...
Faiz Ahmad Faiz

इन्तिसाब

आज के नाम और आज के ग़म के नाम आज का ग़म कि है ज़िन्दगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा ज़र्द पत्तों का बन ज़र्द पत्तों का बन जो मिरा...
Gopal Singh Nepali

प्रार्थना बनी रहीं

रोटियाँ ग़रीब की, प्रार्थना बनी रहीं! एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का पर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर का राज है ग़रीब का,...
Mahadevi Verma

जाग तुझको दूर जाना

चिर सजग आँखें उनींदी, आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले या प्रलय के आँसुओं में मौन...
Zafar Iqbal

अभी किसी के न मेरे कहे से गुज़रेगा

अभी किसी के न मेरे कहे से गुज़रेगा वो ख़ुद ही एक दिन इस दाएरे से गुज़रेगा भरी रहे अभी आँखों में उसके नाम की नींद वो...
Vinod Kumar Shukla

बोलने में कम से कम बोलूँ

बोलने में कम से कम बोलूँ कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ इतना कम कि किसी दिन एक बात बार-बार बोलूँ जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप। मेरे अधिकतम...
Krishan Chander

दो फ़र्लांग लम्बी सड़क

Do Farlaang Lambi Sadak, a story by Krishan Chander कचहरियों से लेकर लॉ कॉलेज तक बस यही कोई दो फ़र्लांग लम्बी सड़क होगी। हर रोज़...
Ishrat Afreen

टारगेट किलिंग

चूड़ी वाले के यहाँ मैं अभी स्टूल पर बैठी ही थी साथ की दुकान के आगे इक स्कूटर रुका गोली चली सब ने फ़क़ चेहरों के साथ मुड़के देखा एक लम्हे...
Sandeep Nirbhay

जिस दिशा में मेरा भोला गाँव है

क्या बारिश के दिनों धोरों पर गड्डमड्ड होते हैं बच्चे क्या औरतों के ओढ़नों से झाँकता है गाँव क्या बुज़ुर्गों की आँखों में बचा है काजल क्या स्लेट...
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